गलियां सुनसान ओसरे पड़े वीरान,
जब से कोरोना
फैला है गांव में !
गपियाते बैठ के, दिख अब नही रहे
पहने पन्छा सयाने
पीपल के छाँव में !
कैद हैं बाहर, रहने वाले बच्चे घर में
लगा दिया रोग ने
बेड़ी उनके पाँव में !
अब मेहमान आएगा, मानना किया है बंद
सहजन में बैठे
कौवे के काँव में !
2
ऐसी स्थिति बनी, मानसिकता या बदली
मरे अगर कोई
कोई नही जायेगा !
जावूंगा तो कही, संक्रमित न हो जाउं
सोच के आगे बढ़ते
कदमों को लौटएगा !
खतम किया प्रेमभाव, कोरोना ने सारा
और जाने क्या क्या
दिन ये दिखाएगा !
लगता है तन्हा रख के, मरेगा हमको
एकाकी सड के
माटी में मिलाएगा !
3
कोरोना के कारण, गरीबों की स्थिति
बद से बद्द्तर
हो रहा है दिन दिन !
अपनों की चिंता में, मुखिया घर का
सुख के कांटा
हुआ जाता छीन छीन !
रोग के कारण कोई, ठेले का न खाता
पाले कैसे अरमान !
सिक्कों को गिन गिन !
चूस के धन्ने सभी, बन रहे आसामी
दीन इस काल में,
और होता दीन हीन !

प्रभात कटगीहा
कटगी






Comments are closed.