
छत्तीसगढी भाखा म” बेर,, शब्द के माने होथे “सूरज,, अऊ “बेरा,, के माने होथे “समय ,,इही समय अऊ बेरा के ज्ञान ले जऊन यंत्र बनिस ऊही ल प्राकृतिक घडी, आदिवासी घड़ी ,गोडवाना बेरोमान ,कहे जाथे । दुनिया भर म जतेक घड़ी बने हे ओकर घुमे के दिशा डेरी ले जऊनी बांये ले दांये (लेफ्ट टू राइट) हवय । लेकिन जऊन प्राकृतिक घडी बेरोमान के चले के दिशा हे वोहर जऊनी ले डेरी दांये ले बांये हावय। अब सवाल ये पैदा होगे हावय की कोन घड़ी सही हे अऊ कोन गलत। येकर पाछू जऊन तर्क हे ऐला जाने माने अऊ समझे के जरूरत हे।जइसे हमर धरती के घुमे के दिशा जऊनी ले डेरी हे, वइसन नदिया समुंदर म पानी के भंवर (भौना)जऊनी ले डेरी रूख म चढने वाला नार (बेल) जऊनी ले डेरी चढथे किसान के नांगर ,दंऊरी ,बेलन, जांता ,जऊनी ले डेरी मैदान म दउंडने वाला खिलाड़ी ,सांप के कुडली ,जम्मो ग्रह के चले के दिशा बिहाव के भांवर (सातफेरा) अब सवाल ये हवय की प्रकृति चक्र ल या प्रकृति के नियम म कोई बदलाव करे जा सकत हे का ? प्रकृति के नियम अटल सत हे ।ऐला बदल पाना असंभव हे।ऐकर ले प्राकृतिक नियम के उलट घड़ी चलाना भी प्रकृति विरुद्ध हावय।इही संदेश आदिवासी बेरोमान के माध्यम ले पूरी दुनिया ल बताए जाथे की दुनिया के मानव समाज के भलाई तभे होही जब आप प्रकृति के साथ चलिहव प्रकृति के ऊल्टा चले म सर्वनाश होही काबर की प्रकृति के पांचो तत्व के शक्ति के आघु कोनो नइ टिक सकय।अभी कोरोना महामारी के सुरता राखव जम्मो दुनिया के मनखे कइसे लाचार बेबस होगिस।वनस्पति अऊ जरी बूटी ले जीवन रक्षा के उदिम करे लागिस हे। बेरोमान के सिद्धांत ल हमर पूर्वजमन मोहनजोदडो हड़प्पा सिंधु घाटी सभ्यता के बेरा ले समझे रहिन सबले पहिली खुदाई म जऊन समयचक्र मिलिस जेनला स्वास्तिक कहे जाथे।बाद म ये समयचक्र ल ऊल्टा करके हिटलर अपन झंडा म प्रयोग करिस वइसने ऊल्टा स्वस्तिक के प्रयोग आज भी करे जावत हे। जो की प्राकृतिक समयचक्र के ऊल्टा हावय।

निर्मल राज
कोरबा







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