
डॉ टी महादेव राव
बहुत पहले जब चर्चा से संबन्धित फिल्मी गाने सुनता था, तो लगता था चर्चित होना या चर्चा में रहना सचमुच बड़े ही गर्व का विषय होगा। सभी के दिलो दिमाग में यह चर्चा खलबली मचाती होगी। जैसे गाने थे- आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़ुबान पर, शहर में चर्चा है आदि आदि। उसके बाद दफ्तर में बॉस को मेरा कोई प्रस्ताव समझ में नहीं आता था या कोई विवरण चाहता था तो नोट लिखता था कृपया चर्चा करें। उसके बाद जब श्रमिक संघों की मांगों और नोटिस पर प्रबंधन के साथ आमने सामने अजी वही एक्रोस द टेबल चर्चा होती थी। कभी कभी आस पड़ोस में कोई हादसा हो गया, कोई प्रेमी युगल फरार हो गया तो काफी दिनों तक चर्चा चलती थी। तो चर्चों का दायरा बड़ा सीमित था मेरे लिए। कुछ एक छूट भी गए होंगे।
आजकल तो चर्चों के चर्चे भी बड़े जोरोशोर से होने लगे। और तो और चर्चा को छोटे से दायरे से निकालकर बहुत विशाल आसमान दे दिया गया चर्चा अनंत, चर्चा कथा अनंता बना दिया गया, जिस तरह कविता को किसी विषय से परहेज नहीं होता, जहां न जाय रवि वहाँ जाय कवि की तर्ज़ पर। अब तो चर्चा का तो मार्केट ही निकल पड़ा, चर्चा के लिए विषयों की कमी नहीं। विषय हो या न हो, चर्चा तो होती रहनी चाहिए। ताकि बिना प्रैस मीट किये, पत्रकारों का सामना किए बिना बहुत सारी पब्लिसिटी अपने आप इन चर्चाओं से मिल जाती है, जिससे प्रचार प्रसार के भूखे दिल की कली खिल जाती है। सरकारी विज्ञापनों की लालच में इतने समाचार छपते हैं कि दिल बाग बाग हो जाता है। कहाँ दिल की कली के खिलने की बात थी और कहाँ दिल का बाग बाग होने का मामला। यही तो विकास है। और हमारा विकास जो है किसी से कम नहीं है।
पहले शुरू हुई चाय पे चर्चा। होनी ही चाहिए आखिर चाय सभी की फेवेरेट पेय जो है। प्रधान मंत्री से लेकर आम आदमी तक चाय को पसंद करता है। करना भी चाहिए। इससे चुस्ती फुर्ती आती है। जीवन में खुशियाँ तो सभी ने किसी न किसी तरह छीन लिया, लेकिन चाय अपने स्वाद से उस दर्द को भूल जाने में मदद करता है। मैं सिर्फ चाय तक चर्चा को रखता हूँ। किसी भी विषय पे बात करनी हो, चर्चा करनी हो तो चाय एक उत्प्रेरक के रूप में बहुत सक्रिय काम करता है। चाय पे चर्चा में मेरे मित्र ने चाय के प्रकारों पे जब चर्चा शुरू किया तो मैंने कहा चाय विषय नहीं, एक केटलिस्ट है, उत्प्रेरक है। उसने कहा तब इसे सामन्य चर्चा कहो न! चाय पे चर्चा क्यों कहते हो। मेरे एक और मित्र ने उत्तर दिया- इस बीच केवल चर्चा होती थी, चाय नहीं पिलाया जाता था तो लोग कम आते थे। हमने सोचा चाय पे चर्चा करने पर कम से कम चाय के लिए तो लोग आएंगे। साला, चर्चा में भी पॉलिटिक्स घुस गई। क्या दिन आ गए? है न?
इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर गाय पे चर्चा शुरू हो गई। उसके परिणाम सभी ने देख ही लिए। चर्चा ज़रूरी है, विषय नहीं। मेरे बॉस के पास जब फुरसत बहुत होती थी और अगर उस दिन बीवी से बिना झगड़े दफ़्तर आ गया हो तो समझो उस दिन फालतू चर्चा का कार्यक्रम निश्चित ही होता। सब को बैठाकर गप शप। फिल्में, दूसरे विभाग के लोगों की खिंचाई, टीवी के धारावाहिक हर विषय पर वे चर्चा करते और इस असहनीय चर्चा से हम ऊब जाते लेकिन क्या कर सकते थे? हम दो चार चाय पीकर अगर कोई काम हुआ जैसे छुट्टी मांगना, प्रमोशन पर बात करना, सीआर में रेटिंग पर बड़े चापलूस बनकर बात करते थे। कम से कम आधी मांगें पूरी हो जाती। बॉस भी खुश और हम भी प्रसन्न। लेकिन ऐसे मौके महीने दो महीने में एकाध बार ही आते। यह थी दफ्तर की चर्चा।
राष्ट्रीय चर्चा में कभी परीक्षा पे चर्चा होती है तो कभी मन की बात बताई जाती है। परीक्षा से अधिक छात्र चाहते हैं की पर्चों पर चर्चा हो। हर विषय के पर्चे पर चर्चा हो तो उन्हें लाभ भी होगा और उनका “ज्ञान” भी विकसित होगा। मेरे कहने का मतलब है परीक्षा पे चर्चा एक स्थूल विषय है जबकि पर्चे पे चर्चा सूक्ष्म। हमें सूक्ष्म चर्चा करनी चाहिए ताकि हम विषय विश्लेषण कर पर्चे कैसे आएंगे, क्या क्या प्रश्न पूछे जाएँगे, पर्चे कौन कौन से चैप्टर कवर करेंगे आदि पर चर्चा करें तो छात्रों का फायदा होगा, अभिभावकों का फायदा होगा, स्कूल का फायदा होगा। तुर्रा यह की फायदा ही फायदा है बशर्ते चर्चा के मुखिया को सारे विषयों का समुचित ज्ञान हो।
पिछले वर्ष हम कोरोना पे काफी चर्चा कर चुके। फलस्वरूप थालियाँ, तालियां पीटे, दिये जलाए, भक्तों ने जय-जयकार किए। ऐसा लगा कोरोना हमारे इन हरकतों से भाग जाएगा। फिर लौटके नहीं आयेगा। लेकिन शायद उसने अपने सीनियरों से चर्चा की और दुगुनी तेज़ी से लौट आया पूरी शिद्दत के साथ। इस बीच निश्चिंत हुये हम अंजाने में ही कोरोना के दूसरे अवतार को भींचके गले लगाया और बस बचा क्या? पाँच राज्यों के चुनावी चर्चा रूपी भाषणों, रैलियों ने तो बस बंदनवार बांधकर कोरोना द्वितीय का जोरो शोर से स्वागत किया। मूल में हमारे चर्चा के नायक, अधिनायक और महानायक ही रहे। समरथ को नहीं दोष गोसाई।
छुटमुट और येवई चर्चा हम आम आदमी के साथ करते हैं। वैक्सीन पर चर्चा के लिए स्वयं उन प्रयोगशालाओं में जाकर वहाँ के वैज्ञानिकों से चर्चा करने के बाद बताते हैं हमारी चर्चा की वजह से हे दो वैक्सीन ईजाद हुये। हम….. हम….. और हम, आप को पुरानी फिल्मों का अभिनेता राजकुमार याद आ गया होगा । लेकिन सारे देश में जब वैक्सीन की आपूर्ति ढंग से नहीं हो पा रही है तो हम कहते हैं, यह राज्यों का मामला है। यह तो है हमारे अधिनायक की फितरत। मेरा तो मानना है कि जिन विषयों पर चर्चा होनी चाहिए उन पर नहीं हो रही है। जैसे आय पर चर्चा, व्यय पर चर्चा, अस्पताल, दवाइयाँ और प्राणवायु जैसे सुविधाओं पर चर्चा, महंगाई पे चर्चा, आम आदमी के द्वारा झेली जा रही असुविधाओं पर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन उसके लिए छप्पन इंच का सीना नहीं दमदार दिल चाहिए, गुर्दा चाहिए और सामने वालों की बातों को समझने का माद्दा चाहिए, स्वयं की ग़लतियों को स्वीकार कर सकने का व्यापक दृष्टिकोण चाहिए, जो कि है नहीं।
ज्ञान और इतिहास के तो हम चर्चा और ज्ञान बाँटू चुनावी सभाओं में धज्जियां उड़ा चुके हैं। इतिहास ऐसा कि 1950 में पैदा हुआ व्यक्ति बताता है कि सन 1857 की गदर के समय वह सात साल का था। ऐसे शताब्दी पुरुषों की चर्चा होनी चाहिए, न कि अन्य विषयों पर। जब मैंने पड़ोसी से कहा कि चर्चों पर भी चर्चा होनी चाहिए तो उसने पूछा क्या मंदिर, मस्जिद विषय समाप्त हो गए जो गिरजाघरों (चर्च) यानी कि चर्चों पर चर्चा करोगे? मैंने कहा सॉरी यार! चर्चाओं पर चर्चा है यह गिरजाघरों पर नहीं।







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