मेरे भी ख्वाब यहाँ निराले हैं , चमकती आंखों में सितारे है।
उड़ना तो हम भी चाहते है इस जहांन
में ।
पर बेवस लाचार जिन्दगानी है।
पग-पग के साथ अब चलना भारी है।
कैसे कहें यही हमारी दुनियादारी है।
ना हाथों में किताब ना स्कूल का
कही ठिकाना है।
सुबह का पता नहीं जब शाम को
थके-हारे घर आते हैं।
कही भोर ना हो जाए इसलिए चुप-चाप सो जाते है।
गरीबी में जन्म लेकर खुद को क्या
संवारेंगे ?
जब आग पेट में लगी हो तो
काॅपी-पेन भी निरस लग जाएंगे।
पापी पेट के लिए सारा जीवन हारा।
इसके बिना ना कोई हमारा सहारा
है।क्योंकि भूख ने हमें सताया है।

(ज्योति सिंह )उत्तर प्रदेश ज़िला-देवरिया






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