अश्रुधार भरी आँखों से,
किस विधि दर्शन पाऊँ माँ?
मेरे मन में सबके कोरोना है,
मैं कैसे अब मुस्काऊँ माँ?

कदम-कदम पर भरे हैं काँटे,
ऊँची-नीची अब खाई है,
घर से निकलना बड़ा मुश्किल,
कोरोना तो बड़ी हरजाई है।
दुःखों की बेड़ी पड़ी पाँव में,
किस विधि चलकर आऊँ माँ?
अश्रुधार भरी आँखों से,
किस विधि दर्शन पाऊँ माँ?
पाप-पुण्य में भेद बता दे,
धर्म-कर्म का ज्ञान दे।
अंदर तू डॉक्टर बन बैठी है,
इतना मुझको भान दे।
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“सेतराम साहू “सेतु”
कौहाकुड़ा पिथौरा






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