
गणपति बप्पा की सेवा आरती कर उठा ही था कि मेरे पिताजी एवं मेरे भतीजे का वार्तालाप कानों में पड़ा । आवाज शायद बाहर से आ रही थी । जाकर देखा तो लाॅन में अख़बार पकडे़ हुए बाबूजी और भतीजे ओम में किसी बात को लेकर संवाद चल रहा था । क्या हुआ ओमी …. ? मेरे पूछने पर ओम ने तुतलाती जुबान में कहा – अले कुछ नहीं चाचा जी … , मैं बहुत देर से मोबाइल मोबाइल खेल रहा हूँ न तो दादाजी मना कर रहे हैं। मेंने बाबू जी की तरफ प्रश्नभरी नज़रों से देखा … आप भी न पीताश्री ….. ? मेरा इतना सुनना था कि फट पडे़ ….. तुम लोग जिस डिजिटिलाईजेशन , इंटरनेट , मोबाईल , कम्प्यूटर , लैपटॉप , वीडियो और टीवी की बातें करते फिरते हो न …. क्या समझते हो ये सारी चीज़ें इन बच्चों को ऐडवांस बना रहीं हैं … ? क़तई नही … । ज़रा सी बात हुई नहीं कि गुगल कर लिया …. खुद की बुद्धि गयी तेल लेने …. नयी नयी सोच और कल्पनाशीलता का तो कोई सवाल ही नहीं … । बच्चों के पत्र पत्रिकाओं से तो जैसे तुम लोगों ने किनारा ही कर लिया है। वैसे भी कुछ कम ही बाल पत्रिकाएँ छपती रहीं हैं हमारे देश में और जो अभी तक चल भी रहीं थीं सब धीरे धीरे बंद होती जा रही हैं … । बाबूजी हमेशा से ही खुशमिजा़ज किस्म के इंसान रहे हैं। आज पहली बार इतने गुस्से में मैने देखा। बोलते बोलते हाँफने लगे .. फौरन मैने पानी का गिलास पकडा़ते हुये कहा … पीताश्री आराम से …. । बाबूजी ने सामने टी टेबल पर जब अख़बार रखा तो मेरी नज़र उस ख़बर पर पडी़ जिसे पढ़कर ही बाबूजी का गुस्सा इतना भड़क गया था । बड़े बड़े अक्षरों में हेडिंग्स छपी थी – हिन्दी जगत की दो विश्व स्तरीय पत्रिकाएँ ‘ कादम्बनी ‘ और ‘ नंदन ‘ 28 अगस्त से हो जाएंगी पूरी तरह बंद …. । पहले तो मुझे भी यकीन नहीं हुआ … लेकिन अख़बार में छपी इस ख़बर का कोई न कोई आधार तो ज़रूर ही होगा …. यह सोचकर फौरन चढा़ लिया अनोखेलाल जी को अपनी नाक पर और लगा झाँकने चश्में के भीतर से …… ।
मुझे अच्छी तरह याद है … मैं यही कोई छै सात साल का तीसरी कक्षा में पढ़ने वाला विद्यार्थी था । एक बार स्कूल की बाल सभा में कविता पाठ प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए कविता सीखने के लिए गली गली , क्वार्टर दर क्वार्टर अपनी काॅलोनी वाले परिचितों के घर , अम्मा की उँगली थामें थामें बहुत घूमा था । स्कूल वाले मौजी राम वर्मा गुरूजी ने अम्मा से कहा था – बच्चा बहुत अच्छी कविता बोलता है , आजकल जो बाल पत्रिकाएँ आती हैं वह इसे दिलवाइये … बहुत अच्छा रहेगा इसके लिए …. पढे़गा भी और सीखेगा भी ।
बालसभा हुई । मेरी कविता सुनकर लोगों ने ताली भी खूब बजाई लेकिन मैं ज़रा भी खुश नहीं था क्योंकि बाकी जिन बच्चों ने तितली , फूल , नदी , पहाड़ , दादा दादी और परी वाली कविताएँ सुनाई थीं वो सारी बेहतर थीं मेरी सुनाई उस कविता से जो मेरे ही स्कूल के कक्षा नौवीं में पढ़ने वाले शंकर भैया ने जोड़ तोड़ कर मुझे सिखाई थीं । स्कूल से लौट ही रहा था कि मेरा ध्यान काॅलोनी वाले शाॅपिंग काॅम्पलेक्स के किनारे हाल में ही खुली हुई एक नई दुकान पर गया । शंकर भैया खडे़ मुस्कुरा थे । मैने नमस्ते किया तो पूछ बैठे – कैसी रही बाल सभा … ? अरे क्या बताऊँ भैया … ? मेरी ही कविता सबसे गंदी थी । बाकी सभी बच्चों ने बहुत ही अच्छी कविता सुनाई थी । मेरी बात सुनकर शंकर भैया बोले – इसीलिए तो मैं यहाँ खड़ा हूँ तुम्हारा इंतज़ार करते करते …. । यह नई दुकान खुली है .. श्री राज पुस्तकालय .. यहाँ पर हर तरह की किताबें , बच्चोंं की पत्रिकाएँ सब मिला करेंगी किराये पर …. । आठ आना एक दिन के लिये एक किताब का किराया देना होगा । मेरी खुशी का ठिकाना न रहा । मेरे सहपाठी दोस्त हमेशा नयी नयी किताबों और उसमें छपे कैरेक्टर्स के नाम बताया करते थे .. नंदन चंपक , लोटपोट , चाचा चौधरी कॉमिक्स और न जाने क्या क्या … । सोच रहा था खूब मजा़ आयेगा अलग अलग तरह की किताबें पढ़कर ।
मैने यह बात जब अम्मा से बताई तो वें तुरंत तैयार हो गईं । इह तरह बाल पत्रिकाओं को पढ़ने का सिलसिला शुरू हो गया । स्कूल की किताबें पढ़ने के बाद रोज़ बाल पत्रिकाओं में छपी कहानियाँ और बालगीत जोर जोर से खुद भी पढ़ता और अम्मा को भी सुनाता था । पत्रिकाएँ पढ़ने पढा़नें का दौर अनवरत जारी रहा । पुस्तकों की दुनिया में ऐसा रमा कि कक्षा सातवें तक पहुँचते पहुँचते अपने विद्यालय के लाइब्रेरियन सर श्रीमान एस के राज के मार्गदर्शन और तत्कालीन समाजसेवी और बी एस पी चिकित्सालय के डाॅ. गणवीर जी के संरक्षण में अपने कुछ मित्रों के साथ हमनें इंदिरा बाल पुस्तकालय खोल लिया । हम लोगों ने अपने अपने घरों से और समाज के अन्य लोगों से भी दान में पुस्तकें लेकर अपना यह पुस्तकालय प्रारंभ किया था । गरीब और ज़रूरतमंद लोग जो किराये पर पुस्तकें लेकर नहीं पढ़ सकते थे उन्हें हमारा पुस्तकालय बिना किसी शुल्क के ही पढ़ने के लिए किताबें मुहैया कराता था ।
मुझे अच्छी तरह याद है जब दल्लीराजहरा के महाराष्ट्र मंडल भवन में संचालित अपने पुस्तकालय में हमने बच्चों की पुस्तकों और पत्रिकाओं की प्रदर्शनी लगाई थी तब मुख्य अतिथि के रूप में पधारे राजहरा माईन्स के तत्कालीन जी एम और साहित्यकार श्री वी . के. मुखर्जी ने कहा था – जो काम हम अभिभावक , विद्यालय और कभी कभी शिक्षकगण भी नहीं कर पाते उससे भी बड़ा काम ये किताबें कर जाती हैं । बढ़ते हुए औद्योगिकीकरण के दौर में जब अभिभावक अपने बच्चों को उतना समय नहीं दे पाते जितना कि उन्हें चाहिए ऐसे में ये बाल पत्रिकाएँ ही हैं जो हमारे बच्चों में अच्छे विचार और संस्कार भरकर उन्हें संस्काऱवान बनातीं हैं ।
उनकी यह बात आज भी मेरे मस्तिष्क में गूंजते रहती है । आज से तीन चार दशक पहले कही गई यह बात उस समय के लिए जब प्रासंगिक थी तो आज के इस आपाधापी और अत्यन्त व्यस्त दिनचर्या का जीवन जीते समाज में कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है । हम अपने पास रहने वाली समय की कमी को बच्चों के लिए कुछ संसाधन जुटाकर पूरा करते हैं और अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं लेकिन उन संसाधनों का कितना फायदा या नुकसान हो रहा है उसे समझने की जहमत भी नहीं उठाने।
बच्चों के हाथों में किताबों की जगह इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स जैसे मोबाइल , लैपटॉप आदि आ जाने से जहाँ एक तरफ किताबों के प्रकाशन व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव तो पड़ ही रहा है वहीं दूसरी तरफ अनसेंसर्ड मैटर और चित्र आदि के पढ़ने देखने से बच्चों की मानसिकता में गंभीर विकार भी उत्पन्न हो रहा है। पुस्तकों के लगातार पढ़ने से आँखों पर उतना नुकसान नहीं पहुँचता जितना कि मोबाइल या लैपी के स्क्रीन पर पढ़ते और देखते हुये पड़ता है । बावजू़द इसके मोबाइल और लैपी बच्चों के पहुँच के अत्यधिक क़रीब आ गया है बनिस्बत पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं के । नतीजन पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशन पर इसका गंभीर असर पड़ रहा है और एक के बाद एक कई पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद भी होते जा रहा है।
आज जबकि कोरोनाकाल और लाॅकडाउन की त्रासदी ने देश के अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया है ऐसे में छोटे छोटे और मझोले प्रकाशन समूह यदि प्रकाशन बंद कर देते हैं तो बात थोड़ी समझ भी आती है लेकिन एक विकसित और पूर्ण रूप से सक्षम प्रकाशन घराना अपनी सामाजिक जिम्मेदारी और प्रकाशन से जुडे़ लोगों के भरण पोषण की जिम्मेदारी को नज़रअंदाज़ कर सिर्फ और सिर्फ अपने व्यवसायिक हितों को ही सुरक्षित रखने के खातिर देश की ही नहीं वरण विश्व की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका ” कादंबनी ” और ” नंदन ” का प्रकाशन बंद कर देता हैं तो यह बात किसी भी कीमत पर गले उतरने वाली नहीं है ।
यह हम सभी के लिये संतोष और निश्चित रूप से गर्व महसूस करने वाली बात है कि करोना त्रासदी के इस दौर में भी एक मझोले कद का अख़बार समूह होने के बाद भी हमारा लोकसदन प्रकाशन परिस्थितियों से हार माने बिना आज भी अनवरत प्रकाशित हो रहा है और नित्य नये नये कलेवर में और अधिक से अधिक रचनाकारों को स्थान देकर अपने सामाजिक सरोकार और दायित्व का पूर्णता से पालन कर रहा है क्योंकि लोकसदन अख़बार समूह से जुडे़ हम सभी सहयोगी साथी यह पक्के तौर पर जानते और मानते हैं कि दुनिया चाहे जितनी भी ज्यादा डिजिटिलाईस और ऐडवांस हो जाये लेकिन प्रिंट मीडिया और प्रिन्टेड पत्र पत्रिकाओं का कोई विकल्प नहीं ……. ।






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