न्याय की नगरी में उठे सवाल,अधीक्षक बोले-खबरें पूरी तरह भ्रामक,निलंबन की पुरानी फाइल खोल छवि खराब करने की जा रही कोशिश

बिलासपुर – न्यायधानी बिलासपुर, जिसे न्याय की नगरी कहा जाता है, इन दिनों एक प्रशासनिक अधिकारी को लेकर चर्चाओं में है। मामला भू अभिलेख शाखा में पदस्थ अधीक्षक खिलेन्द्र यादव से जुड़ा है। कुछ वेब पोर्टलों पर उनके खिलाफ लगातार खबरें प्रकाशित की जा रही हैं। खबरों में उन पर वर्षों से एक ही कुर्सी पर जमे रहने, राजनीतिक पकड़ बनाए रखने, सरकार को गलत जानकारी देने और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।इन आरोपों की सच्चाई जानने के लिए हमारी टीम ने सीधे अधीक्षक खिलेन्द्र यादव से बातचीत की और उनका पक्ष विस्तार से जाना।

“खबरें पूरी तरह भ्रामक और तथ्यहीन”

अधीक्षक खिलेन्द्र यादव ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि प्रकाशित की जा रही खबरें पूरी तरह भ्रामक, आधारहीन और तथ्यों से परे हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी भी वेब पोर्टल ने खबर चलाने से पहले उनका पक्ष जानने की कोशिश नहीं की। न उनसे संपर्क किया गया और न ही किसी आधिकारिक दस्तावेज की पुष्टि की गई।उनका कहना है कि बिना संबंधित व्यक्ति का वर्शन लिए खबर प्रकाशित करना पत्रकारिता की मूल भावना के खिलाफ है और इससे एकतरफा छवि बनाई जाती है।

शिकायत पर उठाए सवाल….

शिकायत के मुद्दे पर अधीक्षक यादव ने कहा कि जिस व्यक्ति के नाम से शिकायत का जिक्र किया जा रहा है, वह कथित रूप से छद्म नाम है। विभाग को आज तक ऐसी कोई लिखित या भौतिक शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। सामान्य प्रशासन विभाग के नियमों के अनुसार बिना स्पष्ट नाम, पता और पहचान के शिकायत स्वीकार नहीं की जाती। ऐसे में अज्ञात शिकायत के आधार पर गंभीर आरोप लगाना उचित नहीं है।

पदस्थापना और प्रशासनिक प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण….

पदस्थापना के मुद्दे पर उन्होंने बताया कि यह विषय पूरी तरह शासन और प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है। जिले में कई अधिकारी और कर्मचारी वर्षों से एक ही जिले में पदस्थ हैं। यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है।उन्होंने कहा कि हर माह नियमित रूप से पदस्थापना संबंधी जानकारी शासन को भेजी जाती है। यदि किसी पत्र के माध्यम से गलत जानकारी भेजे जाने का आरोप है तो उसका स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। खबरों में ऐसा कोई दस्तावेज या प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है।

निलंबन प्रकरण पर दी सफाई…..

भर्ती प्रक्रिया में निलंबन को लेकर भी उन्होंने स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि लगभग तीन वर्ष पूर्व इस मामले में कलेक्टर द्वारा विस्तृत जांच कराई गई थी। जांच में डेटा लीक या किसी प्रकार की अनियमितता की पुष्टि नहीं हुई।
शासन ने कलेक्टर की जांच रिपोर्ट से सहमति जताते हुए उनका निलंबन निरस्त कर उन्हें बहाल कर दिया था। उनका कहना है कि पुराने और समाप्त हो चुके मामले को दोबारा उठाना केवल छवि धूमिल करने की कोशिश है।

भूमि सीमांकन और डायवर्सन पर स्थिति स्पष्ट….

भूमि सीमांकन को लेकर उन्होंने कहा कि भू राजस्व संहिता की धारा 128-129 के तहत सीमांकन का अधिकार तहसीलदार को प्राप्त है, अधीक्षक भू अभिलेख को नहीं। विवादित भूमि का सीमांकन तहसीलदार द्वारा किया जाता है।
इसी तरह डायवर्सन का कार्य वर्ष 2018-19 से अनुविभागीय अधिकारी राजस्व के माध्यम से किया जा रहा है। ऐसे में इन कार्यों को लेकर लगाए गए आरोप वास्तविकता से मेल नहीं खाते।

जांच रिपोर्ट में शिकायत निराधार….

उन्होंने यह भी बताया कि 28 मई 2025 की शिकायत पर कलेक्टर द्वारा जांच कर प्रतिवेदन सचिव, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग को भेजा जा चुका है। प्रतिवेदन में शिकायत को व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित और निराधार बताया गया है।

निजता और अधिकारों का सवाल….

अधीक्षक खिलेन्द्र यादव ने कहा कि उनकी निजी और गोपनीय जानकारी को सार्वजनिक कर उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। बिना ठोस प्रमाण के किसी अधिकारी की छवि खराब करना न केवल अन्याय है, बल्कि उसकी निजता और स्वतंत्रता के अधिकार का भी हनन है।अब बड़ा सवाल यह है कि सच क्या है? क्या आरोपों में दम है या यह व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम? फिलहाल मामला दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर ही स्पष्ट होगा। न्यायधानी बिलासपुर में उठे इस मुद्दे पर लोगों की नजरें टिकी हुई हैं।

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