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देव दीपावली के बहाने सियासत

ByMedia Session

Dec 1, 2020

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी कई मामलों में सबसे अलग हैं,नेहरू और इंदिरा गांधी से भी अलग .उनकी यही अलग पहचान उन्हें अवतार और उनके समर्थकों को भक्त बनाती है .प्रधानमंत्री जी ने अपने चुनाव क्षेत्र काशी में देव-दीपावली के बहाने देश में चल रहे किसान आंदोलन को तो ठेंगा दिखाया ही साथ ही एक बार फिर से मरी और मूर्छित कांग्रेस को भी गरिया लिया .यानि कांग्रेस का भूत अभी तक उन्हें चैन से सोने नहीं देता .
देश में पांच दिन से चल रहा किसान आंदोलन आज-कल में सिकुड़ जाएगा क्योंकि प्रधानमंत्री जी ने संकेत दे दिए हैं कि केंद्र सरकार किसानों से बात तो करेगी लेकिन हाल ही में बनाये गए कानूनों में कोई संशोधन नहीं करेगी .प्रधानमंत्री ने किसानों को ये संकेत दिल्ली में नहीं काशी में जाकर दिए .दिल्ली में उनकी बोलती बंद रहती है या वे दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के कारण बोलते नहीं हैं .
मुझे अच्छा लगा कि प्रधानमंत्री जी ने भाजपा की राजनीति को ‘गंगाजल’ की तरह पवित्र बताया .राजनीति को गंगाजल जैसा पवित्र बताना किसी दुस्साहस से कम नहीं है क्योंकि किसी भी दल की राजनीति आज ‘गंगाजल’ जैसा होने का दावा नहीं कर सकती खासतौर पर जबकि उसका मकसद येन -केन सत्ता हथियाना हो और इसके लिए कुछ भी करने का संकल्प हो. राजस्थान में परास्त होने के बावजूद मध्यप्रदेश में दलबदल के जरिये सत्ता हथियाने वाली भाजपा को ‘गंगाजल’ जैसा बताने के पीछे क्या आधार हो सकते हैं ये रामजी के अलावा केवल प्रधान जी जानते हैं .
‘गंगाजल’ जैसी पवित्र राजनीति करने वाली भाजपा ने बंगाल में सत्ता हासिल करने के लिए तृणमूल कांग्रेस के अपावन एक मंत्री को दो दिन पहले ही कमलांगन में गले लगाया है ,’गंगाजल’ जैसी पवित्र राजनीति करने वाली भाजपा हर जगह बिभीषणों के जरिये सत्ता परिवर्तन का काम करती है .मध्यप्रदेश के बाद अब बंगाल इस तरह के प्रयोग का साक्षी बन सकता है .किसानों की मांगों के प्रति भाजपा का व्यवहार ‘गंगाजल’ जैसा ही नजर आ रहा है. आंदोलनरत किसान सर्दी में बेमौत मरने लगे हैं.दो किसानों की मौत हो गयी है लेकिन उनके प्रति किसी के मुंह से एक शब्द अभी तक नहीं फूटा है .
गंगातट से मूर्छित कांग्रेस को गरियाना सुचिता की राजनीति का सबसे बेहतर उदाहरण है .दूसरे दलों को भी अब इसका अनुशरण करना चाहिए .आप साल भर [सियासी पाप कीजिये और फिर एक बार जाकर गंगा को साक्षी मानकर उन सब पापों को धो डालिये .ऐसी सुविधा दुनिया में किसी और देश के पास नहीं है .काशी को ‘क्वेटो’ बनते देखा आप गंगा की पवित्रता पर भरोसा कर सकते हैं .गंगा वैसे भी पतिति पावनी है .पतित राजनीति करने वालों के लिए गंगा जैसा उद्धारक कोई दूसरा हो नहीं सकता .गंगा गरियाने के लिए भी सर्वोत्तम मंच है .’
मुझे गंगा वाली काशी इसीलिए हमेशा से पसंद रही है .यहां आप जैसी चाहें,वैसी ‘गागरोनी’ गा सकते हैं .गंगा का गागरोनी से बड़ा पुराना रिश्ता है .इतिहास में झांकिए तो आपको सब कुछ पता चल जाएगा .यहां बड़े-बड़े गवैये हुए हैं .मदनमोहन मालवीय की काशी नए गंगापुत्र को पाकर गर्वित तो हो ही चुकी है .गंगा ने कभी सोचा भी न होगा की उसमें मुर्दे बहाने के अलावा कभी कोई ‘क्रूज’ भी चलेगा .लेकिन अब चल रहा है .ये विकास का जीवंत प्रमाण है .अब आप ‘क्रूज’ पर रहकर स्वर्ग के सभी सुख हासिल कर सकते हैं .गंगाजल मिश्रित सोमरस भी यहां हासिल होगा ही इसमने किसी को कोई संदेह नहीं .पर्यटकों की पहली पसंद तो सोमरस ही होता है .
बात किसान आंदोलन और विरासतप्रिय कांग्रेस की हो रही थी .अब ये कांग्रेस का दुर्भाग्य है या सौभाग्य की उसके पास एक विरासत है और भाजपा के पास नहीं है .भाजपा में विरासत के लिए कोई स्थान न पहले कभी था और न आगे कभी होगा ,लेकिन कांग्रेस तो बिना विरासत के ज़िंदा रह ही नहीं सकती .आजकल कांग्रेस में एक परिवार की विरासत चल रही है .दुर्भाग्य ये है कि इस पारिवारिक विरासत को कांग्रेस के भीतर से कोई चुनाती नहीं दे रहा,मजबूरन ये काम भाजपा को करना पड़ रहा है .
हम जानते हैं कि विरासत के बिना किसी का काम नहीं चलता लेकिन भाजपा का विरासत से कोई लेना-देना नहीं है .कम से कम खानदानी विरासत से तो बिलकुल नहीं है .भाजपा ने देश को दो प्रधानमंत्री दिए और दोनों के आगे न कोई ‘नाथ’ थी और न आगे कोई ‘पाग’ ..सियासत में ऐसे लोग जिनके ‘आगे नाथ न पीछे पगही ‘होती है वे ही सन्यासी कहे जाते हैं .कहे ही नहीं जाते बल्कि दिखाई भी देते हैं .कांग्रेस के पास विरासत है लेकिन कोई सन्यासी नहीं है इसीलिए उसकी दुर्गति हो रही है ,कांग्रेस यदि अपना कल्याण चाहती है तो उसे भी अपना नेतृत्व किसी सन्यासी के हाथ सौंप देना चाहिए .कांग्रेस के राहुल गांधी ‘अर्ध सन्यासी’ हैं .उनके पीछे ‘पगही’ भले न हो लेकिन ‘नाथ’ तो है .
मुमकिन है कि आज का ये विषय आपको रोज की तरह रुचिकर न लगे किन्तु मेरे ख्याल से ये एक महत्वपूर्ण विषय है .राजनीति को ‘गंगाजल’ की तरह पावन और पापनाशनी बनाने के लिए जो प्रयास माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा किये जा रहे हैं ,उनका समर्थन किया जाना चाहिए,ये बात और है कि ऐसी पतित -पावन राजनीति में बिभीषणों के लिए भीषण अवसर विद्यमान हैं .भविष्य की पतित-पवन राजनीति इन्हीं बिभीषणों के सहारे चलने वाली है .जो दल जितने ज्यादा बिभीषण खोज सकेगी उसे उतनी अधिक कामयाबी हासिल होगी .दरअसल बिभीषण को अपावन मानने वाले लोग ही अपावन हैं. बिभीषण तो रामभक्त था ,उसने तो राजनीति को राक्षी प्रवृत्ति से मुक्ति दिलाने के लिए काम किया था .हमें भी आज के बिभीषणों का इसीलिए सम्मान करना चाहिए .ये न होते तो राजनीति के पापमुक्त होने का मार्ग खुलता ही नहीं .
मेरा तो सुझाव है कि हमें हंगामा मचने वाली संसद के बजाय देश को गंगातट पर जाकर ही सम्बोधित करना चाहिए .विपक्षी भी इस काम के लिए गंगातट का इस्तेमाल कर सकते हैं ,आखिर किसी ने इस पर रोक थोड़े ही लगाईं है .पवित्र राजनीति के लिए संसद से बेहतर गंगातट ही हो सकता है .वहां आप बिना झोल के ,दिल खोल के बोल सकते हैं, ठीक अपने पंत प्रधान की तरह .ऐसा करने से आपको कोई रोके तो कहियेगा ! आप इस आलेख पर प्रतिक्रिया देते समय भी गंगातट पर बोलने की सुखानुभूति कर सकते हैं.आप सभी का स्वागत है .
@ राकेश अचल

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