किसानों के लिए सार्थक पहल की जरूरत


बातचीत के दौर जारी हैं लेकिन किसान आंदोलन की आग बुझने के बजाय और धधकती दिखाई दे रही है. सरकार यदि आज किसानों के आंदोलन को समाप्त करने में नाकाम रही तो मुमकिन है कि कल से देश के एक करोड़ ट्रक आपरेटर इस हड़ताल में शामिल हो जाएँ और स्थति अराजक बन जाए .सरकार को इस किसान आंदोलन को शाहीनबाग के आंदोलन की तरह न देखना चाहिए और न वैसा ही व्यवहार करना चाहिए .
देश में एक लम्बे आरसे बाद किसानों का एक संगठित आंदोलन दिखाई दिया है .कोई तीन दर्जन किसान संगठन इस आंदोलन के साथ हैं,िनमने सभी किसान संगठन राजनीतिक नहीं हैं.बहुत से किसान संहठन शुरू में इस आंदोलन के साथ नहीं थे लेकिन जब आंदोलन में अंदरूनी ताकत देखि तो तमाम दक्षिण और वाम संगठन भी इस आंदोलन से अपने आपको जोड़ने में गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं .ये बात अलग है कि केंद्र सरकार अभी भी किसान आंदोलन के पीछी कांग्रेस का हाथ बता रही है. हकीकत में कांग्रेस का हाथ तो अब इस लायक रहा ही नहीं कि किसी को सहारा दे सके .
किसानों से जुड़े तीन नए कानूनों को लेकर सरकार और किसान संगठनों के बीच चल रही बातचीत अभी तक निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंची है .सबसे बड़ा संकट भरोसे का है. सरकार किसानों को ये आश्वस्त नहीं कर पा रही है कि केंद्र ने जो क़ानून बनाये हैं वे किसानों के हित में ही हैं .किसान अपने हित-अनहित से बाखूबी परिचित है.किसान को अब न कोई बरगला सकता है और न ही मूर्ख बना सकता है .उसके मन में आशंका सरकार की मंशा से पैदा हुई है ,इसलिए ये सरकार की ही जिम्मेदारी है कि वो ये प्रमाणित करे कि नए क़ानून किसानों की खुशहाली के लिए हैं न कि कारपोरेट के हितों को साधने वाले .
पिछले एक सप्ताह से चल रहे किसान आंदोलन के चलते केंद्र सरकार का रवैया हठधर्मी का दिखाई दे रहा है .सरकार ने नए कानूनों को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है ,सरकार को किसानों की प्रतिष्ठा की शायद कोई फ़िक्र है ही नहीं .यदि किसानों की फ़िक्र होती तो सरकार आनन-फानन में जैसे इन कानूनों को संसद में पारित करने के लिए सक्रिय थी,इन्हें खारिज करने में भी सक्रिय दिखाई देती .आंदोलन के चलते प्रधानमंत्री जी ने मन की बात कार्यक्रम में वविवादास्पद कानूनों की वकालत कर ये संकेत और दे दिए कि केंद्र पीछे हटने वाला नहीं है .
किसान पेशेवर आंदोलनकारी नहीं हैं .वे अपने खेत-खलिहान छोड़कर हाड कंपा देने वाली सर्दी में दिल्ली के बाहर डेरा डालकर बैठे हैं तो निश्चित ही उनकी कोई न कोई विवशता होगी ! किसान किसी के बरगलाने पर दिल्ली नहीं आये हैं.उन्हें ढोकर नहीं लाया गया है. कांग्रेस में इतनी तथा नहीं है कि वो इतने किसानों को संगठित कर दिल्ली तक ले आती .वामपंथियों की तो हैसियत ही सीमित है .अकाली दल की भी अपनी सीमाएं हैं ,इसलिए अब सरकार को मानना ही होगा कि मौजूदा आंदोलन सियासी आंदोलन नहीं है बल्कि ये आंदोलन सचमुच किसानों का आंदोलन है.
सवाल ये है कि गतिरोध है कहाँ,कौन इसे दूर करेगा ? क्या आपको लगता है कि किसान इस बार खाली हाथ दिल्ली से लौट जायेंगे ?मुझे ऐसा बिलकुल नहीं लगता.मुझे लगता है कि यदि शीघ्र ही गतिरोध न टूटा तो निश्चित ही देश में स्थितियां बेकाबू हो सकतीं हैं ,कोई दो करोड़ की आबादी वाली दिल्ली में अगले कुछ ही घंटों में त्राहि-त्राहि मच सकती है ,इसलिए जरूरी है कि इस मामले में केंद्र सरकार अपनी हठधर्मिता का त्याग कर किसानों से बातचीत के जरिये मसले को सुलझाए.किसानों के आंदोलन के समर्थन में अब दूसरे वर्गों के लोग भी शामिल हो रहे हैं .यानी आंदोलन की ढंक लगातार बढ़ रही है .
किसान आंदोलन को अब कुचलना आसान नहीं है.सरकार के पास ताकत है लेकिन क्या सरकार किसानों पर लाठी-गोली चलाने का दुस्साहस दिखा पाएगी ? शायद ऐसा कभी न होगा .ये कोई चीन का ‘थ्यानमयान ‘ चौक नहीं है जो किसानों पर बुलडोजर चढ़ा दिए जाएँ .किसान बातचीत से ही संतुष्ट होंगे ,उनकी आशंकाओं का निराकरण जिस दिन हो जाएगा,उसी दिन आंदोलन समाप्त हो जाएगा .सरकार फैसले तक पहुँचने में जितना अधिक समय लगाएगी उतनी ज्यादा समस्या बढ़ेगी .आंदोलन में अभी तीन किसान अपनी आहुति दे चुके हैं. ये शहीद होने वाले किसान न शहरी नक्सली हैं और न देहाती नक्सली.ये केवल किसान हैं और किसानी के अलावा किसी राजनीतिक गुणाभाग से दूर हैं .सरकार को भी किसानों से राजनीति नहीं करना चाहिए .
देश में दरअसल संक्रमण का समय है. एक तरफ कोरोना महामारी है ,दूसरी तरफ कोरोनाकाल में ध्वस्त हो चुकी अर्थव्यवस्था .देश लगभग बेपटरी है ,ऐसे में देव दीपावली मनाकर क्षणिक आनंद तो लिया जा सकता है लेकिन संकट से नहीं उबरा जा सकता .बेहतर होता कि प्र्धानमंत्री देव् दीपावली मानाने के लिए काशी जाने के बजाय किसानों के बीच पहुँचते .मुझे यकीन है कि यदि प्रधानमंत्री इस बातचीत में प्रत्यक्ष मौजूद हो जाएँ तो आंदोलन का समापन हो सकता है ,अन्यथा आंदोलन सरकार और देश के गले की हड्डी बन सकता है .किसानों का आंदोलन मजदूरों,छोटे कारोबारियों और बेरोजगारों को भी अपनी चपेट में ले सकता है ,क्योंकि ये सभी वर्ग असंतुष्ट हैं .
किसान आंदोलन के चलते पंजाब और दूसरी राज्य सरकारों के बीच आरोप-प्रत्यारोपों का दौर और अधिक शर्मनाक है .ये समय राजनीति करने का नहीं है,इस समय सभी को मिलकर देश की इस सबसे बड़ी समस्या का निराकरण खोजना चाहिए .कुल मिलाकर किसानों को नाउम्मीद नहीं लौटना चाहिए क्योंकि टूटा हुआ किसान देश की सेहत के लिए ठीक नहीं है .मुझे लगता है कि केंद्र सरकार नए कानूनों को लेकर अपने कदम वापस ले लेगी .ऐसा करना ही समझदारी है .सरकार को ये समझ लेना चाहिए कि अब किसान संगठनों को तोड़कर ये जंग नहीं जीती जा सकती क्योंकि इस समय सभी संगठन एकजुटता के साथ दिल्ली के बाहर डेरा डाले हुए हैं .हाल के वर्षों में सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस भी इतना जनसमुदाय दिल्ली लाने में नाकाम रही है .एकजुटता का ये एक नया अध्याय है .
@ राकेश अचल

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