क्रांति का दूसरा नाम- भगत सिंह जन्मतिथि_विशेष

“मेरे जज्बात से इस कदर वाकिफ है मेरी कलम कि मैं इश्क लिखना चाहूं तो भी इंकलाब लिखा जाता है।”

यह विद्रोही शब्द सुनते ही हमारे दिल में एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी का चेहरा सामने आता है जिन्होंने देश को आजादी दिलाने के लिए क्रांति का रास्ता चुना और हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया। उस समय युवाओं के दिलों में भगत सिंह ने क्रांति की जो मसाल जलाई थी उसे अद्वितीय माना जाता है. भगत सिंह ने मातृभूमि की आजादी के लिए क्रांति को ही सशक्त रास्ता बताया और खुद भी इसी पर चलते हुए शहीद हुए और “शहीद-ए-आजम” कहलाए.

45 वर्षीय गांधीजी 1915 में जब अफ्रीका से भारत लौटे थे तब भगत सिंह की उम्र 8 वर्ष की थी, क्योंकि इनका जन्म 28 सितंबर 1907 ई. को तत्कालीन पंजाब प्रांत के लायलपुर जिला (अब पाकिस्तान में) हुई थी ,लेकिन इतनी छोटी उम्र में से ही निर्भीकता एवं राष्ट्रप्रेम की भावना भगत सिंह के दिलों में बहुत ही गहरी समाई हुई थी।
कहते हैं भगत सिंह अपने उम्र से ज्यादा परिपक्व थे।
लाहौर में स्‍कूली शिक्षा के दौरान ही उन्‍होंने यूरोप के विभिन्‍न देशों में हुई क्रांतियों का अध्‍ययन किया. 13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्‍याकांड ने उन पर गहरा असर डाला और गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत की आजादी के सपने देखने लगे.
युवावस्था में जब परिवार वाले ने शादी की ज़िद की तो उन्होंने कहा कि- मां तुम्हारी बहू मेरी दुल्हन नहीं बल्कि आजादी ही मेरी दुल्हन है।
फिर चल पड़े घर से दूर स्वतंत्रता संग्राम में एवं गांधीजी के साथ चल पड़े। असहयोग आंदोलन की सफलता से भगत सिंह जैसे नौजवानों को लगता था कि अब भारत जरूर आजाद हो जाएगा,
लेकिन महात्‍मा गांधी ने जब 1922 में चौरीचौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन को खत्‍म करने की घोषणा की तो भगत सिंह का अहिंसावादी विचारधारा से मोहभंग हो गया.
और वे गरम दल में शामिल हो गए। जहां उन्होंने “हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन” एवं 1926 में “नौजवान भारत सभा” जैसे क्रांतिकारी संगठन की स्‍थापना की और राष्ट्रहित के लिए लोगों को संगठित करने लगे।
भगत सिंह ने अपने कई सुनियोजित तरीके से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला कर रख दी थी।

हालांकि भगत सिंह “वैचारिक क्रांति” को ज्यादा तवज्जो देते थे। क्योंकि उनका कहना था- ‘बम और पिस्तौल से क्रांति नहीं आती, क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है!’
इसलिए तो वे बचपन से मार्क्सवाद, समाजवाद और लर्निंग की किताबें पढ़ते थे। यहां तक की जब सांडर्स की हत्या और असेंबली में बम फेंकने के जुर्म में जब जेल गए तो वहां भी फ्रांसीसी क्रांति, बोल्शेविक क्रांति जैसी कई किताबें पढ़ते थे। यदि कोई व्यक्ति उनसे जेल में मिलने आता तो वे उन्हें कहते थे कि उनके लिए क्रांतिकारी किताबें लाए। करीब जेल में उन्होंने 300 से अधिक किताबें पढ़ डाली यहां तक कि अपने फांसी के अंतिम क्षणों तक भी वे लेनिन के लिखी किताब को पढ़ रहे थे। वैचारिक रूप से मजबूत व्यक्ति ही मृत्यु के पलों में भी इतना बेखोफ रह सकता है।

भगत सिंह अक्सर जेल में अपने साथियों से कहा करते थे-
मेरे सीने में जो जख्म है वो तो फूल के गुच्छे हैं।
हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।
भगत सिंह खुद को नास्तिक कहते थे, वे ईश्वर और धर्म की अवधारणा में विश्वास नहीं करते थे, लेकिन फिर भी अपने जेब में भगवद्गीता की छोटी सी प्रति और स्वामी विवेकानंद की तस्वीर जरूर रखते थे।
बाद में ब्रिटिश हुकूमत ने उनकी फांसी की तारीख से 1 दिन पहले ही 23 मार्च 1931 को उनके साथियों के साथ उन्हें फांसी दे दिया। भले ही भगत सिंह अब नहीं है लेकिन उनके विचार भारत के हर एक नौजवान के दिलों में सदा रहेगी।

अगर भगत सिंह नौजवानी के प्रतीक हैं तो हर नौजवान उनकी तरह का होना चाहेगा. लेकिन भगत सिंह होना क्या आसान है! उसके लिए दिन-रात का चैन भुला देना होता है. खुद को उनसे जोड़ देना होता है, जिनसे आपका कोई खून का रिश्ता नहीं, जाति का सम्बन्ध नहीं, धर्म का जुड़ाव नहीं.

भगत सिंह का पहला मतलब है साहस और ईमानदारी. जो किया उसकी पूरी जिम्मेदारी लेना, उसके नतीजे से कतराना नहीं. यह गुण आज़ादी की लड़ाई के लगभग सभी नेताओं में दिखता है. इस लिहाज से देखें तो 23 वर्ष की आयु का एक क्रांतिकारी भगत सिंह को गांधी के करीब रखा जा सकता है।

रोहित राज
गिरिडीह (झारखंड)

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