विक्रम चौरसिया की कलम से- क्या फ्रांस को धर्मनिरपेक्ष होने की सजा मिल रही है ?

धर्मनिरपेक्षता फ्रांस और भारत समेत दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों की पहचान है, लेकिन आज हम देख रहे हैं कि फ्रांस में इस पहचान की गला काटकर हत्या की जा रही है। आखिर क्यों साथियों किसी देश को सेक्युलर होने की सजा वहां रहने वाले लोगों का खून बहा कर दी जा रही है ?
जैसा कि हम सभी ने देखा कि 16 अक्टूबर को फ्रांस की राजधानी पेरिस में इतिहास बढ़ाने वाले एक स्कूल टीचर की गला काट कर हत्या कर दी गई थी ,सैमुएल पैटी नाम के इस स्कूल टीचर की गलती दोस्तों केवल इतना था कि उन्होंने अपने क्लास में बच्चों को अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में समझाते हुए पैगंबर मोहब्बत साहब के कार्टून का इस्तेमाल किए थे। यह कार्टून साथियों कुछ वर्ष पहले ही शार्ली हैब्दो नाम की एक मैगजीन में छपा था और इसके बाद से फ्रांस में खून खराबे का जो सिलसिला शुरू हुआ वो आज तक जारी है।
फ्रांस के नागरिकों पर हो रहे आतंकवादी हमले अब पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र बन गए हैं और इस मुद्दे पर पूरी दुनिया दो हिस्सों में बंट गई है, आज लोगों का यह भी सवाल है कि दुनिया भर के जो मुस्लिम देश कुछ दिनों पहले तक बायकॉट फ्रांस की मुहिम चला रहे थे वह लोग आज इन हमलों का विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं? हां दोस्तों मेरा भी सवाल है कि पाकिस्तान बांग्लादेश तुर्की ईरान और सऊदी अरब जैसे देशों में जो मुसलमान सड़कों पर उतर कर फ्रांस के खिलाफ नारे लगा रहे थे और यह कह रहे थे कि इस्लाम के अपमान को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे वे लोग सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहे हैं? कट्टरपंथी इस्लाम के नाम पर देखा जाए तो फ्रांस के लोगों का खून सिर्फ इसलिए बहाया जा रहा है, क्योंकि सैमुएल पैटी की हत्या के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने साफ कह दिया कि हम अपने देश में किसी भी प्रकार की धार्मिक कट्टरता को बर्दाश्त नहीं करेंगे और जो लोग धर्म के नाम पर दूसरों को डरा रहे हैं जल्दी ही उन्हें भी डर का सामना करना पड़ेगा । देखा जाए तो आज फ्रांस के राष्ट्रपति इस समय पूरी दुनिया में कट्टरपंथी इस्लाम के विरोध का सबसे बड़ा चेहरा बन चुके हैं और यह बात दुनिया के उन देशों को नहीं पच रहा है जो खुद को इस्लामिक देशों का नेता साबित करना चाहते हैं।
दोस्त जिस देश में भी अल्पसंख्यक आबादी होती हैं वहां तुष्टिकरण की राजनीति जरूर होती है और अधिकतर नेता निजी फायदे के लिए इसका शिकार हो जाते हैं और जो नेता इसका विरोध भी करते हैं उन्हें इमरान खान जैसे इस्लामिक कट्टरपंथी इस्लामोफोबिया का शिकार यानी मुसलमानों से नफरत करने वाला बता देते हैं । लेकिन आज हम देख रहे हैं कि फ्रांस ने पूरी दुनिया को इस्लामोफोबिया का विपरीत शब्द बताएं हैं जो कि इस्लामिक फासीवाद फ्रांस के तमाम नेता आज एक सुर में यह कह रहे हैं कि फ्रांस को इस्लामिक फासीवाद से मुक्त कराना होगा।
यह शब्द आज देकर साथियों फ्रांस ने पूरी दुनिया को बता दिया है कि तुष्टीकरण से आजाद होने का समय आ गया है और इस मामले में दुनिया का नेतृत्व करने के लिए भी तैयार है।
ऐसी घटनाओं से साथियों हमारे भारत की नीति में भी बहुत बड़ा बदलाव है क्योंकि अक्सर भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर तटस्थ रूख अपनाता है फिर वह चाहे हांगकांग में चीन के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का मामला हो या ताइवान को चीन द्वारा धमकी दिए जाने का मामला हो या इजरायल और फिलिस्तीन का विवाद हो या देखो आप ही अमेरनिया और अजरबैजान के बीच चल रहे युद्ध इनमें से ज्यादातर मुद्दों पर भारत बहुत सोच समझकर और संतुलित बयान ही देता आया है , लेकिन हमने देखा साथियों की फ्रांस में इस्लामिक कट्टरपंथ का उदय एक ऐसा मसला है जिससे भारत की अंदरूनी राजनीति भी प्रभावित होती है क्योंकि पिछले कई दशकों से भारत भी फ्रांस की तरह कट्टर इस्लामिक आतंकवाद का शिकार रहा है और फ्रांस की तरह भारत के कुछ मुसलमानों के मन में बढ़ती कट्टर सोच भारत को भी फ्रांस की तरह प्रभावित करती है और चिंता में डालती है। हम सभी देख रहे हैं कि फ्रांस में बढ़ती कट्टरता की खबर को भारत के लोग भी बहुत ध्यान से देख रहे हैं, फ्रांस से आ रही ऐसी खबरें भारत में ट्रेड हो रही है। भारत के लोग फ्रांस की तरफ इस उम्मीद से देख रहे हैं कि शायद फ्रांस अपने मजबूत इरादों से कट्टरपंथी इस्लाम का इलाज ढूंढ लेगा और इससे भारत को भी मदद मिलेगी।
ऐसा इसलिए भी है दोस्तों क्योंकि फ्रांस जल्दी ही एक नया कानून लाने वाला है, इस कानून के लागू होने के बाद फ्रांस में सविधान धर्म से ऊपर आ जाएगा और फिर फ्रांस में धर्म के नाम पर किसी भी तरह की कट्टरता के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। अगर साथियों फ्रांस इस कानून को लागू करने में सफल हो जाता है तो यह कानून पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन सकता है। हमारे भारत में भी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की मांग हो रही है और अगर ऐसा हो गया तो भारत में एक तरह से संविधान सभी धर्मों से ऊपर हो जाएगा और कोई भी ऐसा लोकतांत्रिक देश जो खुद को विकसित और आधुनिक होते हुए देखना चाहते हैं उसके लिए जरूरी है कि वहां के नागरिक हर विचारधारा से ऊपर संविधान को स्थान दें। नफरत और कट्टरपंथ से हमारा देश भी अछूता नहीं है साथियों ऐसे ही घटना पिछले दिनों हमारे कश्मीर के कुलगाम में हुई है, जहां आतंकवादियों ने पिछले दिन स्थानीय नेताओं की गोली मारकर हत्या कर दी अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भारत को क्यों फ्रांस के मॉडल पर चलने की जरूरत है?

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