

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिला परिषद कोरबा छत्तीसगढ़
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिला कोरबा के जिला सचिव पवन कुमार वर्मा ने बयान जारी करते हुए कहा कि केंद्र सरकार 44 श्रम कानून को चार श्रम संहिता में बदल दी है। वह कागज पर कानून है जमीन पर, ठेका, डर, छंटनी और चुप्पी का जाल है। वर्मा ने
देशभर की किसानों, खेत मज़दूरों, महिलाओं और मेहनतकश जनता से आह्वान किया है कि
12 फ़रवरी 2026 को प्रस्तावित आम हड़ताल को सफल बनाने के लिए सीपीआई मजदूरों, किसानों और ग्रामीण महिलाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस जनविरोधी फैसलों के ख़िलाफ़ संघर्ष में शामिल रहेगी। श्री वर्मा ने कहा कि केंद्र सरकार ने एकतरफा रूप से 21 जनवरी 2025 से चार श्रम संहिताओं को लागू करने का फैसला लिया है। यह करोड़ों संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक बड़ा झटका है। व्यवहार में ये चार श्रम संहिताएं भारत की मजदूर वर्ग के हाथों में बेड़ियां बनकर काम करेंगी।
भारत के मजदूर वर्ग ने एक सदी से अधिक समय तक ब्रिटिश साम्राज्यवादियों, विदेशी और देशी पूंजीपतियों के खिलाफ संघर्ष किया और अपनी कुर्बानियों से श्रम कानून हासिल किए।
मजदूरों ने गिरफ्तारियां, पुलिस फायरिंग, जेल और अंडमान की काला पानी की सजा सहन की। मेरठ षड्यंत्र जैसे झूठे मुकदमे झेले। कई मजदूर नेता और कार्यकर्ता गोलियां खाकर शहीद हुए। इन वीरतापूर्ण संघर्षों के फलस्वरूप लगभग 100 श्रम कानून बने। इनमें से हाल तक 44 कानून लागू थे, लेकिन अब चार श्रम संहिताओं के कारण 29 मूल्यवान श्रम कानून निरस्त हो जाएंगे। अब ट्रेड यूनियन रजिस्टर करने के लिए 10 प्रतिशत कर्मचारियों या न्यूनतम 100 कर्मचारियों का समर्थन जरूरी होगा, जबकि पहले सिर्फ सात हस्ताक्षर काफी थे।पहले औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत मजदूर-मालिक के बीच विवाद सुलझते थे, अब औद्योगिक संबंध संहिता लाई जा रही है। इसमें हड़ताल का अधिकार और सामूहिक सौदेबाजी हड़ताल का अधिकार सीमित कर दिया गया है। एक दिन की हड़ताल पर 8 दिन की मजदूरी कटेगी। यूनियन का रजिस्ट्रेशन “उकसावे” के आरोप में रद्द किया जा सकता है, कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा सकता है। मालिक हड़ताल से हुए नुकसान के लिए सिविल मुकदमा कर सकते हैं, पहले ऐसा नहीं था। हड़ताल के लिए पहले 14 दिन का नोटिस काफी था, अब 60 दिन का नोटिस जरूरी है। अगर 50वें दिन मालिक बातचीत शुरू कर दे तो हड़ताल नहीं हो सकती। बातचीत फेल होने पर फिर 60 दिन का नोटिस देना पड़ेगा। इससे मजदूरों में बेचैनी बढ़ेगी और उत्पादकता व विकास पर असर पड़ेगा।
पहले 10 तारीख तक वेतन न देने पर जेल हो सकती थी, अब सिर्फ जुर्माना होगा। कर्मचारी मुआवजा अधिनियम खत्म हो जाएगा। सुरक्षा मानक की कोई गारंटी नहीं। मालिक की गलती पर भी मामूली जुर्माना। श्रम कल्याण बोर्ड खत्म हो जाएंगे। “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” के नाम पर कॉरपोरेट हित और मजबूत होंगे। खासकर प्रवासी मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे क्योंकि मौजूदा अधिकार और कल्याण कानून लागू ही नहीं हो रहे, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना हो रही है।
न्यूनतम वेतन केंद्र तय करेगा, राज्य उसका पालन करेंगे। भारतीय श्रम सम्मेलन की सिफारिशें, विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देश, सुप्रीम कोर्ट के फैसले, विशेषज्ञ वेतन समितियों के निर्णय—सभी को नजरअंदाज किया जा रहा है। न्यूनतम वेतन गणना का आधार ही परिभाषित नहीं है, पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल है। ठेका और आउटसोर्सिंग क्षेत्र के मालिकों की भविष्य में जवाबदेही संदिग्ध है। अप्रेंटिस रखकर स्टाइपेंड देकर सस्ते में काम लिया जाएगा। जल्द ही 60 या 62 साल की सेवानिवृत्ति आयु भी जरूरी नहीं रहेगी। फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट होगा, नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं। नौकरी की सुरक्षा नहीं तो एक साल की नौकरी पर ग्रेच्युटी, ईपीएफ, ईएसआई का वादा खोखला है।
छोटे–मध्यम उद्योग भारत के औद्योगिक आधार का 70 प्रतिशत हैं। पहले 100 मजदूरों वाली इकाई बंद करने या छंटनी के लिए सरकारी अनुमति जरूरी थी। अब यह सीमा 300 कर दी गई है। 300 से कम मजदूरों वाली फैक्ट्रियों को अब छंटनी या बंद करने के लिए सरकारी अनुमति नहीं चाहिए। पहले बहुमत यूनियन को मान्यता मिलती थी, अब 51 प्रतिशत कर्मचारियों वाली यूनियन को ही मान्यता मिलेगी। मजदूरों की सौदेबाजी की ताकत खत्म हो जाएगी। 18,000 रुपये से अधिक मासिक कमाने वाले को “मजदूर” नहीं, सुपरवाइजर माना जाएगा। पहले 20 (बिजली के साथ) या 40 (बिना बिजली) मजदूरी पर फैक्ट्री की परिभाषा लागू होती थी, अब 50 कर दी गई है। खदान, बीड़ी, निर्माण मजदूरी के कल्याण बोर्ड और कानून खत्म हो जाएंगे। सामाजिक सुरक्षा खोखली हो जाएगी। गिग और प्लेटफॉर्म मजदूरों की संख्या करोड़ों में है, उनके लिए अलग कल्याण कोष बनाया जा रहा है लेकिन पर्याप्त आय, लाभ, नौकरी की स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।देशभर की ट्रेड यूनियनें चारों श्रम संहिताओं का कड़ा विरोध कर रही हैं। उनका कहना है कि ये संहिताएं मजदूर नेतृत्व की भूमिका खत्म कर देंगी, शोषण बढ़ेगा, नौकरी की सुरक्षा समाप्त हो जाएगी। कामकाजी संस्कृति बदल जाएगी, स्थायी नौकरियां खत्म हो जाएंगी, सिर्फ अल्पकालिक नौकरियां रहेंगी, मजदूर अपने अधिकारों और लाभों के लिए सौदेबाजी भी नहीं कर पाएंगे। ट्रेड यूनियनों को डर है कि इससे आधुनिक गुलामी की स्थिति बन जाएगी। राज्यों की अधिकारिता खत्म होगी, केंद्र का हस्तक्षेप बढ़ेगा और शोषण और गहरा होगा।
इस संदर्भ में सीपीआई मांग करती हैं कि केंद्र सरकार इन मजदूर-विरोधी श्रम संहिताओं को तुरंत निरस्त करे।
पवन कुमार वर्मा
जिला सचिव
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिला कोरबा छत्तीसगढ़







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