लक्ष्मी पुत्रों की इस नगरी में
एक अकिंचन आया है l
क्या बेचे वह, पास नही कुछ,
खुद ही बिकने आया है l
शब्दों का सौदागर नही,
कुछ शब्द संजोकर लाया हूँ l
विकल हृदय के भावों को,
सुहृदो में बाँटने आया हूँ l
रसिकों का सानिध्य मिलेगा
यही बसी है आशा में l
एक हार गीत का लाया हूँ,
है टूटी फूटी भाषा में l
कविता नही प्रयास है मेरा,
कुछ तुक मिला लाया हूँ l
कवि कहूं कैसे अपने को,
कहूं मै उसकी छाया हूँ l
सुख दुख तो आते ही रहेंगे
आओ कुछ हँस लें रो लें l
काव्य निर्झर की धारा में,
अपने हृद पट धो लें l

रचयिता
स्वओ बजरंग प्रसाद शर्मा







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