मोतीलाल जी वोरा को अगर स्मृतियों में निहारू तो स्मरण आता है वह दृश्य- सुबह सवेरे का समय है, मोतीलाल वोरा जी अपने आवास पर श्वेत वस्त्रों में टहल रहे हैं… और मध्यम गति से गीत चल रहा है- वैष्णव जन तो तेने कहिए और फिर रघुपति राघव राजा राम।
महात्मा गांधी के विचारों से ओतप्रोत मोतीलाल वोरा का तिरानबे वर्ष की उम्र में देहांत हो गया वोरा जी एक ऐसे शख्स थे जो राजनीति में रहते हुए भी एक साथ गैर राजनीतिक शख्सियत के स्वामी थे । उन्हें राजनीति के दंभ ने कभी भी अपनी जकड़ में नहीं लिया। बल्कि यह कहें कि उन्होंने राजनीति के सत्ता के चौधराहट को कभी भी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और सदैव विनम्र सरल और आम आदमी के संपर्क में रहने वाले एक महान राजनेता के रूप में उन्हें याद किया जाएगा।
मुझे स्मरण है 2006 का वह समय जब छत्तीसगढ़ के जिला कोरबा की 16 नाबालिग लड़कियों को जो कि आदिवासी थी और राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले कोरवा पंडो जनजाति से थी। उन्हें दिल्ली में दलालों द्वारा एक प्रकार से बेच दिया गया था। यह रिपोर्ट जब मैंने आंखों देखी डीडी न्यूज़ पर प्रसारित कराई और इसी घटनाक्रम में जब यह तथ्य सामने पुरजोर तरीके से विपक्ष के लोग कह रहे थे कि यह गलत है लड़कियां दिल्ली में सुरक्षित है…! तत्कालीन समय में छत्तीसगढ़ में यह मामला सुर्खियों में था मैंने उन्हें अपनी रिपोर्टिंग का वीडियो सीडी के रूप में प्रेषित करते हुए जानकारी दी और एक तरह से भूल गया। क्योंकि मुझे यह लग रहा था कि अन्य राजनेताओं की तरह वोरा जी भी इसे तवज्जो नहीं देंगे। मगर आश्चर्य की उनके कार्यालय से फोन आया और उन्होंने बात करके सारी जानकारी मुझसे एक तरह से रूबरू प्राप्त की और यही नहीं उन्होंने राज्यसभा में यह मसला उठा दिया…। तत्पश्चात उन्होंने यह भी कहा था कि आदिवासी बालिकाओं के संदर्भ में मुझे जो भी मदद चाहिए मैं उन्हें अवश्य बताऊं वह आदिवासी बालिकाओं के इस तरह बेचे जाने के खिलाफ थे और उन्होंने इसके प्रति चिंता जताई थी।

अपने प्रदेश और देश की समस्याओं पर इस तरह उनकी तीक्ष्ण नजर का एक उदाहरण यह बनकर सामने आया किस तरह आदरणीय वोरा जी संवेदनशील हुआ करते थे।

एक पूर्ण गांधीवादी वोरा जी!
मोतीलाल वोरा जी एक पूर्ण रूपेण गांधीवादी शख्सियत के स्वामी थे। अंचल के गांधीवादी पूर्व सांसद स्व. केयूर भूषण चर्चा के दरमियान अक्सर बताया करते थे कि वोरा जी उनसे उम्र में बड़े हैं और एक बड़े महान गांधीवादी हैं। वे बताते थे कि वोरा जी ने गांधीवाद को अपने जीवन में उतारा है। सादगी और सरलता उन्हें गांधीवाद की धरोहर के रूप में ही मिली थी। दिल्ली में रहते हुए जब छत्तीसगढ़ के लोग अनायास उनके यहां पहुंच जाते तो वे उन्हें अपनी टेबल पर बैठा कर खाना खिलाते और देश और छत्तीसगढ़ के हालात पर बात करते। यही नहीं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में भी उन्होंने एक गरिमामय राजनीतिक के रूप में अविभाजित मध्य प्रदेश में लोगों का सम्मान पाया था जो कि दुर्लभ है।मुझे लगता है ऐसी राजनीतिज्ञ अब आगे शायद कभी नहीं होंगे।
पहला गिरमिटिया हेतु सहयोग
पाठकों को शायद यह पता नहीं होगा।
एक दफे गिर्राज किशोर जी ने बातों-बातों में मुझे बताया था कि मोतीलाल वोरा जी जब उत्तर प्रदेश के राज्यपाल हुआ करते थे उस दरमियान गांधीवादी लेखक गिरिराज किशोर “पहला गिरमिटिया” नामक अपना महत्वपूर्ण उपन्यास जो कि गांधी जी के जीवन पर आधारित था लिख रहे थे।
गिरिराज किशोर चाहते थे कि वह दक्षिण अफ्रीका की यात्रा करें और गांधी जी के बताए हुए उन स्थानों का प्रत्यक्ष अवलोकन करके उसे प्रत्यक्ष महसूस करें।यह बात जब राज्यपाल के रूप में पदस्थ वोरा जी को पता चली तो उन्होंने गिरिराज किशोर जी को राजभवन बुलाकर ससम्मान 75000 रूपये की मदद देते हुए दक्षिण अफ्रीका प्रवास हेतु गांधी को समझने और उपन्यास लिखने हेतु मदद की ।







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