870- 900 ईसवी सदी में विक्रमादित्य द्वारा निर्माण कराए गए पाली शिवमंदिर का सौंदर्यबोध देख थम जाते है पर्यटकों के कदम, मंदिर में एक साथ नही जाते सगे भाई- बहन ——————-

कोरबा /पाली / राजा जाज्वल्यदेव के पुत्र विक्रमादित्य द्वितीय द्वारा पाली में निर्माण कराए गए शिव मंदिर में पर्यटकों को लुभाने के लिए सभी विशेषताएं है।इस मंदिर में खास बात यह है कि यहाँ सगे भाई बहन एक साथ नही जाते क्योंकि मंदिर के दीवारों पर उकेरित मैथुनरत शिल्पकला के कारण उनके कदम यहाँ एक साथ जाने से अपने आप ही रुक जाते हैं।


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जिले के पाली मुख्यालय, नगर से होकर गुजरे मुख्यमार्ग किनारे स्थित ऐतिहासिक केंद्रबिंदु का वाण वंश के शासक विक्रमादित्य द्वारा निर्माणित 870- 900 ईसवी सदी का पूर्वमुखी शिवमंदिर अपने आप मे एक उदाहरण बना हुआ है जो पर्यटन नक्शे में शामिल है और छत्तीसगढ़ आने वाले पर्यटक इस मंदिर तक अपनी पहुँच बना रहे है।आदिकाल में विक्रमादित्य द्वितीय ने अनेक शिवमंदिरों का निर्माण कराकर उनके संरक्षण का प्रयास किये थे, पाली का शिवमंदिर भी उसी कड़ी का एक हिस्सा है जहाँ अनेक कारणों से चर्चा में रहने वाले और पुरातात्विक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण इस महादेव मंदिर में सौंदर्यबोध और उस काल की विकसित कला के दर्शन होते है तथा मैथुनकला मूर्तियों की अधिकता और उनका अंकन शाश्वत रूप से इस बात को निषेचित कर देते है कि यहाँ भाई- बहन एक साथ ना पहुँचे।ऐसी मूर्तियों के अलावा शिव- पार्वती, वराह, सरस्वती, गणेश और अन्य देवी- देवताओं की मूर्तियां मंदिर की दीवारों पर उरेकित है जो पाषाण युग पर आधारित है।लाल रंग के विशेष पत्थर से पूरे मंदिर को आकार दिया गया है एवं इनके जुड़ाव के लिए जो प्रक्रिया अपनाई गई है वह वास्तव में अपनी ओर मनमुग्ध करने वाला है।कलात्मक रूप से अद्वितीय कहे जाने वाले इस मंदिर के सामने लगभग 22 एकड़ में फैला विशालकाय नौकोनिया के नाम से जाना जाने वाला तालाब भी विशेष आकर्षण का केंद्र है।इस मंदिर में भारतीय पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षण के नाम पर दो चौकीदार और विभिन्न धाराओं में होने वाली सजाओं का उल्लेख एक बोर्ड में किया गया है जो यहाँ पहुँचने वाले पर्यटकों को यह बताता है कि मंदिर का इतिहास कितना पुराना है एवं इसके साथ होने वाली छेड़छाड़ लोगों को कहाँ से कहाँ तक पहुँचा सकती है।पर्यटक गाइड सुविधा और संसाधन अबतक यहाँ की पहुँच से बाहर है।यही वजह है कि हजार साल बीतने के बावजूद यह ऐतिहासिक मंदिर अभी तक इतिहास से आगे नए युग मे अपना कदम नही बढ़ा सका है।निश्चित रूप से इस बात की चिंता की जाती रही है कि मंदिर में उपलब्ध विशेषताओं और शिल्पगत सौंदर्यबोध के कारण जो पहचान ओरछा, खजुराहों के मंदिरों को मिली है, उसकी तुलना में यह मंदिर क्यों नही आ सका।छत्तीसगढ़ के पर्यटन संस्कृति विभाग से अपेक्षा की जा रही है कि वह टूरिज्म कॉरिडोर में पाली के साथ चैतुरगढ को शामिल कर लें तो इन्हें भी आने वाले दिनों में अच्छी प्रसिद्धि मिल सकती है।

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