रोज की तरह अपने घर की बालकनी में बैठी मैं अखबार के अगले अंक के लिए एक लेख लिखने में व्यस्त थी तभी कानों में एक बड़ी ही सुरीली आवाज सुनाई दी ” ले लो आम रसीले ,नीबू पीले-पीले ,आलू सब का राजा है ,करेला बिल्कुल ताजा है।”एकाएक मेरी कलम रूक गई और मैं इस आवाज को सुनने लग गई।मुझे लगा मानो मेरे कान बज रहे हैं।लेखिका हूं न, शायद इसीलिए मुझे हर जगह कहानी और हर किसी के शब्दों में कविता सुनाई देती है ,मैं शब्दों को अनसुना करके फिर लिखने बैठ गई। 2 मिनट ही बीते होंगे कि मुझे फिर वही स्वर सुनाई दिया और अब मुझसे रहा नहीं गया, मैंने आदतन कलम को उसी अधूरे पन्ने के बीच में रखकर डायरी बंद की, बाहर आई तो देखा सचमुच एक सब्जी वाला बड़े सुरीले अंदाज में सब्जी बेच रहा है। मैंने उसे आवाज लगाई भाई सुनो जरा -वह अपना ठेला वापस लेकर मेरे गेट तक आया। मैंने उससे पूछा यह बताओ इतनी अच्छी कविता तुम्हें कहां से सूझी, सब्जियां बेचने के लिए ?उसने एक ठंडी सांस ली और बोला -मैडम जी यह सब्जियां बेचने के लिए गढी गई कविताएं नहीं है यह तो मंचों और समारोहों के लिए लिखी जाती थीं लेकिन क्या करें लॉक डाउन में सबकुछ बंद ,न कोई समारोह न कोई मंच। हमारे जैसे कवियों को तो खाने के भी लाले पड गए हैं। पहले कभी-कभी छोटे अखबारों और पत्रिकाओं में भी छप जाती थीं हमारी रचनाएँ, लेकिन अब तो कितने ही लोकल अखबार बंद और हमारे जैसे छोटे-मोटे कलम कार मजबूरी में कलम बंद कर सब्जी बेचने पर मजबूर हैं। क्या करें मैडम पेट भी तो भरना है परिवार का, मैं निरुत्तर उसे देखती रही।
वह थोड़ी देर तक खड़ा रहा फिर बोला आपको कुछ दूं मैडम। मैंने आवश्यकता न होते हुए भी भरे मन से सब्जियां और फल खरीदे और पूछ बैठी भाई चाय पियोगे।अचानक मेरे इस सवाल से मैं और वो दोनों हैरान हो गए ।मैंने ये सवाल उससे क्यूं पूछा सोचने लगी।
वह हैरान सा मेरी तरफ देखने लगा,मैं क्या कहती उससे कि मैं भी एक कलमकार हूं वो भी। इस नाते वह कार परिवार का सदस्य, मेरा एक भाई ही तो हुआ ,उसको चाय पूछना तो मेरा फर्ज बनता है। लेकिन उसने मना कर दिया और हंसते मुस्कुराते हुए सब्जियां बेचते हुए आगे की तरफ निकल पड़ा मैं वही खड़ी सब्जीवाले भाई को देखती रह गई।
✍डॉ ममता श्रीवास्तवा, सरूनाथ ।







Comments are closed.