केरल के पलक्कड़ जिले में वलयार नामक जगह पर छत्तीसगढ़ के प्रवासी मज़दूर राम नारायण बघेल की हत्या की देशव्यापी गूंज

प्रकाशनार्थ

छत्तीसगढ़ के प्रवासी मजदूर की केरल में संघी गिरोह द्वारा भीड़-हत्या
(आलेख : संजय पराते)

हुई है। केरल में माकपा के नेतृत्व में वामपंथी सरकार है, जबकि छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है। चूंकि यह भीड़-हत्या केरल में हुई है, इसलिए गोदी मीडिया और भाजपा शुरू में केरल सरकार पर हमलावर थी। लेकिन जैसे ही मामले की जांच आगे बढ़ी, इस भीड़-हत्या में आरएसएस-भाजपा के लोगों का हाथ सामने आया, जिन्होंने रामनारायण पर अवैध ‘बांग्लादेशी’ होने का आरोप लगाकर हमला किया था। इस तथ्य का खुलासा होते ही गोदी मीडिया किसी बिल में दुबक गया है और संघी गिरोह चुप्पी साधे हुए हैं।

रामनारायण बघेल छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले का रहने वाला था। खेत मजदूर था और उसके पास जमीन का जो टुकड़ा है, उसके सहारे अपने परिवार का पेट पालने में असमर्थ था। सो, खेती के मौसम के बाद पलायन करना उसकी मजबूरी थी। केरल जैसे सबसे दूर के राज्य को उसने इसलिए चुना कि वहां शेष भारत की तुलना में मजदूरी बहुत ज्यादा है और प्रवासी मजदूरों का सम्मान भी।

दूसरे गांव वालों की तरह ही उसने साल 2018 में कांग्रेस को वोट दिया था। भूपेश बघेल उसके लिए हीरो थे, तो इस बार उसने बघेल और कांग्रेस से असंतुष्ट होकर भाजपा को वोट दिया था। शायद गोदी मीडिया के इस प्रचार से वह प्रभावित था कि छत्तीसगढ़ की सरकार “डबल इंजन सरकार” होगी, तो उसकी जिंदगी में कुछ सुधार आएगा। अन्य ग्रामीणों की तरह उसे भी यह ज्ञान नहीं था कि मजदूरों और किसानों की जिंदगी में बदलाव तवे में रोटी की तरह पार्टी-पलट से नहीं आता, जन विरोधी नीतियों को बदलने से आता है। सो, कांग्रेस की जगह भाजपा के आने से रामनारायण की जिंदगी न बदलनी थी, न बदली। अच्छे रोजगार की खोज में उसने फिर पलायन किया और अपने सम्मान के लिए केरल को चुना।

लेकिन एक प्रवासी कृषि मजदूर के लिए सम्मान पाना इतना आसान नहीं है, क्योंकि जिन ताकतों के कारण वह छत्तीसगढ़ छोड़ने के लिए मजबूर हुआ, वे ताकतें तो केरल में भी है। छत्तीसगढ़ में सत्ता में है, तो केरल में नफ़रती राजनीति और गोदी मीडिया के दुष्प्रचार के जरिए सत्ता में आने की वर्षों से जी-तोड़ कोशिश कर रही हैं, लेकिन वहां की जनता संघी गिरोह को घास डालने के लिए तैयार नहीं है। हां, नफरत फैलाने के लिए इस गिरोह के पास बहानों की कमी नहीं है और वह जब-तब इन बहानों से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश करती है।

बांग्लादेशी का मुद्दा भाजपा की नफ़रती राजनीति के लिए काफी मुफीद है। इस कार्ड को उसने झारखंड और बिहार के चुनावों में खेला है, पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी खेल रही है। चुनावी नतीजे चाहे जो भी हो, समाज को हिंदू-मुस्लिम में बांटकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए यह बहुत मौजूं मुद्दा है। संघी गिरोह को आशा है कि आज नहीं, तो कल, इसके जहरीले फलों से उसको बढ़त मिलेगी। लेकिन केरल जैसे दूरस्थ राज्य में, जिसकी सीमाएं बांग्लादेश को छूती भी नहीं है, इस मुद्दे को आजमाया जाएगा, किसी ने सोचा भी नहीं था। लेकिन आजमाया गया, वह भी छत्तीसगढ़ के मजदूर रामनारायण बघेल पर, जो हिंदू था, भाजपा का ही वोटर था और बंगाली नहीं था, बंगला भाषा उसे बोलना भी नहीं आता था, लेकिन ‘अवैध बांग्लादेशी’ के रूप में उसे लिंचिंग का शिकार बनाया गया। यह तब है, जब जिस चुनाव आयोग को इस मुहिम के लिए साधा गया है, पूरे देश में चल रहे एसआईआर के बाद भी वह यह बताने की स्थिति में नहीं है कि कितने विदेशी नागरिकों, और खास तौर पर बांग्लादेशियों की उसने शिनाख्त कर ली है।

केरल की माकपा और वाम मोर्चा सरकार को निशाना बनाने वालों को तब निराशा हुई, जब केरल सरकार ने आरोपियों को तुरंत अपनी गिरफ्त में लिया और उनके आपराधिक इतिहास को उजागर किया। हमले का नेतृत्व करने वाले लोग भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े वे कार्यकर्ता और समर्थक ही निकले, जिन्होंने हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा के लिए सक्रिय रूप से प्रचार किया था। वे हिस्ट्री-शीटर हैं और उन पर हत्या के प्रयास सहित कई मामले पहले से ही दर्ज हैं।

केरल सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, पहले आरोपी अनु पिता अप्पुन्नी पर वलयार पुलिस स्टेशन में 9 आपराधिक मामले (एफआईआर क्रमांक : 30/2007, 002/2009, 106/2012, 364/2012, 569/2012, 829/2013, 336/2015, 419/2015, 04/2023) दर्ज हैं, जिनमें सांघातिक हमला और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। ये सभी मामले वलयार टाउन नॉर्थ और कासाबा पुलिस स्टेशनों में दर्ज हैं। एक अन्य आरोपी, प्रसाद पिता चंद्रन पर 2 मामले (एफआईआर क्रमांक : 996/2014, 821/2015) और मुरली पिता चाथू पर 3 मामले (एफआईआर क्रमांक : 2/2009, 106/2012, 569/2012) दर्ज हैं। हालांकि संघी गिरोह ने अपनी आदत के अनुसार, इन हमलावरों के अपने से जुड़े होने से इंकार किया है, लेकिन कोर्ट की कार्यवाही के दौरान, एक स्थानीय भाजपा नेता आर जिनेश, जो एक अन्य हत्या के मामले में आरोपी हैं, ने उनकी पूरी मदद की है।

संघी गिरोह मॉब लिंचिंग को एक राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। यह ध्यान देने की बात है कि इसी साल जुलाई अंत में केरल के एक चर्च से जुड़ी दो ननों पर छत्तीसगढ़ के दुर्ग रेलवे स्टेशन में पुलिस की मौजूदगी में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए हमला किया था। भाजपा सरकार ने इन ननों के खिलाफ बस्तर की तीन वयस्क आदिवासी महिलाओं की मानव तस्करी का झूठा मामला भी बनाया था। ये तीनों आदिवासी महिलाएं पीढ़ियों से ईसाई धर्म की अनुयायी हैं। इस मामले में हुई देशव्यापी प्रतिक्रिया के बाद पूरे संघी गिरोह को बैकफुट में आना पड़ा था। केरल भाजपा के राज्य अध्यक्ष को सार्वजनिक रूप से इन ननों पर हुए हमलों के लिए केरल की जनता से माफी मांगनी पड़ी थी। बाद में इन ननों को एनआईए कोर्ट ने जमानत दे दी थी। तीनों आदिवासी महिलाओं ने राज्य महिला आयोग में संघी गिरोह के खिलाफ शिकायत भी दर्ज की थी। आयोग में भी उन्हें तरह-तरह से परेशान किया गया और ननों के खिलाफ बयान देने के लिए दबाव डाला गया था।

साफ है कि नफ़रती संघी चिंटूओ के निशाने पर केवल ईसाई और मुस्लिम ही नहीं, आदिवासी और हिंदू भी हैं। कहीं धर्मांतरण का बहाना है, तो कहीं लव-जिहाद का, और कुछ न मिला, तो हिंदुओं को ही बांग्लादेशी बना दो। नफरत का व्यापार फलता-फूलता रहना चाहिए, इससे वोटों की अच्छी फसल कटती है। तिरुअनंतपुरम नगर निगम चुनाव में शशि थरूर और दूसरे कांग्रेसियों की मदद से सबसे बड़े ब्लॉक के रूप में उभरने के बाद संघी गिरोह की यह सुनियोजित रणनीति है कि चाहे जिस तरह से हो, इसी नफरत की राजनीति को आगे बढ़ाना है।

पूरे भारत में ईसाई और मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर बड़े पैमाने पर हमले हो रहे हैं। पूरे देश में संघी गिरोह ने क्रिसमस समारोहों को अपने हमले का निशाना बनाया है। कहीं क्रिसमस के त्योहार पर पहनी जाने वाली लाल टोपी बेचने वाले मजदूर पर हमला हुआ है, तो कहीं उनकी प्रार्थना सभाओं पर हमला हुआ है और चर्च पर पथराव। पूरे देश में नफ़रती चिंटूओ ने सांताक्लॉज़ के पुतले फूंके हैं और उन पर जूते बरसाये हैं!! भाजपा शासित छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में क्रिसमस की सजावट के लिए न केवल मॉल पर हमला किया है बल्कि नाम पूछ-पूछकर ईसाई समुदाय के लोगों की पिटाई की है। हर साल क्रिसमस के दिनों में स्कूलों में छुट्टी दी जाती है। इस साल भाजपा शासित राज्यों में बहुत-सी जगहों पर यह छुट्टी रद्द कर दी गई या कटौती कर दी गई। यह आने वाले सालों में सरकारी कार्यालयों में इस दिन दी जाने वाली छुट्टी को चुपचाप हटाने की तैयारी का भी संकेत है।

यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम के अनुसार, 2024 में ही पूरे भारत में ईसाइयों के खिलाफ अपराध की 843 घटनाएँ हुईं थीं, यानी हर महीने 70 हिंसक घटनाएँ। 2025 में नवंबर तक ऐसी 706 घटनाएँ दर्ज की जा चुकी हैं। यह दोगलापन संघ-भाजपा में ही दिख सकता है कि एक ओर, जहां क्रिसमस के आगे-पीछे कैरोल गाने वाले बच्चों के बैंड पर संघी गिरोह हमले कर रहे थे, इन छोटे-छोटे बच्चों पर लाठी-डंडों से हमला करके उनके बैंड-बाजे तोड़ रहे थे ; वहीं दूसरी ओर, प्रधानमंत्री मोदी कैथेड्रल चर्च में जाकर फोटो-खिंचाऊं सेशन कर रहे थे, ताकि केरल में अपने घृणित हिंदुत्व की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए ईसाई समुदाय के कुछ वोट बटोर सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह द्वारा चुनावी फायदे के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के उद्देश्य से शुरू किया गया नफ़रत भरा अभियान ही ऐसे माहौल के लिए ज़िम्मेदार है, जहां अवैध “बांग्लादेशी घुसपैठियों” का झूठा डर फैलाकर मॉब लिंचिंग की जा रही है। पूरी दुनिया भाजपा राज में भारत में बढ़ते उस हिंदुत्व आतंकवाद को देख रही है, जहां ईसाई और मुस्लिम समुदाय को हाशिए पर डाला जा रहा है और उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है।

बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक हैं और उन पर मुस्लिम तत्ववादी हमले कर रहे हैं, वहां वे हिंदू समुदाय के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं। इधर भारत में ईसाई और मुस्लिम समुदाय अल्पसंख्यक हैं और हिंदुत्व की ताकतें उन पर हमले कर रही है। देश की जनता को समझना होगा कि इधर हो या उधर, सांप्रदायिक ताकतों का चरित्र एक ही होता है। वे नफरत की राजनीति करती है, सत्ता पर कब्जा करती है और अपने लिए पैसे बनाती है और अपने पूंजीवादी कॉर्पोरेट मित्रों के लिए गैर-कानूनी ढंग से तिजोरी भरने के रास्ते खोलती है।

रामनारायण बघेल की संघी गिरोह द्वारा मॉब लिंचिंग के बाद केरल सरकार ने न केवल आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार किया है, बल्कि उसने मृतक के परिवार को 30 लाख रुपये का मुआवज़ा भी दिया है और सभी ज़रूरी इंतज़ाम किए हैं। भाजपा की डबल इंजन सरकार के बावजूद जिस राज्य से उसे पलायन करने के लिए विवश होना पड़ा, उसने 5 लाख रुपए मुआवजे की घोषणा कर इतिश्री कर ली है और अभी तक मृतक परिवार की कोई सुध नहीं ली है। भाजपा सरकार को यह बताना होगा कि उसके “सु-(विष्णु)शासन” में रोजी-रोटी के लिए गरीबों को पलायन क्यों करना पड़ रहा है और प्रवासी मजदूरों को संघी गिरोह के उत्पीड़न का शिकार क्यों होना पड़ रहा है? संघी गिरोह जानता है कि वास्तव में वे कर क्या रहे हैं, इसलिए इन्हें कभी क्षमा करने की भी प्रार्थना प्रभु से नहीं की जा सकती।

(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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