
मध्यप्रदेश में श्री शिवराज सिंह चौहान के चौथे मुख्यमंत्रित्वकाल का एक साल पूरा हो गया,कोई मुझसे यदि इस एक साल के कामकाज का आकलन करने को कहे तो मै एक पंक्ति में कहूंगा कि -‘ये शिवराज के नहीं तालमेल के राज का एक साल है ‘. इस एक साल में मध्यप्रदेश की रेखांकित करने वाली यदि कोई उपलब्धि है तो वो ये कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कांग्रेस से भाजपा में आये काहरों के साथ पूरे साल अपनी पालकी बड़ी ही कुशलता से ढुलवाई है .
पिछले साल श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की कांग्रेस से बगावत के बाद कांग्रेस केी सरकार का पतन हो गया था .इस घटनाक्रम में सियासत का भी पतन हुआ और इसी अधोपतन में भाजपा का उन्ननयन हो गया और शिवराज सिंह चौहान उन्हीं महाराज के साथ सरकार बनाने में कामयाब हो गए जो ेढाई साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में उनके मुख्य प्रतिद्वंदी थे . बीते एक साल में शिवराज सिंह की उपलब्धियां सरकारी विज्ञापनों के जरिये गिना दी गयीं है लेकिन जिसे विज्ञापन में जगह नहीं मिली वे हैं एक ज्योतिरादित्य सिंधिया और दूसरा शिवराज सिंह का सिंधिया के साथ आश्चर्यजनक तालमेल .इस तालमेल के लिए मै मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को बधाई देता हूँ .
किस्मत के मामले में शिवराज सिंह का कोई मुकाबला नहीं है. वे विधानसभा चुनाव में पार्टी की नाव डुबो चके थे लेकिन 18 महीने में ही उनकी किस्मत से ही कांग्रेस की सरकार गिर गयी और वे बिना दोबारा चुनाव लड़े ही चौथी बार सत्ता में आ गए .ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस में आये विधायकों में से जो शिवराज के लिए सर दर्द हो सकते थे वे शिवराज सिंह चौहान की किस्मत से ही उप चुनाव हार गए .शिवार सिंह की किस्मत ही है कि उन्हें अक्सर खो देने की कोशिश करने वाले भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय बंगाल विधान सभा चुनाव में उलझा दिए गए और केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर देश की अभूतपूर्व किसान समस्या में उलझकर रह गए .
बीते एक साल में कोविद का सनकर्मण शिवराज सिंह चौहान के लिए लगातार ढाल का काम करता रहा. सरकार में आने के छह माह उन्हें विधानसभा उपचुनाव लड़ने,जीतने और बाद में नए साथियों के साथ तालमेल बैठने में लग गए .जनता की सा वे करते तो कहाँ से करते ?हाँ इस बीच मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश की तर्ज पर मप्र में धार्मिक स्वतंत्रता क़ानून जरूर बनवा लिया ,जो पार्टी एजेंडा का प्रमुख अंग था .गुजरे एक साल में कांग्रेस का रहा-शा कचूमर भी निकल गया .महाराज विहीन कांग्रेस संगठित होते-होते बिखर सी गयी और आज भी कांग्रेस राज्य में शिवराज सिंह चौहान के लिए कोई बड़ी और कड़ी चुनौती खड़ी करने की स्थिति में नहीं है .
बीते एक साल में राजनितिक उठापटक का सबसे जयादा लाभ प्रदेश की नौकरशाही ने उठाया .शिवराज सिंह चौहान की किस्मत ही है कि यहां उनके खिलाफ कोई परमवीर खड़ा नहीं हुआ अन्यथा यहां भी बीते एक साल में वही सब हो रहा है जो महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार में कथित रूप से हुआ .मध्यप्रदेश में कौन ,कहाँ तैनात किया जाएगा इसकी बाकायदा एक समानांतर प्रक्रिया है .श्यामला हिल इस मुद्दे पर अपना अतीत धूमिल कर चुका है .इस एक साल में रेड्डी,जुलानिया और इकबाल सिंह के नाम से प्रदेश की जो शोहरत बढ़ी वो किसी से छिपी नहीं है .
तालमेल के इस राज में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हालांकि महाराज के हाथों की कठपुतली बनने से बच गए लेकिन महाराज के सामने उनकी स्थिति मुख्यमंत्री जैसी दिखाई कभी नहीं दी .गनीमत ये है कि इस एक साल में शिवराज सिंह चौहान और उनकी पार्टी को समझने में ही ज्योतिरादित्य सिंधिया की तमाम शक्ति खर्च हो गयी. आज भी वे अपने तमाम समर्थकों को मनमाफिक फायदे नहीं दिला पाए हैं .उनके अपने अंचल में तमाम राजनीतिक नियुक्तियां अधर में लटकी हुई हैं .
बीते एक साल में प्रदेश की सरकार पहले की तरह लोकप्रियता का शिखर अभी तक नहीं छू पाई है. प्रदेश में माफिया के खिलाफ चलाया गया अभियान रह-रह कर दम तोड़ देता है. भूमाफिया तो फिर भी थोड़ा दबाव में है लेकिन रेत माफिया लगातार सरकार को ठेंगा दखा रहा है .जाहिर है कि प्रदेश में नौकरशाही और सियासत के बीच का गठबंधन कमजोर हुआ है और इसकी एकमात्र वजह ये है कि मैदान में जो भी है बाकायदा टेंडर के जरिये आया है.नौकरशाही में पदस्थापनाओं को लेकर टेंडरबाजी का कोई प्रमाण नहीं होता क्योंकि दोनों पक्ष ही इसके हितग्राही होते हैं .
प्रदेश में क़ानून और व्यवस्था की स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है.प्रदेश में नौकरशाही और पुलिस का इकबाल बुलंद करने के लिए मुख्यमंत्री जी भरपूर प्रयास कर रहे हैं लेकिन उनकी अपनी टीम शायद उनके साथ कदमताल नहीं कर पा रही है .विधायक पीटीआई को लेकर सुप्रीम कोर्ट मध्यप्रदेश सरकार के लत्ते ले चुकी है किन्तु सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा है ,पड़ेगा भी नहीं क्योंकि सरकार पूरी तरह से बेफिक्र है .
शिवराज सिंह चौहान सरकार के प्रायोजित परिशिष्टों पर भरोसा कीजिये तो प्रदेश आत्मनिर्भर है.सरकार ने किसानों की किस्मत बदल दी है .सरकार की उपलब्धियों के बारे में मै मेहनत इसलिए भी नहीं कर रहा क्योंकि सरकार ने करोड़-दो करोड़ रूपये के विज्ञापन इस काम पर पहले ही खर्च कर दिए हैं .हमें सरकारी दावों पर यकीन कर लेना चाहिए,आखिर ये आंकड़े सरकार कितने श्रम से तैयार कराती है .मै बीते 365 दिन चली तालमेल की इस सरकार को अपनी शुभकामनाएं देता हूँ ,सरकार को कोसने का काम तो 364 दिन मै और मेरे जैसे तमाम लोग करते ही हैं. हमें उम्मीद करना चाहिए कि अगले विधानसभा चुनावों तक प्रदेश में शिवराज और महारज के बीच ये तालमेल बना रहेगा .
@ राकेश अचल








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