लोकतंत्र के लिए भी लड़ो और जिंदगी के लिए भी


हम झूठ बोलने या लिखने में यकीन नहीं रखते,फिर भी हमारा दावा है कि हमने आज से पहले आम आदमी की जिंदगी और लोकतंत्र के लिए पिछले पचास साल में इतना गंभीर खतरा कभी नहीं देखा जितना कि आज है .आम आदमी की जिंदगी से एक विलायती वायरस खिलवाड़ कर रहा है और लोकतंत्र के साथ हमारे राजनीतिक दल,विधायिका और कार्यपालिका .न्यायपालिका को इस खेल में शामिल इसलिए नहीं कर रहा क्योंकि अभी भी गाहे-ब-गाहे अकेली न्यायपालिका है जो लोकतंत्र के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है .
कोरोना की पहली लहर हमने बिना वैक्सीन के अपने तजुर्बों और एहतियात से लड़ी थी .तालियां,थालियां भी बजाईं थीं,मोमबत्तियां भी जलाई थीं,यहां तक कि यानों से फूल भी बरसाए थे ,लेकिन दुष्ट कोरोना नहीं माना. वापस आने के बाद भी कोरोना दोगुना क्षमता के साथ हमारी आबादी पर चढ़ बैठा .कोरोना के खिलाफ सरकार भी मुस्तैदी से लड़ रहा है और एक हद तक समाज भी लेकिन हम लड़ाई में कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं .एक बार फिर से नौबत लोगों को नजरबंद करने की आ गयी है .दो-दो वैक्सीन भी हमारी बहुत ज्यादा मदद नहीं कर पा रहीं हैं .
दुनिया के लिए हो या न हो लेकिन भारत के लिए ये आजादी के बाद की सबसे बड़ी दुरावस्था का समय है. इसके लिए नेहरू से लेकर नरेंद्र तक कोई दोषी नहीं है.ये हमारी बदनसीबी है जो हमें यहां तक ले आयी है .कोरोना से दुनिया में सबसे ज्यादा जिंदगियां खोने वाले अमेरिका में भी कोरोना की दूसरी लहर का उतना आतंक नहीं है जितना कि भारत में है .कोरोना के इलाज के तमाम संसाधन बौने साबित हो रहे हैं .डाक्टर असहाय हैं,अस्पतालों में बिस्तर,जीवनरक्षक गैस और दवाएं कम पड़ रहीं हैं.,लोग बेमौत मर रहे हैं .हमारे मरघट लगातार तप रहे हैं ,देह भस्मकों की चिमनियां पिघल रहीं हैं ,उनका दिल भी ये मार्मिक दृश्य देखकर धधक रहा है ,लेकिन कोई करे तो करे भी क्या ?
मध्यप्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक अनेक राज्य सरकारों को कोरोना के दुसरे संघटक प्रहार से अवाम को बचने के लिए हारकर कर्फ्यू और निषेधाज्ञा जैसे घिसे-पिटे तरीकों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है,लेकिन सवाल ये है कि क्या कर्फ्यू और निषेधज्ञाएं कोरोना की रोकथाम का स्थाई विकल्प हैं ? कोई भी युद्ध मैदान में लड़ा जाता है. छापामार युद्ध क्षणिक सफलताएं दिलाने के लिए तो कारगर हैं किन्तु स्थायी विजय दिलाने में समर्थ नहीं हैं .हम आबादी को आखिर कितने दिन तक नजरबंद रहने के लिए बाध्य कर सकते हैं ?लोकडाउन के भीषण और मर्मान्तक दुष्परिणाम हम बीते साल देख चुके हैं ,अब यदि उन्हीं तौर-तरीकों को दोहराया जाता है तो शायद अपेक्षित परिणाम हमें न मिलें
कोरोना से सरकार और अवाम मिलकर लड़े तभी सुखद नतीजे हासिल हो सकते हैं ,केवल उत्साव मनाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है.दुर्भाग्य ये है कि ऐसा हो नहीं रहा है. हमारी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं और सियासी रंजिशें मोर्चे पर एक साथ खड़े होने से रोक लेती हैं .जनता और सत्ता के बीच जन्में अविश्वास ने इस संकट को और गहरा कर दिया है.
अब आइये बात करते हैं लोकतंत्र की. लोकतंत्र के ऊपर मंडराते खतरे हमें कोरोना के आतंक के कारण दिखाई नहीं दे रहे. देश में पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से चुनाव लड़े जा रहे हैं वे काफी खतरनाक हैं. हमारे देश के प्रधानमंत्री जी का आधे से ज्यादा समय इन चुनावों में स्टार प्रचारक की भूमिका का निर्वाह करते ही बीत जाता है. विधानसभाओं के ही नहीं स्थानीय निकायों के चुनाव भी अब प्रधानमंत्री का चेहरा दिखाकर लड़े जा रहे हैं .प्रधानमंत्री जी का इसमने कोई दोष नहीं है,दोष है हमारे सिस्टम का ,जिसे हम सुधारना ही नहीं चाहते .
देश में कोरोना से लड़ाई लड़ी जा रही है लेकिन प्रधानमंत्री जी मुख्यमंत्रियों से ऑनलाइन बैठकें कर रहे हैं.आमने-सामने बैठने में उन्हें कोरोना संक्रमण का खतरा है किन्तु विधानसभा चुनावों के लिए पांच राज्यों में दिन-रात एककर चुनाव प्रचार करने में उन्हें और उनके मंत्रियों को कोई संकोच नहीं .कोई टिप्पणी करे तो उसे राष्ट्रद्रोही बता देना आम बात हो गयी है .अरे भाई जब आप बैठकें आभासी मीडिया के जरिये ले रहे हो तो चुनाव प्रचार भी आभासी साधनों से कर लो ! क्यों अपनी जान खतरे में डाल रहे हैं?क्यों जर्जर अर्थव्यवस्था को और नुक्सान पहुंचा रहे हैं .चुनाव प्रचार में आप जिस गंभीरता के साथ उतरे हैं उससे खुदा न खास्ता आपको कुछ हो गया तो इस देश का क्या होगा ?
प्रधानमंत्री के रूप में हमें पहली बार विविध रूप वाला हीरा मिला है ,लेकिन ये हीरा लोकतंत्र की सेहत को लेकर गंभीर कितना है ,कितना नहीं इसका मूल्यांकन होना अभी बाक़ी है. मेरी नजरों में ही नहीं बल्कि पूरे देश की नजरों में चढ़ने के लिए ये सुअवसर था,यदि प्रधानमंत्री जी आजादी के बाद के इस संबसे बड़े संक्रमणकाल में विधानसभा चुनावों के प्रचार से अपने आपको अलग कर लेते.लेकिन क्यों कर लेते ?उनके लिए पार्टी,सत्ता पहले है देश बाद में .यदि ऐसा न होता तो वे सचमुच विधानसभा चुनावों के लिए रात-दिन एक न करते .उनकी मुख मुद्रा ही बदल गयी.दाढ़ी-मूंछें ही नहीं अपितु सर के बाल तक बढ़ गए एक बंगदेश को छोड़ वे साल भर से विदेश नहीं गए .
ये पब्लिक है,ये सब जानती है कि आप एक तरफ कोरोना के खिलाफ छद्म युद्ध लड़ते हुए जनता से घरों में बैठने,मास्क पहनने और दो गज की दूरी बनाये रखने की अपीलें कर रहे हैं और दूसरी तरफ खुद ही इन सबका उल्लंघन कर रहे हैं .आप जानते हैं कि भारत नार्वे जैसा देश नहीं है जहां क़ानून का उल्लंघन करने पर प्रधानमंत्री तक को अर्थडण्ड दिया जा सकता है .यहां तो अर्थ दंड देने वाली संस्थाएं या तो पालतू तोता हैं या केंचुआ .आपकी भृकुटि से डरती हैं बेचारी .वे आपके खिलाफ कोई कार्रवाई करने के बारे में सोच भी नहीं सकतीं .
हम लेखकों का काम जो है सो हम कर रहे हैं,हालांकि इसके लिए हमने भी रोजाना सौ बातें सुनना पड़तीं हैं. कोई कहता है कि हमारे दिमाग में मवाद भरा है.कोई हमें चश्मा बदलने की सलाह देता है ,कोई मूर्ख कहता है तो कोई खल और कोई कामी .लेकिन इससे हमारे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम जन सेवा के लिए पगार लेकर उपस्थित नहीं हैं. हम जनसेवा के बजाय चुनाव प्रचार में नहीं उलझे हैं. हम पर उपदेश कुशल बहुतेरे वाले उपदेशक भी नहीं हैं. हम आम आदमी के बीच रहने वाले लोग हैं .हमारे लिखे में जो स्पंदित होता है वो आपको न संसद में सुनाई देगा और न विधानसभाओं में .महीनों से सड़कों पर बैठे किसान जब आपको नहीं नजर आये,धरने पर बैठीं देश की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री किसी को नजर नहीं आती तो हमारी तो बिसात ही क्या है. ? जय श्रीराम
@ राकेश अचल

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