संविधान बनाने वालों ने सपना क्या देखा था ?

वर्ष 1949 में आज ही के दिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के संविधान पर मोहर लगी थी, साथियों संविधान सभा की 2 साल 11 महीने और 17 दिनों की कड़ी मेहनत से बनकर तैयार हुए भारतीय संविधान पर सहमति बनी थी, जिसके बाद 26 जनवरी 1950 से हमारा यह संविधान लागू हुआ। साथियों आजादी मिलने से अब तक हमारे यहां लोकतंत्र दिन प्रतिदिन परिपक्व हुआ है, विकास के नए कीर्तिमान स्थापित हुए हैं, लेकिन संविधान के साक्षरता और जवाबदेही अभी भी बड़ी चुनौती है, जाहिर है कि संविधान पर मुहर लगने के 71 साल बाद आज इस पड़ाव पर 135 करोड़ से अधिक आबादी वाले हमारे मुल्क और इसके नीति निर्माताओं को अभी भी समझना जरूरी है कि संविधान बनाने वालों ने हमारे लिए आखिर सपना क्या देखा था ?आपको याद होगा कि 2015 की बात है, जब हमारे संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 125 वीं जयंती के मौके पर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद भवन परिसर में मेकिंग ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन बाय द असेंबली नाम की प्रदर्शनी का उद्घाटन किए थे। जिसका मकसद था, सांसदों को संविधान बनने के सफ़र से रूबरू करवाना। फिर इसके अगले वर्ष में ही हम सभी ने देखा कि संविधान दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने संविधान साक्षरता पर भी जोर दिए, इसका मकसद था हम युवाओं को संविधान की जानकारी देना। साथियों हमारे भारत की पहचान रही है लोकतंत्र, वैसे किसी भी मुल्क के संविधान का निर्माण उस मुल्क के अतीत के आधार पर ही होता है, हमारे प्राचीन भारत में वैदिक काल से ही लोकतांत्रिक शासन प्रणाली मौजूद थी। देखें तो ऋग्वेद और अथर्ववेद तक में सभा और समिति का जिक्र मिलता ही है, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और शुक्राचार्य की नितिसार में संविधान की ही झलक मिलती ही है ।
अंग्रेजी शासन में देखें तो अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के दौरान ही हमारे यहां संविधान की मांग उठ चुकी थी, इसी दौरान हरीश चंद्र मुखर्जी ने भारतीय संसद की मांग की थी। इसके बाद 1914 में गोपाल कृष्ण गोखले ने भी संविधान को लेकर अपनी बात रखी, अंग्रेजों ने इसे लेकर अपनी सहमति भी दी, लेकिन बाद में बात न बढ़ सकी , फिर 1922 में महात्मा गांधी ने भारत का संविधान भारतीयों द्वारा बनाने पर जोर दिया। इसके बाद 1928 में मोतीलाल नेहरू इसे लेकर स्वराज रिपोर्ट पेश की, इसी बीच 1935 में अंग्रेजों ने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट बनाया जिसे कमजोर करार दिया गया।इसके चलते कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच दूरियां भी बढ़ी , इसके बाद करीब साथियों 10 वर्षों के बाद डॉक्टर तेज बहादुर सप्रू ने सभी दलों से मिलकर एक संविधान का खाका बनाने की पहल किए। आज संविधान को अंगीकृत किए हुए दोस्त 70 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन इस वक्त सबसे बड़ा सवाल है कि क्या आज भी हमारा संविधान उतना ही प्रासंगिक है या फिर राजनीतिक बेड़ियों में जकड़ कर नेताओं द्वारा अपने हिसाब से प्रयोग किया जा रहा है?
अगर हम लोकतंत्र को बनाए रखना चाहते हैं न सिर्फ स्वरूप में बल्कि यथार्थ में भी तो हमें क्या करना चाहिए? मुझे लगता है पहली जरूरी चीज है कि हम अपने सामाजिक आर्थिक उद्देश्यों को पानी के लिए संविधान के सुझाव रास्ते पर चलें। इसका मतलब है कि हम क्रांति के खूनी रास्ते को छोड़ दें, इसके मायने यह भी है कि हम सत्याग्रह असहयोग और सिविल नाफरमानी के रास्ते को भी छोड़ दें । साथियों जब सामाजिक आर्थिक उद्देश्यों को पाने के लिए संविधान सम्मत कोई रास्ता ही ना बचा हो तो गैर संवैधानिक तरीकों के इस्तेमाल को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है, लेकिन जब संविधान सम्मत रास्ते खुले हो ,तो गैर संवैधानिक तरीकों के लिए कोई कारण ही नहीं दिया जा सकता है, ऐसे तरीकों से अराजकता के व्याकरण के अलावा और कुछ नहीं है, और जितना जल्दी हमें ऐसी अराजकता को छोड़ देनी चाहिए यह हम सभी के लिए बेहतर ही होगा। लेकिन दोस्त अगर हम मौजूदा समय की स्थितियों पर ध्यान से गौर करें तो आज भी चुनौतियां जस की तस बनी हुई है , यह कड़वी सच्चाई है कि आजादी के बाद से आज तक जिस आम आदमी के विकास अथवा सुशासन का ढिंढोरा हर आम चुनाव में पीटा जाता है,उसकी माली हालत दिन प्रतिदिन खराब होती जा रही है। देश के राजनैतिक डायन की काली करतूतों का दुष्प्रभाव हमें दिखाई दे रहा है कि अब सारा समाज स्वर्ण पसमांदा, पिछड़ा अति पिछड़ा, दलित महादलित, अल्पसंख्यक बहुसंख्यक आदि खेमे में विभक्त किया जा चुका है। समस्या यहां यह है कि इनमें परस्पर आपसी सद्भाव पैदा करने के बजाए नेताओं द्वारा अपने अपने वोट बैंक के लिए परस्पर अंतर संघर्ष की बीज बोए जा रहे हैं, जिससे तैयार विष बीज डाले जा रहे हैं, इस विष फल को खाना कोई पसंद नहीं करने वाला है।
इन सभी बातों के अलावा अगर देखें तो पिछले कुछ समय से अति बौद्धिक लोगों द्वारा संविधान की अखंडता और संप्रभुता को भी चोट पहुंचाई जा रही है और इसके लिए वे लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपना हथियार बना रहे हैं। लेकिन यहां मेरा सबसे बड़ी बात तो यह है कि देश की अखंडता और संप्रभुता से बड़ी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी नहीं हो सकती हैं। क्योंकि साथियों जब देश की अखंडता ही अक्षुण नहीं रहेगी तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के क्या मायने ! आज से चार दशक पहले इस देश में गरीबी हटाओ का ऐलान किया गया, टूटती उम्मीद फिर से स्फूर्त हो गई थी । गरीबी तो नहीं हटी लेकिन इस दौरान गरीबी महज अब मानसिक स्थिति बनकर जरूर रह गई है। साथियों ऐसा मजाक शासक वर्ग ही कर सकते हैं, गरीबी को कम दिखाने के लिए आंकड़े बदल दिए जाते हैं, मानक परिवर्तित हो जाते हैं और हमारा देश आगे बढ़ रहा है के नारे बुलंद कर दिए जाते हैं।एक बात और साथियों हमारे संविधान की विशेषता यह है कि यह संघात्मक भी है और एकात्मक भी। भारत के संविधान में संघात्मक संविधान की सभी उपर्युक्त विशेषताएं विद्यमान हैं। दूसरी विशेषता यह है कि आपातकाल में भारतीय संविधान में एकात्मक संविधानों के अनुरूप केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए प्रावधान निहित हैं। तीसरी विशेषता यह है कि केवल एक नागरिकता का ही समावेश किया गया है तथा एक ही संविधान केंद्र तथा राज्य दोनों ही सरकारों के कार्य संचालन के लिए व्यवस्थाएं प्रदान करता है। इसके अलावा संविधान में कुछ अच्छी चीजें विश्व के दूसरे संविधानों से भी संकलित की गई हैं।

विक्रम चौरसिया

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