
देश में सूचना का अधिकार कानून लागू हुए 15 साल हो चुके ।12 अक्टूबर 2005 को लागू इस कानून का मुख्य उद्देश्य सूचना के अधिकार को व्यापक और प्रभावी बनाकर सरकारी तंत्र को पारदर्शी बनाना है। इस दिशा में इस कानून के 15 वर्ष की यात्रा में कुछ महत्वपूर्ण सकारात्मक परिणाम जैसे घोटालों , भ्रष्टाचार आदि के मामले को उजागर मिले लेकिन कुछ चुनौतियां हैं जो इसके प्रभावी क्रियान्वयन में बांधा बन रही है। हाल ही में प्रकाशित ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के रिपोर्ट के अनुसार भारत में आरटीआई कानून लागू होने के डेढ़ दशक के दौरान 3.32 करोड़ (2.6 प्रतिशत) लोगों ने ही इस अधिकार का इस्तेमाल किया है। जिससे स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मजबूत हथियार को व्यापक बनाने की मुहिम काफी धीमी गति से आगे बढ़ रही है । रिपोर्ट मुताबिक सर्वाधिक आरटीआई केन्द्र सरकार के विभिन्न महकमों में डाली जा रही है जबकि राज्यों में आरटीआई के इस्तेमाल के मामले में महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु पहले तीन पायदान पर हैं। इस कानून के सुस्त गति के लिए सूचना तंत्र को मजबूती प्रदान करने की नाकामी को प्रमुख वजह बताया गया है। आरटीआई कानून को प्रभावी बनाने के लिये केन्द्र एवं राज्यों के स्तर पर गठित सूचना आयोगों में खाली पड़े पद इसका बड़ा सबूत हैं।उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बावजूद सूचना आयोगों में सूचना आयुक्तों के 160 में से 38 रिक्त पदों को नहीं भरा जा सका है। इस कानून में केन्द्र और राज्य सरकारों की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वे वार्षिक रिपोर्ट तैयार कर सार्वजनिक करे। लेकिन इस बारे मे अधिकांश राज्यों ने पिछले कई सालों से वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की है। है। इतना ही नहीं कोरोना संकट के शुरु होने के बाद अधिकांश राज्यों के सूचना आयोगों में ऑनलाइन सुनवाई भी बंद हो गई है जबकि कोरोना संकट के दौरान ऑनलाइन सुनवाई को प्रभावी बनाने की जरूरत थी। आरटीआई के पिछले 15 साल के अनुभव से साफ जाहिर है कि देश में सरकारें और सरकारी तंत्र से जुड़े लोग व नागरिकों में पारदर्शिता के प्रति रवैया तथा जागरूकता के स्तर में कई कमियां और चुनौतियां हैं। सूचनाएं सार्वजनिक करने में टालमटोल करने की प्रवृत्ति में सुधार न होने के कारण इस कानून को व्यापक तौर पर प्रभावी बनाने में बाधा उत्पन्न होती है। आवश्यकता इसी दूर करने की है ताकि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त कर सकेें।
सुजीत कुमार
कोटा बिलासपुर छत्तीसगढ़






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