देश के मूर्धन्य लेखक राकेश अचल की कलम से-मप्र में “आदमी और जानवर” का खाना एक जैसा!!


आज मै अपनी नहीं बल्कि मध्यप्रदेश से एनडीटीवी के लिए काम करने वाले पत्रकार श्री अनुराग द्वारी की खबर आपके लिए उठाकर लाया हूँ .ये खबर बताती है कि हमारे मध्यप्रदेश की सरकार कितनी समाजवादी है की आदमी और जानवर में कोई अंतर् नहीं करती .आप हैरान होंगे की जब पूरा देश कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहा था उसी दौरान लॉकडाउन में केन्द्र और राज्य सरकारों ने गरीबों को मुफ्त में अनाज देने के बड़े-बड़े वादे किए, ये खबरें सुर्खियां बनीं, जो नहीं बनीं वह ये थीं कि इस खाने से पोषण भी मिलेगा या सिर्फ पेट भरेगा! एक और बात जो सुर्खियों में नहीं आई कि इसकी गुणवत्ता क्या है? दूसरे सवाल का जवाब कम से कम मध्यप्रदेश के लिए तो केन्द्र सरकार ने ही दे दिया है. दो आदिवासी बहुल जिलों- मंडला और बालाघाट में चावल को जांचा गया है. कहा है कि इंसान तो छोड़िए, इसे भेड़-बकरियों की खिला दीजिए.
आदिवासी बहुल बालाघाट के मोतीनगर में बसंत हाथ ठेला चलाकर छह लोगों का पेट पालते हैं. वे कहते हैं कि ”लॉकडाउन में मुफ्त में सरकारी राशन तो मिला, लेकिन कैसा? जो जानवर नहीं खाता वो हमें दे रहे हैं, 18 किलो चावल, 12 किलो गेंहू मिलता है, लेकिन चावल बाहर से खरीदकर ही खाना पड़ता है.”मोतीनगर की झुग्गी में चाहे संगीता वंशकार का दरवाजा खटखटा लें, चाहे किसी और का, सरकारी राशन को लेकर सबकी यही राय है. अनाज क्या दे रहे हैं, खा नहीं सकते. कोई जानवर भी नहीं खाएंगे.
अलका बाई कहती हैं कि चावल में मिट्टी बहुत है, खा नहीं पा रहे हैं. घुन लग रहा है, अच्छे से पहुंचाओ तो गरीब खा सकेंगे नहीं तो क्या मतलब है. वहीं मकसूद खान कहते हैं, प्रदेश सरकार जो फ्री में राशन दे रही है वो इतना घटिया दे रही है … घुन लगा है, गरीबों को मजाक बना दिया है, धोकर छानकर भी खा रहे हैं तो खराब लग रहा है. सरकार फ्री में दे रही है तो ऐसा तो दे कि गरीब खा सकें.
इन लोगों की शिकायत को केन्द्र सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने सही माना है. शिवराज सरकार को भेजी रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल 30 जुलाई से 2 अगस्त तक बालाघाट और मंडला में 32 सैंपल एकत्र किए गए, 31 डिपो से और एक राशन की दुकान से. सीजीएएल लैब में परीक्षण के बाद पाया गया कि सारे नमूने ना सिर्फ मानकों से खराब थे, बल्कि वो फीड-1 की श्रेणी में हैं जो बकरी, घोड़े, भेड़ और मुर्गे जैसे पशुधन के लिए उपयुक्त है.”
मध्यप्रदेश में नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री बिसाहूलाल साहू को इस खत के बारे में जानकारी तक नहीं है. वे कहते हैं कि अभी तक मुझे ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली है. अगर आएगी तो निश्चित कार्रवाई करूंगा.
गोदामों के रिकॉर्ड के मुताबिक, जहां से सैंपल लिए गए वो मई-जुलाई 2020 में खरीदे गए थे, रिपोर्ट कहती है ना सिर्फ चावल पुराने और घटिया हैं, बल्कि जिन बोरियों में इन्हें रखा गया है वो भी कम से कम दो से तीन साल पुरानी हैं. खरीद से लेकर पूरे वितरण में गंभीर खामियां हैं. इस पूरी प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों, कर्मचारियों पर कार्रवाई की जानी चाहिए. ऐसे खाद्यान्न की आपूर्ति करने वाले राइस मिलर्स को तत्काल ब्लैक लिस्ट किया जाए.
कांग्रेस इस मामले में हमलावर है. पूर्व पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री कमलेश्वर पटेल कहते हैं कि बाढ़ के साथ सेल्फी की नौटंकी छोड़कर सरकार को पीड़ितों के नुकसान की भरपाई करनी चाहिए. अनेक राशन दुकानों पर जिसे खाया नहीं जा सकता ऐसे अनाज का वितरण किया जा रहा है. सरकार को ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए.
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत मध्यप्रदेश की कुल आबादी का 75 फीसदी हिस्सा खाद्यान्न सुरक्षा के दायरे में आता है. राज्य में 25 हजार 490 राशन दुकानों के माध्यम से साल 2011 की जनगणना के मुताबिक एक करोड़ 17 लाख, यानी लगभग पांच करोड़ छह लाख से ज्यादा हितग्राहियों को, एक रुपये किलोग्राम के हिसाब से गेहूं और चावल मुहैया कराया जा रहा है. लेकिन अभी कुछ दिनों पहले ही पता लगा था कि राज्य में 36 लाख ऐसे गरीब हैं जिन्हें गरीब होने के बावजूद सरकारी राशन नहीं मिल पाता है. वहीं 96 लाख ऐसे गरीब हैं जिनके नाम राशन कार्ड में जुड़े हुए हैं मगर वो अलग-अलग कारण से सरकारी राशन पाने के लिए पात्र नहीं हैं, यानी फर्जी हैं.
और अब जो राशन मिला है, केन्द्र सरकार कह रही है कि वो घटिया क्वॉलिटी का है. इतना घटिया जिसे भेड़-बकरियों को दिया जा सकता है, इंसानों को नहीं. केन्द्र ने अपनी रिपोर्ट में सरकार से कहा है कि जो चावल डिपो में मौजूद है उसके वर्गीकरण और जांच तक उसको बांटा ना जाए, साथ ही जल्द से जल्द कार्रवाई रिपोर्ट सौंपें.
अनुराग एक बेहतर और सुलझे हुए पत्रकार हैं,मेरी तरह बदनाम नहीं हैं ,इसलिए उनकी रिपोर्ट पर मुझे क्या हर आदमी को भरोसा करना चाहिए,वैसे भी भरोसे के काबिल पत्रकार बचे ही कितने हैं .अनुराग की रिपोर्ट का साफ़ मतलब है की मध्यप्रदेश में राम राज अयोध्या में राम मंदिर बनने से पहले ही आ चुका है ,जानवर और इंसान एक जैसा दाना खाना खा रहे हैं .इस रिपोर्ट के बाद मध्यप्रदेश के संवेदनशील मुख्यमंत्री शहरी शिवराज सिंह की आत्मा जाग सकती है .न जागे तो उसे जगाना चाहिए,हम सबको मिलकर जगाना चाहिए और उन पर दबाब बनाना चाहिए की वे न सिर्फ अपने खाद्यमंत्री को हटा दें बल्कि मामले की निष्पक्ष जांच करा कर दोषियों को सजा भी दिलाये.सजा ऐसी न हो जैसी सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को सुनाई है.सजा क़ानून के हिसाब से ही हो .

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