पसहर चाउर : प्रकृति का अनुपम वरदान और कमरछठ का आरोग्य-सूत्र, स्वास्थ्य के लिए अनमोल खजाना

पसहर चाउर केवल एक अनाज नहीं, बल्कि प्रकृति का स्वाभाविक उपहार, आयुर्वेद का श्रेष्ठ रक्तशालि धान्य, छत्तीसगढ़ की संस्कृति, मातृशक्ति और स्वास्थ्य का अभिन्न अंग है।– छत्तीसगढ़ की धरती

प्रकार की पारंपरिक धान किस्मों का भंडार है। इन्हीं में एक अनमोल उपहार है पसहर चाउर (लाल चावल)। यह विशेष धान की किस्म प्राकृतिक रूप से उगती है, जिसे स्थानीय किसान “स्वयंसेवी” धान भी कहते हैं, क्योंकि इसे अलग से बोया नहीं जाता। यह वर्षा और मिट्टी की प्राकृतिक परिस्थितियों में उगता है तथा रासायनिक उर्वरक व कीटनाशकों से पूर्णतः मुक्त रहता है, जिससे यह शुद्ध, सात्विक और स्वास्थ्यवर्धक बनता है।

कमरछठ (जिसे हलषष्ठी भी कहा जाता है) का त्यौहार छत्तीसगढ़ का एक बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार है जिसमे माताएँ अपने पुत्र के कुशल मंगल की कामना करती है। इस व्रत के माध्यम से महिलाये अपने संतान के उज्जवल भविष्य और उनके दीर्घायु हेतु विशेष विधि विधान से पूजा अर्चना कर अपने मातृ धर्म का निर्वहन भली भांति करती है। इस त्यौहार पर माताएं पसहर चांवल का सेवन कर अपना व्रत पूरा करती है। यह पसहर चांवल केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखता बल्कि इसमें स्वास्थ्य के लिए है गुणों का खजाना भरा होता है।  

आयुर्वेद में शुकधान्यों का स्थान

आयुर्वेद चिकित्साधिकारी डॉ. ऐश्वर्य साहू रानीपरतेवा, गरियाबंद ने बताया कि आयुर्वेद में रक्तशाली को शुकधान्य वर्ग में सर्वोत्तम अन्न के रूप में वर्णित किया गया है। धान की कई किस्मों में “रक्तशालि” विशेष महत्व रखते हैं, जो वर्षा ऋतु में पकते हैं और बल्य तथा पुष्टिकर गुणों से युक्त होते हैं। पसहर चाउर अपनी लालिमा, मधुर रस और पोषण-समृद्धि के कारण श्रेष्ठ शालि धान्यों में गिना जा सकता है।

चरक संहिता (सूत्रस्थान 27) और सुश्रुत संहिता (सूत्रस्थान 46) में रक्तशालि धान्य को मधुर रसयुक्त (स्वाद में मीठा),  गुरु (पचने में भारी), स्निग्ध (संतृप्त और पोषक), शीत वीर्य (शरीर को शीतलता प्रदान करने वाला) और मधुर विपाक (पाचन के बाद भी पोषण बनाए रखने वाला) बताया गया है।

औषधीय गुण एवं चिकित्सीय उपयोग

1. बल्य एवं पुष्टिकर – शरीर की मांसपेशियों, अस्थि और धातुओं को पोषण देता है, दीर्घकालिक थकान व दुर्बलता में लाभकारी।2. रक्तवर्धक – प्राकृतिक आयरन और खनिजों से भरपूर होने के कारण रक्ताल्पता, प्रसूति-उत्तर दुर्बलता में उपयोगी।3. वातशामक – वातदोष से उत्पन्न पीठ, कमर व जोड़ों के दर्द में सहायक।4. वर्ण्य – त्वचा की कांति और स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायक।5. शक्तिवर्धक आहार – दीर्घ रोगों के बाद रिकवरी में लाभकारी।6. विशेष चिकित्सीय प्रयोग – शष्टिक शालि स्वेदन

आयुर्वेद की एक प्रमुख पुनर्वास पद्धति है जिसमें शालि धान्य ( लाल धान ) को दूध में पकाकर गठानदार पोटली से शरीर पर स्वेदन किया जाता है। यह स्नायु-मांसपेशी दुर्बलता, लकवा, संधिशूल, मांसकषाय आदि में अत्यंत लाभकारी है। पसहर चाउर जैसे लाल शालि धान्य इस प्रक्रिया में उत्तम परिणाम देते हैं, क्योंकि इनमें प्राकृतिक स्निग्धता और पोषण तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं।

कमरछठ में पसहर चाउर का सांस्कृतिक व चिकित्सीय महत्व

कमरछठ छत्तीसगढ़ का पारंपरिक पर्व है, जो मातृशक्ति, कृषि और स्वास्थ्य का संगम है। इस पर्व में माताएं उत्तम संतान-प्राप्ति और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के लिए सगरी (मिट्टी का दीप-कलश) सजाकर पूजन करती हैं। पूजा में भैंस का दूध, दही और घी आयुर्वेद में ये बल्य, पौष्टिक और संतान-उत्पादन (गर्भधारण में सहायक) गुणों से युक्त माने गए हैं।

पसहर चाउर का खीर- मधुर रस, स्निग्धता और बल्य गुण के कारण यह गर्भधारण एवं प्रसूति-उत्तर स्वास्थ्य के लिए उत्तम है। महुआ और चना का प्रसाद – महुआ का मधुर, उष्ण व बल्य गुण तथा चना का उच्च प्रोटीन व पुष्टिकर प्रभाव, मातृ स्वास्थ्य और संतति-वृद्धि में सहायक हैं।

व्रत-पूजन के बाद इन पदार्थों का सेवन न केवल धार्मिक आस्था का पालन है, बल्कि आयुर्वेद के अनुसार यह शरीर में शुक्र धातु (प्रजनन शक्ति), रक्त धातु (रक्तवर्धन) और ओज (जीवन-ऊर्जा) को बढ़ाने में सहायक है।

आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से

फ़ाइल फ़ोटो : कमरछठ पर्व पर पूजा करती माताएं

पोषण विज्ञान के अनुसार, पसहर उर में आयरन – सामान्य चावल से 20–30% अधिक, एंटीऑक्सीडेंट (एंथोसाइनिन) जो हृदय, यकृत और रक्तवाहिनियों की रक्षा करते हैं, फाइबर – पाचन को सुधारता और शर्करा को नियंत्रित रखता है, खनिज – जिंक, मैग्नीशियम, मैंगनीज आदि, जो प्रजनन स्वास्थ्य और हार्मोन संतुलन में भी भूमिका निभाते हैं। 

पसहर चाउर केवल एक अनाज नहीं, बल्कि प्रकृति का स्वाभाविक उपहार, आयुर्वेद का श्रेष्ठ रक्तशालि धान्य, छत्तीसगढ़ की संस्कृति, मातृशक्ति और स्वास्थ्य का अभिन्न अंग है। कमरछठ में इसका प्रयोग दर्शाता है कि हमारे पूर्वजों ने त्योहारों में ऐसे आहार चुने जो आस्था, पोषण और चिकित्सा- तीनों को एक सूत्र में पिरो देते हैं।

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