मूर्धन्य लेखक पत्रकार राकेश अचल का विश्लेषण- बिहार में कमल खिलने का दिवास्वप्न


देश में भाजपा का गठन हुए चार दशक हो गए,इस लम्बी यात्रा में भाजपा ने केंद्र की सत्ता तो दूसरी -तीसरी बार हासिल कर ली लेकिन बिहार जीतने का भाजपा का सपना आज भी अधूरा है .यहां मोदी का जादू अब तक नहीं चला है.भाजपा बिहार में जदयू के के सहारे एक बार फिर मैदान में है. बिहार में हर बार भाजपा का सपना टूटने से केंद्र में भाजपा की तमाम उपलब्धियां बार-बार धूमिल हो जाती हैं .
बिहार विधानसभा के पहले मुख्यमंत्री कृष्ण सिंह समेत अब तक 18 मुख्यमंत्री कांग्रेस के हिस्से में आ चुके हैं ,यानि अब तक बने 36 मुख्यमंत्रियों में से आधे कांग्रेस के रहे हैं. मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अपने जोड़तोड़ के बूते चार बार राज्य के मुख्यमंत्री रह लिए हैं,उन्होंने कभी राजद और कांग्रेस का दामन थामा तो कभी भाजपा का लेकिन भाजपा के किसी नेता का नाम अब तक मुख्यमंत्रियों की इस फेहरिस्त में शामिल नहीं हो पाया है .बिहार में जनक्रांति दल,कांग्रेस [ओ ],सोशलिस्ट पार्टी,जनता पार्टी, जनत दल ,राजद,जदयू और जदयू के कांग्रेस और भाजपा गठबंधन को अवसर दिया लेकिन भाजपा को अकेला नहीं चुना .
भाजपा के महान और बकौल भाजपा नेता युगावतार प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का जादू भी यहां पिछले कई चुनावों से परवान नहीं चढ़ रहा है. बिहार जीतने केलिए भाजपा अब तक के सभी ठठकर्म कर चुकी है लेकिन कामयाबी है की भाजपा से लगातार दूर भाग रही है. अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को घोषणा करना पड़ी है कि बिहार में मुख्यमंत्री बनेगा तो जदयू का बनेगा .आखिर ऐसा क्या है जो बिहार में भाजपा को पांव नहीं जमाने दे रहा है .क्या नदियों से घिरा बिहार कमल की खेती के लिए माकूल नहीं है ?
आपको याद होगा कि 2014 लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में पहली बार चुनाव हो रहा था. देश में मोदी लहर थी. जेडयू और बीजेपी पहली बार बिहार में विधानसभा चुनाव अलग-अलग लड़ रहे थे. बीजेपी से अलग होकर नीतीश कुमार ने बिहार में महागठबंधन बनाया और हैट्रिक लगाई. महागठबंधन ने 178 सीटें अपने नाम की. सरकार बनाई, लेकिन कुछ महीनों बाद नीतीश कुमार दोबार बीजेपी से गठबंधन कर सरकार बनाई और आरजेडी से अलग हो गए.
साल 2005 बिहार की राजनीति के लिए अहम वर्ष रहा. 15 साल के राजद शासन के बाद बिहार की राजनीति ने करवट ली. एक साल में दो बार विधानसभा चुनाव कराए गए. विभाजित बिहार में सुशासन और विकास राजनीति का मुख्य मुद्दा बना. सत्ता की कमान नीतीश कुमार को संभालने का मौका मिला. बिहार में 243 विधानसभा सीट के लिए फरवरी 2005 में हुए चुनाव में किसी दल को सरकार बनाने के लिए पर्याप्त बहुमत नहीं मिली. गठबंधन की सरकार बनाने को बेताब राजद को इस बार सत्ता की चाबी नहीं मिली. ऐसे में फिर चुनाव में जाने के सिवाय कोई विकल्प नहीं था. फिर अक्टूबर 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में जदयू और बीजेपी गठबंधन को भारी सफलता मिली. राजद को जहां 75 सीटें मिली थी. वहीं अक्टूबर में यह घटकर 54 हो गयी. जदयू को 55 की जगह 88 और बीजेपी को 37 के स्थान पर 55 सीटें मिली. इसी प्रकार कांग्रेस को 10 के स्थान पर नौ तो लोक जनशक्ति पार्टी को 29 की जगह मात्र 10 सीटें मिली. इस तरह से बिहार में नीतीश के सुशासन राज की शुरूआत हुई.
बिहार को ३६ में से १८ मुख्यमंत्री देने वाली कांग्रेस 1990 में हुए बिहार विधानसभा के चुनाव में आजादी के बाद अब तक के अपने प्रदर्शन के सबसे निचले पायदान पर थी. उसे महज 71 सीटें हासिल हुईं. जनता दल 122 विधायकों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में सामने था. केंद्र की तर्ज पर जनता दल की बनने वाली सरकार को भाकपा, माकपा और भाजपा ने समर्थन दिया था. पर कुछ ही महीनों बाद बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर बने मोर्चा से बाहर हो गयी. 1990 से 2005 तक लालू प्रसाद और राबड़ी देवी की सरकार रही और इस दौरान राजनीति का चेहरा, उसके सामाजिक समीकरण पूरी तरह बदल गये. लगभग एक ही सामाजिक समीकरण पर किसी सरकार का डेढ़ दशक तक सत्ता में बने रहना दूसरी परिघटना थी. इसके पहले 1952 से 1967 तक कांग्रेस की सरकार थी जो पंद्रह साल तक चली.
अब इस बार बिहार में लालू प्रसाद हैं और न रामविलास पासवान लेकिन मोदी हैं ,इसलिए ये देखना महत्वपूर्ण है की मोदी का जादू कितना कारगर होता है. मोदी जी यदि बिहार को जीत पाए तो उन्हने बंगाल और यूपी जीतने में भी मदद मिलेगी,अन्यथा उनका रास्ता इन राज्यों के साथ ही दिल्ली के लिए भी कठिन हो जाएगा .मोदी जी ने आज बिहार के सासाराम,गया और भागलपुर में चुनाव सभाओं को सम्बोधित किया है ,उनके भाषण पहले जैसे नहीं हुए हैं.मोदी जी के भाषणों की विषय वस्तु बदली हुईहै,तेवर बदले हुए हैं .सच का रंग बदला है ,झूठ का रंग भी बदला है .अब सवाल ये है की क्या बिहार का मतदाता भी अपना मन बदलेगा .
मुझे लगता है कि कांग्रेस तो 1990 के बाद से जैसे बिहार को अजय मान चुकी है .राज्य में कांग्रेस की तैयारियां भी अब पहले जैसी नहीं है. जगन्नाथ मिश्रा के बाद कांग्रेस बिहार में अपना कोई कद्दावर नेता पैदा ही नहीं कार पायी. इस हिसाब से बिहार कांग्रेस से लगातार दूर होता जा रहा है .कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व भी भाजपा के नेतृत्व की तरह आक्रामक नहीं है .कांग्रेस ने सब कुछ भाग्य भरोसे छोड़ दिया है इसलिए हमें कांग्रेस की बात करना ही नहीं चाहिए .
बिहार की जनता ने हाल के कोरोनाकाल में सबसे जयादा पीड़ा भुगती है ,इसलिए इन चुनावों पर कोरोनाकाल की पीड़ा का असर भी पड़ेगा ही ,शायद इसीलिए भाजपा ने बिलकुल बचपना दिखते हुए बिहारियों को कोरोना की वैक्सीन मुफ्त में देने का ऐलान कर दिया है जैसे वैक्सीन भारत सरकार नहीं भाजपा अपने घर की फैक्ट्री में तैयार कर रही है .बिहार की जनता बेहद चतुर-सुजान है .आने वाले दिनों में नतीजे मेरी बात की ताईद करेंगे .बस आप टीवी पार चल रहे दंगलों से अपने आपको दूर रखिये .

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