सत्य धर्म.

सत्य बोलना, सत्य जानना,
सत्य समझ कर कर्म करें। धर्म यही है सबसे भारी
पर दुनिया भ्रमित नित्य करें।
झूठ, सत्य का जामा पहने,
ठगता रहता दिन रात अरे।
गुरु, ग्रंथ अरु स्वामी विवेक से
परख सत्य तू पक्ष करें।। आज की चर्चा का विषय है’सत्य धर्म’। सर्वप्रथम प्रश्न यह उठता है की धर्म क्या है? धर्म एक ऐसा विषय है जिसको एक राहगीर से लेकर एक विद्वान मनीषी तक सभी ने अपने अपने स्तर से चिंतन का विषय बनाया है। विश्व के चिंतकों ने धर्म की परिभाषाएं भी विभिन्न ढंग से प्रतिपादित की है-“वत्थु सहाओ धम्मो”अर्थात वस्तु का स्वभाव धर्म है। और आत्मा का स्वभाव है, शुद्ध चैतन्य का प्रकाश करना। अर्थात स्वभाव रूप धर्म से परिणत आत्मा स्वयं धर्म है। राग द्वेष व योगों की चंचलता से रहित आत्मा के परिणाम धर्म है।

सच्चं खुभयवं’सत्य ईश्वर है सत्य आत्मा का स्वभाव है, जानना, मानना और अनुभव करना सत्य धर्म है। धर्म की वृद्धि के लिए पर हितकारी, इष्ट व परिमित बचन बोलना सत्य है। जैसा देखा वैसा कहना सत्य नहीं है। जिससे किसी के प्राण बचते हो, वैसे अन्यथा कहना भी सत्य कहा गया है।
आचार्य श्री उमा स्वामी ने सांसारिक जनों को सत्य का स्वरूप समझाने के लिए बहुत मनोवैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया है। क्योंकि आम आदमी सत्य के विपरीत असत्य से घनिष्ठ रूप से परिचित है। इसलिए उन्होंने ‘तत्वार्थ सूत्र’में असत्य का लक्षण निरूपित किया है-‘असदभिधानमनृतम्’अर्थात पूज्य पाद स्वामी ने सर्वार्थसिद्धि में सत्य का लक्षण इस प्रकार दिया है-‘सत्सु प्रशस्तेषु जनेषु साधु वचनं सत्यमित्युच्यते।’अर्थात अच्छे पुरुषों के साथ साधु वचन बोलना सत्य है।
जैन दर्शन में ही नहीं बरन सभी वैदिक -अवैदिक दर्शनों में सत्य के महत्व को बताया गया है-महाराजा मनु ने’मनु स्मृति’में सत्य को इस प्रकार निरूपित किया है-
सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयात न ब्रूयात सत्यम प्रियम,
प्रियं च नानृतं बूयादेषः धर्मः सनातनः।।
अर्थात सत्य बोलो, प्रिय बोले, सत्य भी अप्रिय न बोलें और प्रिय भी असत्य ना बोले यही सनातन धर्म है।
सत्य का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। सत्य चित्त के अन्वेषण और अनुभूति का विषय है। हम सत्य का अनुभव कर सकते हैं, उसका साक्षात्कार कर सकते हैं।
गांधी जी से एक विदेशी महिला ने पूछा-सत्य को कहां पा सकते हैं?
गांधी जी ने जवाब दिया-
सत्य को स्वयं के हृदय में ही पा सकते हैं, अन्यत्र कहीं नहीं पा सकते।
वस्तुतः व्रत, तप, दान आदि भी तभी सार्थक होते हैं जब उनमें सत्यता हो। सत्य विहीन आचरण आडंबर माना जाता है। इसलिए कहते हैं कि-सत्य ही सबसे बड़ा तप है। अमृत दोहावली में कहा भी गया है कि-सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे सांच है, ताके हिरदे आप।।
अंत में मैं यही कहना चाहूंगी कि सत्य जैन अनुशासन का महत्वपूर्ण तत्व है। सत्य का आराधक देश, काल और परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता। यदि मन में निष्ठा हो तो संसार का कोई भी काम असंभव नहीं है। सत्य से ही जीवन और जगत का उद्धार हो सकता है।
“सत्यमेव जयते नानृतम्”
अर्थात सत्य की सदा विजय होती है यदि हम जीवन का शाश्वत जोक प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें मन , वचन,काय से सत्य आचरण को अपने जीवन में प्रतिष्ठित करना चाहिए।
जहां सत्य है वही धर्म है,
जहां असत्य महातम पाप।
असत्य-कटुक-निंदक वचनों से,
जन पाते अतिशय संताप।।
जिनका जीवन सुमन अलौकिक,
सत्य सुरभि से है भरपूर
रत्नात्रय, शिव पथ के गामी,
उनकी मंजिल नहीं है दूर।।
सत्य की उपलब्धि है परमात्मा की उपलब्धि हैं।
गांधी जी से एक विदेशी महिला ने पूछा-सत्य को कहां पा सकते हैं?
गांधी जी ने जवाब दिया-
सत्य को स्वयं के हृदय में ही पा सकते हैं, अन्यत्र कहीं नहीं पा सकते।
वस्तुतः व्रत, तप, दान आदि भी तभी सार्थक होते हैं जब उनमें सत्यता हो। सत्य विहीन आचरण आडंबर माना जाता है। इसलिए कहते हैं कि-सत्य ही सबसे बड़ा तप है। अमृत दोहावली में कहा भी गया है कि-सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे सांच है, ताके हिरदे आप।।
अंत में मैं यही कहना चाहूंगी कि सत्य जैन अनुशासन का महत्वपूर्ण तत्व है। सत्य का आराधक देश, काल और परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता। यदि मन में निष्ठा हो तो संसार का कोई भी काम असंभव नहीं है। सत्य से ही जीवन और जगत का उद्धार हो सकता है।
“सत्यमेव जयते नानृतम्”
अर्थात सत्य की सदा विजय होती है यदि हम जीवन का शाश्वत जोक प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें मन , वचन,काय से सत्य आचरण को अपने जीवन में प्रतिष्ठित करना चाहिए।
जहां सत्य है वही धर्म है,
जहां असत्य महातम पाप।
असत्य-कटुक-निंदक वचनों से,
जन पाते अतिशय संताप।।
जिनका जीवन सुमन अलौकिक,
सत्य सुरभि से है भरपूर
रत्नात्रय, शिव पथ के गामी,
उनकी मंजिल नहीं है दूर।।
“सत्यमेव जयते नानृतम्”
अर्थात सत्य की सदा विजय होती है यदि हम जीवन का शाश्वत जोक प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें मन , वचन,काय से सत्य आचरण को अपने जीवन में प्रतिष्ठित करना चाहिए।
जहां सत्य है वही धर्म है,
जहां असत्य महातम पाप।
असत्य-कटुक-निंदक वचनों से,
जन पाते अतिशय संताप।।
जिनका जीवन सुमन अलौकिक,
सत्य सुरभि से है भरपूर
रत्नात्रय, शिव पथ के गामी,

डॉ. रेखा जैन
कोरबा

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