
शतक से सात अंक दूर खड़े कांग्रेस के दिग्गज नेता मोतीलाल वोरा जिंदगी की क्रिकेट खेलते हुए भरपूर आनंद के साथ विदा हो गए . अपने से 32 साल बड़े मोतीलाल वोरा के बारे में लिखते हुए स्थिति स्थितिप्रज्ञ जैसी हो जाती है .वोरा जी कांग्रेस के इतिहास की आधी सदी के सफल योद्धा थे .वोरा जी जीवन की अंतिम सांस तक कांग्रेस संगठन में जिम्मेदारी का निर्वहन करते रहे .
मोतीलाल वोरा से अपने निजी संस्मरणों का जिक्र करने के बजाय मै उन्हें समग्र रूप से कांग्रेस का अजातशत्रु निरूपित करने में ज्यादा गौरव अनुभव करता हूँ.
वे 1970 में समाजवादी पार्टी छोड़कर कांग्रेस में आये थे और पूरी आधी सदी कांग्रेस में ही रहकर निर्वाण को प्राप्त हुए .वोरा जी कांग्रेस के उन गिने-चुने नेताओं में से थे जो न तो देवकांत बरुआ बने और न सीताराम केसरी लेकिन उन्हें कांग्रेस के सभी अध्यक्षों का ही नहीं अपितु समूची कांग्रेस कार्यसमिति का अंत तक सम्मान हासिल हुआ .वोरा जी ने अपने जीवन में मान-अपमान की चिंता कभी की हो ऐसा मुझे याद नहीं आता क्योंकि विवाद उनसे कोसों दूर रहे या आप कह सकते हैं की वे विवादों से कोसों दूर रहे .
कांग्रेस का इतिहास उठाकर देख लीजिये आपको मोतीला वोरा जैसे निस्पृह और निष्ठावान कार्यकर्ता और नेता गिने-चुने ही मिलेंगे .पार्टी ने बीते पचास साल में उन्हने जो जिम्मेदारी दी उसे उन्होंने बिना किसी ना-नुकुर के शिरोधार्य किया. शिरोधार्य ही नहीं किया बल्कि अपनी पूरी ताकत से उसका निर्वहन भी किया .वे पत्रकारिता की डगर छोड़कर राजनीति में आये थे .उनके संस्कारों में ‘दैनिक अमृत सन्देश ‘ने शायद अमृत भर दिया था .उनके व्यवहार में कटुता जैसे थी ही नहीं .वे अविभाजित मध्यप्रदेश के ऐसे कांग्रेस नेता थे जिन्हें घर बैठे मुख्यमंत्री बना दिया गया. तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीयय अर्जुन सिंह की नाटकीय विदाई के बाद वे कैसे मुख्यमंत्री बन गए ये कहानी बहुत लम्बी और रोचक है लेकिन आज मै उसका जिक्र नहीं करूंगा .
मोतीलाल वोरा में समन्वय की अभूतपूर्व क्षमात थी जो उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए प्रदर्शित की. मध्यप्रदेश में धड़ों में बनती कांग्रेस के साथ एक समाजवादी चरित्र कैसे निभा सकता है ये वोरा जी ने प्रमाणित किया. वे एक तरफ अर्जुन सिंह गट के भी प्रिय रहे तो दूसरी तरफ माधवराव सिंधिया के भी ख़ास बने रहे. दीगर गुटों ने भी उनके खिलाफ कभी कोई बात कही नहीं .मुंशीपाल्टी की राजनीति से सार्वजनिक जीवन का श्रीगणेश करने वाले वोरा जी कांग्रेस में शीर्ष तक पहुंचे .वे लगातार दो-तीन पीढ़ियों के साथ काम करने वाले कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं में से एक थे .
वोरा जी का चरित्र राजा दशरथ जैसा था ,उनके जाने का सोच करने की कोई वजह नहीं है. रामचरित मानस में कहा गया है कि जिन लोगों का सोच किया जाता है उनमने वेद हीन ब्राम्हण,नीतिहीन राजा या राजनेता ,कंजूस सेठ, ब्राम्हणों का अपमान करने वाला शूद्र ,चरित्रहीन स्त्री,ब्रम्हचारः हीन ब्रम्हचारी ,कर्म मार्ग को त्यागने वाला गृहस्थ ,प्रपंचों में फंसा सन्यासी ,भोग में लिप्त वानप्रस्थी,और दूसरों का अनिष्ट करने वाले शामिल होते हैं,वोरा जी िनमने से किसी श्रेणी में नहीं आते थे .वोरा जी सभी प्रकार से बड़भागी थे इसलिए उनका सोच किया ही नहीं जा सकता .किया भी नहीं जाना चाहिए .उनकी विदाई ससम्मान हो रही है ,वे सदा स्मरणीय रहने वाले हैं .
मुझे याद आता है कि वोरा जी 1988 में एक बार केंद्र की राजनीति में गए तो उन्होंने मुड़कर राज्य की और नहीं देखा ,अन्यथा केंद्र में जाकर भी तमाम नेताओं की आत्मा आपने गृहराज्य के मुख्य मंत्री पद में अटकी रहती है. वे संसद के दोनों सदनों के सदस्य रहे,राजयपाल बने और तो और मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे. उन्होंने ही सबसे पहले राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवारी का समर्थन किया .
कांग्रेस में जैसे अहमद पटेल पार्टी की जरूरत रहे वैसे भी वोरा जी भी कांग्रेस की और गांधी परिवार की जरूरत थे. वोरा जी ने भी अहमद पटेल की तरह पार्टी और गांधी परिवार के त्मा जाने-अनजाने रहस्यों को उदरस्थ करके रखा उन्हें कभी सार्वजनिक नहीं किया .गांधी परिवार ने भी वोरा जी को वे तमाम जिम्मेदारियां सौंपी जो किसी दूसरे कांग्रेस नेता को नहीं दी जा सकती थी.वोरा जी ने अपना जीवन जिस तरह जिया वैसा जीवन बहुत कम लोग जी पाते हैं .राजस्थान की तत्कालीन जोधपुर रियासत में 20 दिसंबर 1927 को जन्मे मोतीला वोरा का जीवन जैसे मध्यप्रदेश के लिए ही था. उनका भरा-पूरा परिवार है,एक बेटा राजनीति में भी है,विधायक रहा है लेकिन उसके लिए वोरा जी ने कभी अपने प्रभाव का खुलकर इस्तेमाल नहीं किया .यनि आप उनके ऊपर वंशवाद के संरक्षण का आरोप भी नहीं लगा सकते .
ऐसे वोरा जी की सबसे बड़ी पूँजी उनके चेहरे से हमेशा चिपकी रहनी वाली एक सरस् मुस्कान और खामोशी थी.वे बालसुलभ चरित्र के नेता थे. मुख्यमंत्री के रूप में मेरी उनसे अनेक मुलाकाते हैं,वे कभी फ्रन्टलाइनर बनने के लिए उत्सुक नहीं दिखे .ऐसे निश्छल कांग्रेसी नेता,पत्रकार और समाज सेवी के प्रति मेरी विनम्र शृद्धानजलि.वे वर्षों तक आज कि कलुषित राजनीति में नजीर की तरह याद किये जायेंगे .
@ राकेश अचल







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