कोरोना कर्फ्यू और टीका उत्सव


प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कुछ मश्विरे और निर्णय कभी-कभी रालोद के संस्थापक लालू यादव की बेसाख्ता याद दिलाते हैं.हमारे देश की राजनीति में ये दो ऐसे महापुरुष हैं जो आपको किसी भी समय हंसा सकते हैं,इस समय देश कोरोना की दूसरी लहर से बुरी तरह आतंकित है लेकिन प्रधानमंत्री जी ने इसी आतंक के बीच रात के समय लगाए जाने वाले कर्फ्यू को ‘कोरोना कर्फ्यू’ कहने और अगले चार दिन तक देश भर में कोरोना की टीके लगाए जाने के कार्यक्रम को टीका उत्सव के रूप में मनाने का आव्हान पूरे देश से किया है .
पिछले साल प्रधानमंत्री जी ने कोरोना वारियर्स के लिए थाली और शंख बजवाये थे,दीपाली मनवाई थी .कोरोना के प्रति इतना आदरभाव देखकर ही लगता है कि कोरोना लौटकर ज्यादा वेग के साथ लोगों को चपेट में ले रहा है .कोरोना से निबटने के लिए आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच भारत में 45 वर्ष से ऊपर के करीब 9 .5 करोड़ लोगों को कोरोना का टीका लगाया जा चुका है .टीके की मांग ज्यादा और आपूर्ति कम है इसलिए सरकार को पहली और दूसरी खुराक के बीच का अंतर् बढ़ने के साथ ही टीका वितरण में भी अनुशासन का पालन करना पड़ रहा है .
हमारी सरकार आपदा को अवसरों में बदलने में सिद्धहस्त है इसलिए उसने सबसे पहले महाराष्ट्र को निशाने पर रखा.महाराष्ट्र में कोरोना की विशेष कृपा है लेकिन केंद्र सरकार की कृपा नहीं है. महाराष्ट्र को जितने टीके चाहिए उतने केंद्र दे नहीं रहा,हारकर हाईकोर्ट को कहना पड़ा की महाराष्ट्र के साथ अन्याय न किया जाए .हमारे यहां जब तक अदालत हस्तक्षेप न करे काम दुरुस्त होता ही नहीं है. अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही महाराष्ट्र में पूर्व गृहमंत्री द्वारा एक पुलिस अफसर से सौ करोड़ की चौथ का मामला सीबीआई को सौंपा जा सका .
एक तरफ टीका संकट है दूसरी तरफ प्रधानमंत्री जी का टीका उत्सव मनाने का निर्देश,बेचारे मुख्यमंत्रीगण पशोपेश में हैं कि उत्सव मनाने के लिए पर्याप्त टीके कहाँ से लाएं .लेकिन हम आशावादी देश के लोग मानते है कि-‘ जब भगवान चौंच देता है तो चुग्गा भी देता ही है’ .जब प्रधानमंत्री जी ने आव्हान किया है तो केंद्र कहीं न कहीं से टीका भी उपलब्ध कराएगा ही .मजे की बात ये है कि टीका उत्सव मनाने के लिए भी प्रधानमंत्री जी ने 11 और 14 अप्रैल की तिथियां चुनी है.एक दलितोत्थान के महानायक महात्मा ज्योति बा फुले की जयंती है तो एक भारतीय संविधान की रचना में कारगर भूमिका निभाने वाले डॉ भीमराव अम्बेडकर की जन्मतिथि .यानि दोनों की जयंतियां उत्सव के साथ मनाई जाएँगी ,इसमें न हल्दी लगेगी और न फिटकरी और रंग चोखा आ ही जाएगा .
राजनीति में दूर की सोचना भी पड़ती है और दूर की कौंड़ी लाना भी पड़ती है हमारे प्रधानमंत्री जी ने ये दोनों काम किये हैं.गनीमत ये है कि उन्होंने टीका उत्साव मानते समय ये निर्देश नहीं दिए कि इन चार दिनों में केवल दलितों को ही टीका लगाया जाएगा .काश वे ऐसा करते तो ज्यादा आनंद आता .इस समय देश में जो टीकाकरण चल रहा है उसमें दलितों का नंबर आया या नहीं,किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की .मै तो कहता हूँ कि इन चार दिनों में हर दिन महात्मा फुले और डॉ अम्बेडकर के नाम पर एक के साथ एक टीका मुफ्त देने की योजना भी चलाई जाना चाहिए .देश में हमारे दलित भाई ही कोरोना की पहली लहर में सबसे ज्यादा परेशान हुए थे और इस बार भी वे टीकाकरण में सबसे पीछे हैं .
प्रधानमंत्री जी को चाहिए था कि वे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में रैलियों और रथ यात्राओं में व्यस्त अपने तमाम नेताओं,स्टार प्रचारकों और कार्यकर्ताओं को कोरोना भगाओ अभियान में लगा दें. बंगाल से ममता भगाओ अभियान के बाद सरकार के पास फिलहाल कोई दूसरा काम है भी नहीं .जम्मू -कश्मीर,मंदिर-मस्जिद विवाद और तीन तलाक जैसे मुद्दे समाप्त हो ही चुके हैं और नक्सलवादियों के खिलाफ अभी जंग का मौसम नहीं है ऐसे में कोरोना ही दुश्मन नंबर एक हो सकता है.हो क्या सकता है,है ही.
करना की दूसरी लहर ने किसान आंदोलन को बीमार कर ही दिया है.कांग्रेस निबट ही चुकी है ऐसे में सरकार चाहे तो देश में दोबारा आपातकाल लगाने पर भी विचार कर सकती है.केवल एक सतर्कता बरतना पड़ेगी कि आपातकाल के आगे स्वास्थ्य शब्द जोड़ना पडेगा .सबका साथ और सबका विकास करने के लिए ये तो बहुत छोटी सी जोड़तोड़ होगी और कोई इसका बुरा भी नहीं मानेगा.हम जैसे मुठ्ठी भर लोग गागरोनी जाएंगे भी तो उसकी अनदेखी आसानी से की जा सकती है .
कोरोना की दूसरी लहर देश वासियों को लुभाने और बीमार अर्थव्यवस्था को बूस्टर डोज देने के लिए दूसरा पैकेज घोषित करने का सही समय है. पैकेज में केवल घोषणा करना पड़ती है ,कुछ देना तो पड़ता ही नहीं है.और मान लीजिये कि देना भी पड़े तो कौन सा घाटे का सौदा है 20 लाख करोड़ दो और इक्कीस लाख करोड़ कमा लो ,जरा सा पेट्रोल,डीजल और केरोसिन को ही तो
‘छू ‘ करना है .
मुझे पता है कि कोरोना के प्रति मेरे गंभीर सुझावों को देश उसी तरह गंभीरता से नहीं लेगा जैसा कोरोना ने दुनिया वालों को नहीं लिया और राशन-पानी लेकर दोबारा चढ़ बैठा .मर्जी है आपकी क्योंकि कोरोना है आपका.हम तो माननीय प्रधानमंत्री जी के कृतज्ञ हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्रियों से कह दिया कि रात के समय लगाए जाने वाले गैर जरूरी कर्फ्यू को कोरोना कर्फ्यू का नाम दिया जाये. नाम हर किसी को मिलना चाहिए.बेचारा कर्फ्यू क्यों बिना नाम के रह जाये ? हमें तो 1971 और 1974 वाला कर्फ्यू ही याद है .कोरोना कर्फ्यू भी अब ताउम्र याद रहेगा .कर्फ्यू भी अपने नए नाम को लेकर माननीय प्रधानमंत्री जी के प्रति कृतज्ञ होगा .काश कि ऐसे ही कर्फ्यू चुनावों के समय दिन में भी लगाए जा सकें हमारे केंचुए को जल्द ही जन प्रतिनिधित्व क़ानून में संशोधन का इसका प्रावधान करना चाहिए .इससे हमारी दूषित और महा बदनाम चुनाव प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन आ सकता है. हम कोरोनाकाल में लाकडाउन की तरह बिना प्रचार वाला चुनाव भी झेल सकते हैं .वैसे सरकार चाहे तो सरकारी पारी को कह सकती है कि वो देश में अब तक कोरोना का टिका लगवा चुके सभी लोगों को अपनी पार्टी का निशुल्क सदस्य बना ले .सदस्य्ता शुल्क प्रधानमंत्री केयर फंड से दे दिया जाएगा .
@ राकेश अचल

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