मैं जब अपने पुत्र को स्नान करवाती हूँ
मैंने जब भी अपने पुत्र को स्नान करवया,
छोटे भगवान के रूप में पाया,
प्रसन्ता से मन भाव विभोर हो उठा,
कितनी निडरता से मेरा लाल
इस ताम्र पात्र में है बैठा,
कोमल है मुख मंडल इसके,
देखने में लग रहा है अनूठा,
कितने भाव भरे हैं इसके ठाठ,
नजरें देख रहीं हैं जैसे कोई सुंदर सी बाट,
मुझे ऐसी अनुभूति हो रही है,
जैसे मैंने शिव जी को दुग्ध का स्नान करवया था,
मन ही मन में शिव जी को अपने पुत्र के रूप में घर मे बुलाया था,
कहा था प्रभु मेरी झोली भर दो,
कोई हो आप जैसा तेजस्वी ऐसा वर दो,
शायद शिव का अवतार है ये,
कहा तो गणेश से भी था चुपके से,
गणपति बप्पा मुझपे इतनी कृपा करना,
आपके जैसा ज्ञानी और मात – पिता का प्रिये,
कोई नन्हे कदमो से आये मेरे अंगना,
मैं प्रसन्ता में इतनी मग्न हो जाती हुँ कि अपने पुत्र को स्नान की मुद्रा में,
नटखट किशन सा भी पाती हूँ,
हां तीनो समाहित हैं इसमें,
शिव की तरह शांत है,
गणेश की तरह उदर फुलाये,
कन्हैया सी मुस्कान है इसकी,
नटखट नयन जब चहुँ दिशा में घुमाए,
मैं सब कुछ भूल जाती हूँ,
जब अपने भगवान रूपी पुत्र को इस तरह स्नान करवाती हूँ,।

चंद्रप्रभा, गिरिडीह
झारखंड






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