
अजीब बात है कि हमारे देश में असल मोर्चों पर लड़ने के बजाय मीडिया और राजनीति एक साथ उन मोर्चों को खोलकर खड़ी हो जाती है जो काल्पनिक और नियोजित हैं. अब देश कोरोना महामारी से होने वाली मौतों को भूल चुका है,रेलों के बंद पड़े परिचालन को भूल चुका है ,श्रमिकों और किसानों के खिलाफ बने कानूनों की किसी को याद नहीं है ,लेकिन सब अब हाथरस बलात्कार काण्ड का रसादोहन करने में लगे हैं .
इस नृशंस वारदात को जिम्मेदारी से लेने के बजाय पहले राज्य सरकार और स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने लीपापोती की और जब बात जगजाहिर हो गयी तो दनादन जांच ऐजेंसियां बना और बिगाड़ डालीं .अंत में देश की सबसे बड़ी अदालत की आँखों में धूल झौंकने के लिए झूठा हलफनामा देकर अदालत को भी भ्रमित करने की नाकाम कोशिश की .और जब सब हथियार मौंथरे साबित होते दिखाई देने लगे तो मामले को जातीय रंग देकर पूरे देश को बरगलाने का प्रयास शुरू करा दिया .
हाथरस के बूलगढ़ी बलात्कार काण्ड में आरोपियों का फैसला अदालत को करना है लेकिन आरोपियों के पक्ष में खुले आम पंचायतें हो रहीं हैं. आखिर इन्हें कौन प्रायोजित कर और करा रहा है. मीडिया के लोग दल-बल समेत अपनी समानांतर पंचायतें लगाकर आरोपियों के समर्थन में ‘शो’ कर रहे हैं. ऐसा तो पहले न हुआ और न किसी ने देखा .सरकार और मीडिया का स्वर अचानक समवेत क्यों हो गया है ? दोनों मिलकर अदालत का काम क्यों कर रहे हैं ? किसने कहा कि देश में आरोपियों के बजाय फरियादियों का नार्को टेस्ट कराया जाना चाहिए ?
यूपी की सरकार ने जब सारे मोर्चे नाकाम हो गए तो एक नया मोर्चा खोल दिया कि कोई संस्था राज्य में जातीय दंगे करने के लिए षडयंत्र रच रही थी,उसे नाकाम कर दिया है .कुछ लोग गिरफ्तार भी कर लिए गए हैं.इनमें कुछ पत्रकार भी हैं .मै इन सबके बारे में एक शब्द नहीं लिखने वाला क्योंकि अब इन सबका फैसला अदालतें करेंगी .मेरा कहना तो सिर्फ इतना है कि क़ानून और व्यवस्था के मोर्चे पर एक से अधिक अवसरों पर नाकाम हो चुकी राज्य सरकार राज्य में दंगे करने की साजिश को उजागर करने के लिए बूलगढ़ी काण्ड की प्रतीक्षा कर रही थी क्या ? सूबे में सामूहिक बलात्कार की ये घटना पहली तो नहीं थी ! पीएफआई और किसी घटना को लकेर ये सब क्यों नहीं कर सकती थी .ऐसी बहुत सी वारदातें हैं जो बूलगढ़ी की वारदातों जैसी ही हैं .
जनता को असली मुद्दों से भटकाने के लिए की जा रही ये साजिशें राज्य में कथित रूप से हिंसा भड़काने वाली साजिशों से कम खतरनाक नहीं हैं .पीएफआई को दंगे भड़काने के लिए सौ करोड़ रूपये की विदेशी फडिंग करने की बात सामने आई है.यदि इसमें हकीकत है तो अदालत इसका फैसला कर देगी .लेकिन दूसरी हकीकत ये है कि यूपी में क़ानून और व्यवस्था की जर्जर हो चुकी स्थिति के कारण राज्य में पूँजी निवेश आ ही नहीं रहा .ऐसे में कोई दंगों के लिए यहां सौ करोड़ रूपये लगा देगा ?क्या आप भरोसा कर सकते हैं ?और जब सत्ता में भाजपा हो तो कोई दूसरा दंगे करने के बारे में सोच भी कैसे सकता है .
हकीकत ये है कि देश में किसान आंदोलित हैं,श्रमिक आंदोलित हैं.बेरोजगार आंदोलित हैं. और सबसे बड़ी बात बिहार में विधानसभा के चुनाव हैं. इन सबके चलते यदि बूलगढ़ी काण्ड यूपी सरकार के गले की फांस बना रहता तो बाक़ी के मुद्दों से केंद्र की सरकार भी झुलस सकती थी,इसलिए बोलगधी कांड की दिशा और दशा ही बदल दी गई .अब आरोपी और फरियादियों की जातियों के लोग आपस में उलझ रहे हैं .उन्हें जानबूझकर उलझाया जा रहा है .लेकिन दुर्भाग्य कि कोई भी सच स्वीकार करने के लिए राजी नहीं है..
इस दौर में देश का सबसे बड़ा स्नाक्त कोरोना था,कोरोना है. कोरोना की आड़ में सरकार ने अपनी तमाम नाकामियों पर अपरदा दाल दिया यही. सरकार की नाकामियों पर न सड़क पर बात हो पा रही है और न संसद में. संसद की अवधि घटा दी गयी, ध्वनिमत को जनमत बना दिया गया और सड़कों पर प्रदर्शन करने वालों के ऊपर बेहद निर्मम डंडाधारी पुलिस को छोड़ दिया गया है .जो देश के आम आदमी से लेकर शीर्ष नेताओं तक को धुनने के लिए कमर कैसे खड़े हुए हैं .विरोध करने वालों की किस्मत में डंडे होते हैं इसलिए मै उन्हें लेकर ज्यादा गंम्भीर नहीं हूँ .मेरी चिंता चुपचाप हो रही मौतों को लेकर है .कुछ लोग अपराधियों के हाथों मर रहे हैं और कुछ कोरोना के कारण. देश में कोरोना अब तक 105,554 लोगों की जान ले चुका है.कोई 6,832,988 लोग इस महामारी से संक्रमित हो चुके हैं ,लेकिन सरकार ने अब इस पर बात करना ही बंद कर दिया है .सब कुछ राम भरोसे है .
दुर्भाग्य ये है कि अब तमाम मुद्दों पर देश की सरकार और अदालतों का स्वर एक जैसा सुनाई दे रहा है. इससे स्थिति कोढ़ में खाज जैसी होती दिखाई दे रही है. इस देश में अभी भी माननीय अदालतें जनता की आस्था का अंतिम केंद्र हैं .तमाम विसंगतियों के बावजूद बड़ी- से बड़ी समस्याएं अदालतों में ही हल हो रहीं हैं ,लेकिन जिस तरीके से फैसले आ रहे हैं ,वे जनता को निराश करते हैं. जनता के पास अदालतों के फैसलों पर प्रतिक्रिया देने का बहुत सीमित अधिकार है ,इसलिए कुछ कहा नहीं जा सकता .कहा जाना भी नहीं चाहिए .आखिर देश में कुछ तो सुप्रीम होना ही चाहिए .
ये समय है जब देश को एक बार फिर से जातिवाद के जहर से मरने से बचाया जाना चाहिए. जो लोग,संस्थाए, और सरकारें प्रत्यक्ष या परोसख़ रूप से जातीय संघर्ष को हवा दे रहीं हैं उन सबके खिलाफ सबको मिलजुलकर खड़ा होना चाहिए .वर्दीधारी संगठनों को भी अचानक बर्बर नहीं होना चाहिए. लाठियां भांजने से पहले देखना और सोचना चाहिए कि आखिर लाठियां किसी गुलाम देश के नागरिकों पर नहीं बल्कि संप्रभु राष्ट्र के नागरिकों पर चलाई जा रही हैं .ये 1947 के पहले का भारत नहीं है. ये भारत 2020 का भारत है.यहां जनादेश देने वाली जनता लाठियां खाने के लिए नहीं है. यदि जनता विरोध कर रही है तो उसे सूना जाना चाहिए,समाधान खोजे जाना चाहिए,न कि उन पर लाठियां बरसाई जाना चाहिए .
@ राकेश अचल






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