रहिमन “पानी” राखिए


डॉ टी महादेव राव
मुझे लगता है रहीम ने इस युग के कर्ता-धर्ताओं को ध्यान में रखकर ही कहा था “रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून।” पानी का पहला अर्थ स्वाति की बूंद। यह पानी जो चातक की प्यास बुझा सकता है या अधखुले सीप में गिरकर मोती बन सकती
है।  पीने के पानी की उपलब्धता पर भी विचार करने और हमें सोचने को कहते रहे रहीम जी। 
दूसरा अर्थ पानी का इज्जत या मान।  इसकी धज्जियां उड़ती आप देख ही रहे हैं। न  नेताओं को, न ही  मंत्रियों को इज्जत का ध्यान और ज्ञान है और न बड़े बड़े तथाकथित कर्णधारों को। तुर्रा यह कि इज्जत उनके लिए ऐसी चीज़ हो गई है जो उनके लिए कोई माने नहीं रखती।  एक पुराना गीत आपको याद होगा – “न इज्ज़त की चिंता न फिकर कोई अपमान की”। भैंस पर धुआंधार बारिश भी उसकी चाल में कोई अंतर नहीं ला पाता, ठीक इसी तरह की हो गई है आजकल के खासमखास लोगों  की फितरत।  कोई फर्क नहीं उन्हें। केवल सत्ता पर काबिज रहें।  दोस्त यार बैंकों को चपत मार कर खुश रहें,  सरकारी कंपनियां बेचकर जिगरी दोस्तों को देकर  प्रसन्न कर लें,  हम तो वही करेंगे जो हमें करना है,  जो हमें भाता है।  हमारे गृह मंत्री गज गमन की चाल में चलते रहें।  भक्त हमारे भजन गाते रहें,  चारण भाटों सा प्रशस्ति गान करते रहें,  आम आदमी की चीख-पुकारें उन्हें सुनाई ही नहीं देती, या उनके लिए  अनसुनी रह जाती हैं। 
रिश्तो से जहां जुड़ाव न हो, अहम से जहां मित्रता हो, खुद को तोप समझ लेना, यह कहना कि अहम ब्रह्मास्मि  और मुझसे बड़ा ज्ञानी और कूटनीतिज्ञ कोई न होगा।  यह भरम रावण में भी था लेकिन वह वास्तव में ज्ञानी था। ब्रह्मज्ञानी और विद्वान ऐसा कि राम भी उनसे शिक्षा लेने को लक्ष्मण से कहते हैं। लेकिन यहां तो पूरा ढकोसला है।  दिखावा है ओना  मासी  धम की तर्ज पर हैं।  तो इन में पानी यानी कि इज्जत कि  कोई भी बूंद  नहीं है। 
अपने स्वार्थ और अधूरे कचरे ज्ञान से देश की जनता का पानी उतारा जा रहा है।  फिलहाल तुर्रा यह कि कोरोना से पीड़ित जनता इन्हें पानी पी पी कर कोस  रही है, लेकिन भैंस खड़ी पगुराय कि स्थिति में बहरे बने फिरते हैं। राजनीतिज्ञ घाट घाट का पानी पिए हुए हैं।  शर्म नहीं तो पानी पानी कैसे होंगे?  आधुनिक राजनीति की पहली शर्त है निर्लज्ज होना । वे जितना भी अपमानित हों पानी पानी नहीं होंगे। ठोस बर्फ  बने रहेंगे।  जनता को लग रहा है उनके जीवन की भैंस गई पानी में।  नेताओं और कर्णधारों के चलते कई लोगों का कोरोना की वजह से इस धरती पर से दाना पानी उठ गया।  सब कुछ जानने के बाद भी सत्ता सुख में व्यस्त लोग कभी नहीं चाहेंगे कि दूध का दूध और पानी का पानी हो।  ईवीएम में फेरबदल से जीत की उन्हें  हमेशा उम्मीद रही है और अब भी है।  अपनी कुटिल और क्रूर राजनीति के लिए, सत्ता हथियाने के लिए इस तरह जनता के जीवन से स्वास्थ्य से खेलने वाले इन लोगों को तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए,  लेकिन यह ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि रहीम के कहे पानी से इनका दूर दूर तक कोई लेना-देना नहीं है।  पानी की तरह रुपया बहा कर चुनाव जीतने वालों में पानी की उम्मीद करना सूरज को पश्चिम से उगते  देखने के बराबर है। 

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