
डाॅ टी महादेव राव
मीडिया सेशन/ धर्म के आजानबाहू व्यक्तित्व का नाम श्री राम है और दूसरी तरफ राक्षसेश्वर रावण। दोनों नायक हैं, नेता हैं अपने-अपने क्षेत्र में। लेकिन उनकी युद्ध नीति अलग-अलग है। सोच विचार की उनकी अपनी-अपनी अलग दुनिया है। रावण दस शीषों वाला कीट है। छह आंतरिक दुर्बलताओं का दास। श्रीराम मूल्यों के महापथिक। धर्म दीक्षा भरा महान व्यक्तित्व जिन्होंने दशानन को पूरे सामर्थ्य से नष्ट किया। मुश्किलों का सामना करना पड़ा, पर अपने सिद्धांतों को त्यागा नहीं राम ने। अंतिम विजय अच्छाई की हुई। राम तत्व ही खड़ा रहा अजेय। फिर भी यदि हम चुनाव की तुलना युद्ध से करते हैं तो युद्ध की तुलना चुनाव से क्यों नहीं कर सकते? दांव पर दांव, आक्रमण पर प्रत्याक्रमण, दल बदल,धोखा धड़ी, असत्य प्रचार और असत्यों का अंबार। वहां भी थे यहां भी हैं। उस पर राम रावण युद्ध को याद दिलाते चुनावी शोर।
रामायण की एक और विशेषता है। यह महाकाव्य बताता है कि किस तरह विजय हासिल करें और यह भी बताता है कि किस तरह जीत प्राप्त न करें। वह युद्ध हो सकता है, चुनाव हो सकता है या जिंदगी भी हो सकती है। हम रामराज्य कहते हैं। नेता मतलब आदर्श शासन करने वाला। हम श्रीराम रक्षा कहते हैं। मतलब नायक या नेता पर पूर्ण भरोसा। रामबाण कहते हैं बिना चूके लक्ष्य प्राप्त करना। श्री राम ने कभी यह नहीं कहा कि वे परमात्मा हैं। उन्होंने सदा कहा मैं मानव मात्र हूं। राम में पद लालसा नहीं थी। इंद्र का पद भी यदि अनायास मिल जाए तब भी मुझे नहीं चाहिए कहते हैं श्रीराम। रावण वध के बाद लंकाधीश के रूप में विभीषण ने अपार संपत्ति श्रीराम को समर्पित किया तो श्रीराम ने उन्हें वानरों और भल्लूकों को में बांट देने के लिए कहा। उत्तम नायक या नेता कभी भी एक पक्षीय नहीं होता। युद्ध के समय विभीषण ने जब श्रीराम से आश्रय मांगा तो अपने सभी साथियों से सलाह मशविरा करके ही अपना अनुमोदन दिया। किसी भी स्थिति में प्रतीकार या बदले की राजनीति को उन्होंने प्रोत्साहित नहीं किया।
श्रीराम का कहना था युद्ध योद्धाओं से ही। आम जनता हमारी शत्रु नहीं। इसलिए श्रीराम को महर्षि वाल्मीकि ने विचक्षण अर्थात विवेक भरा व्यक्तित्व कहा। उस विवेक के गुण ने श्रीराम को सारे नायकों में उत्तम नायक, सारे योद्धाओं में महायोद्धा और सारे शासको में श्रेष्ठ शासक के रूप में सिंहासनस्थ किया। वर्तमान में विश्व को इसी तरह के नायक, नेता या अगुवा की आवश्यकता है।
कुछ लोगों में अपार आकर्षण शक्ति होती है। जनता को अपनी बातों के मायाजाल में फंसाने की प्रतिभा होती है। कानून के बारे में अच्छा ज्ञान होता है। लेकिन सारे सुगुण होने के बाद भी यदि थोड़ा असुर गुण या राक्षसी प्रवृत्ति मिल गया तो दूध के भंडार में विष की तरह सारे सुगुणों का नाश हो जाता है और वैसा व्यक्ति खतरनाक होता है। व्यवस्था को निगल लेता है। खजाना या कोषागार खाली कर देता है। रावण भी इसी तरह का प्रतीक नायक है। वाल्मिकी महर्षी ने रावण का वर्णन करते हुए कहा वह मृत्यु की तरह दिखता है। उसके आसपास हवा भी डरती है बहने के लिए। समुद्र उसे देखकर निश्चल हो जाता है। वह असुर बल है, राक्षसी ताकत है।
दीप की तरह प्रज्वलित नेता भी अपने स्वयं के अपराधों के कारण पतन की ओर चलते हैं। सीता हरण की घटना वैसे ही है। ब्रह्मा के वंश में जन्म लेकर, सारे ब्रह्मांड पर विजय पाकर भी रावण मानव मात्र जैसे दिखने वाले श्रीराम के हाथों मारा गया। पराजय से बचने के लिए उसमें अंतिम समय तक प्रयास किया। माया कपट षड्यंत्र किया। विभाजित करो जनता को और राज करो नीति अपनाने की कोशिश की। चुनावी व्यवस्था में अनैतिक नेता जो जो करता है वह सब रावण ने किया, फिर भी अपने पतन को रोक न सका। भ्रष्टाचार, अधिकार का दुरुपयोग, प्राकृतिक स्रोतों की लूट खसोट, रक्त से युक्त राजनीति ; यह सब रावण के अंश वाले लोगों के लक्षण हैं। जो दिखाई पड़ता है वह सच नहीं है, जो सुनाई पड़ता है वह भी असत्य है। उस दृश्य के पीछे अनेक अदृश्य शक्तियां। व्यक्तित्व हरण से लेकर शारीरिक यातनाओं तक। डीप फेक का निशान कुछ भी हो सकता है। वह चुनाव के समय सहस्त्र फन वाले विष सर्प की तरह फुंफकार रहा है। इसी का रिश्तेदार है फेक न्यूज़। विष में डुबोकर लिखे जाते अक्षर हैं ये। इस तरह के अनैतिक प्रचार, झूठ का अवतार रामायण काल में भी थे। इनमें मारीच कामरूप विद्या में पारंगत था। अवसर के हिसाब से वह रूप बदल सकता था। स्वर्ण मृग का रूप धरकर सीता हरण में रावण का उसने साथ दिया। मरते मरते भी राम की आवाज में हे सीता हे लक्ष्मण कहते हुए भ्रम में डाल दिया। फेक वॉइस से धोखा दिया। चुनावी मौसम में मारीच की संतान का ही सारा ताम-झाम है। जो नहीं है उसे जो नहीं कहा गया उसे है का या कहा गया कहकर धोखा देते हैं।
भ्रम में जनता विद्वेष पालने लगती है। युद्ध के समय रावण ने भी इसी तरह के डीप फेक षड्यंत्र भी रचा था। विद्युतजिह्व नाम के जादूगर की सहायता से श्रीराम के कृत्रिम सिर की सृष्टि की। उसे ले जाकर सीता के सामने रखा। संदेश भेजा गया कि पति मर चुका है इसलिए सीता अगर रावण की बात मान ले तो उसे सारी सुविधाएं दी जाएगी। सीता उन मायावी षडयंत्रों को जान चुकी थी। इंद्रजीत भी पिता से बढ़कर मायावी था। साइबर आक्रमण से भी बढ़कर अदृश्य होने में वह सिद्ध हस्त था। षड्यंत्र चाहे कितने भी रचे जाएं लेकिन अंत में सत्य की विजय हुई। किसी भी युग में सत्य की ही जीत होती है।
कार्यकर्ता नेताओं के लिए कार्य करता संबल है और बल भी है। चुनावी संग्राम में आगे बढ़कर लड़ने और लगन के साथ अपने विपक्षी प्रत्याशी को धूल चटाने वाला कार्यकर्ता ही है। राम का कार्य ही अपना पहला कर्तव्य मानकर हनुमान, जामवंत, सुग्रीव आदि रामायण में अति उत्तम कार्यकर्ताओं के रूप में अनथके कार्यसाधकों के रूप में प्रसिद्ध हुए। वास्तव में उस समय राम के पास अधिकार नहीं था, अर्थबल नहीं था, सैन्यबल भी नहीं था। फिर भी उन सब ने राम के नेतृत्व को स्वीकारा। राम के आदेश को सर्वोपरि और शिरोधार्य मानकर अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। माता सीता का अपहरण कर ले जाते रावण को रोकने के प्रयास में जटायु ने अपने प्राण खो दिए। श्रीराम के दर्शन के लिए अपने जीवन पर्यंत शबरी ने राह देखी। अपने नायक को अपनी नाव में तट पर ले जाने का महाआनंद केवट ने पाया। हनुमान एक सच्चे दास के प्रतीक हैं। वे साहसी हैं, विवेकशील हैं। तभी हनुमान जी को वाल्मीकि ने अमेयात्मा के रूप में प्रशंसा की। वास्तव में देखा जाए तो राम की तुलना में रावण की सेना, बल और कार्यकर्ता बहुत अधिक थे। लेकिन उनमें ज्यादा लोगों को अपने अधिनायक के प्रति आस्था नहीं थी। उनके द्वारा चुने गए विधि विधान के प्रति विश्वास नहीं था। उन्होंने सीता को सीता के अपहरण को सही नहीं माना। जिससे राम रावण संग्राम में वह पूरी एकाग्रता के साथ लड़ नहीं पाए।
हर युग में समाज को प्रभावित करने वाले कुछ व्यक्ति होते हैं। उन प्रभावशील समूहों को आज के पाजीटिव इंफ्लुएंसर्स से तुलना की जा सकती है। रामराज्य में वह मुख्य जिम्मेदारी विश्वामित्र आदि महर्षियों का था। वे एक ओर शासकों के लिए तो दूसरी ओर शासितों के लिए समान रूप से बड़े आलंब के रूप में खड़े थे। अकाल, सूखा और क्षाम के समय प्रकृति की कृपा के लिए यज्ञ हवन आदि करवाते थे। कुल मिलाकर महर्षियों की वाणी नागरिकों के सोच को और विचारों को एक नया रूप देती थी। समाज को अच्छाई की तरफ चलाती थी। इक्ष्वाकु कुल गुरु के रूप में वशिष्ठ महर्षि ने श्रीराम के व्यक्तित्व को एक रूप दिया। विश्वामित्र ने राम लक्ष्मण को दिव्यास्त्र प्रदान किए। रावण युद्ध के समय अगस्त्य ने आदित्य हृदय का उपदेश देकर राम के मनोबल को बढ़ाया। वाल्मीकि महर्षि ने इस आदिकाव्य रामायण को जनता में ले जाकर पुत्र, पति, भाई, नायक, मानव किस तरह जीवन में रहें, इसका उदाहरण सहित विवरण दिया। ऋषियों के आश्रम मूल्यों के विश्वविद्यालय के रूप में प्रचलित रहे, प्रसिद्ध हुए। उन दिनों अगर धर्म तीन पांव पर चलता था तो यह सब प्रभावी ऋषियों की देन थी, कृपा थी। आज सामाजिक माध्यमों में इनफ्लुएंसर केवल बातों के व्यापारियों के रूप में ढल रहे हैं और बाजार के अनुरूप अपने स्वर बदल रहे हैं।
यथा प्रजा तथा राजा। जनता के अनुसार ही शासकों का निर्णय हुआ करता है। जनता अगर अल्पकालिक लाभ चाहती है, तात्कालिक आनंद चाहती है तो पालक या शासक भी दूरदृष्टि के बिना विधि विधान बनाकर अपना समय निकालता है। रेवड़ियों का चारा डालते हुए जनता को अकर्मण्य और आलसी बनाता है। श्रीराम के वनवास के समय हजारों नागरिक उनके पीछे ही चलते रहे। उन्होंने राम की पीड़ा को अपनी पीड़ा माना। युवराज को अपनी मदद देना उन्होंने अपनी जिम्मेदारी समझी। ऐसे में भी नागरिकों ने अपने अधिकारों को नहीं भूले। शासकों से प्रश्न पूछना भी नहीं छोड़ा।
शास्त्र कहता है राजा कालस्य कारणम। राज्य में हो रही हर एक घटना का राजा के प्रत्यक्ष संबंध न होने पर भी शासक को उसकी जिम्मेदारी उसका दायित्व लेना होता है। अपने पुत्र के अकाल मृत्यु के लिए अयोध्यापति राम का ही दायित्व है कहते हुए एक नागरिक द्वारा राज महल के सामने धरने के लिए बैठी घटना रामायण में है। सार्वभौम चक्रवर्ती श्रीराम ने उस शिकायत पर तुरंत स्पंदित हुए। समस्याओं के मूल को जानकर बहुत अच्छा समाधान प्रस्तुत किया। उत्तम नागरिक उस समय प्रश्न करते हैं जब सही समय होता है। उस समय कटघरे में खड़ा करते हैं जब उन्हें कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। सही समय पर सही शासक को जिताते हैं, विजयी बनाते हैं जब विजयी बनाने योग्य शासन होता है, शासक होता है। रामराज्य केवल राजाराम का ही नहीं बल्कि शासित बने अयोध्या के जनमानस का भी है।








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