24 सितंबर पुण्य तिथि पर- सहज कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

डॉ टी महादेव राव

प्रगतिशील जीवन मूल्यों के पक्षधर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना लोगों में धड़कता हुआ आत्मीय संबंध बनाने पर विवश करती कविताओं के सर्जक तो थे ही, साथ ही वे घेरों के बाहर के कवि भी थे। उनकी कविताओं में हिंदी कविता का लोकोन्मुख जातीय संस्कार घनीभूत रूप में मौजूद हैं। वस्तुतः दुख और गहन मानवीय करुणा से प्रेरित संघर्षशीलता का उदात्त सौंदर्यबोध मधुर भावनाओं के सोनधे संस्पर्श और चंदाचंद विभिन्न मुद्राओं को अपनी कविता में लिखने वाले सर्वेश्वर स्वयं में एक परिपूर्ण सहज कविता थे।

संघर्ष की अपील उनकी कविता में कितनी सुंदर बन पड़ी है। अपने पूरे आवेग के साथ बहा ले जाने की क्षमता रखती यह कविता सर्वेश्वर की शैली का अनुपम उदाहरण है।

झपटता बाज/ फन उठाए सांप/ दो पैरों पर खड़ी/ कांटो से नन्हीं पत्तियां खाती बकरी/ दबे पांव झाड़ियों में चलता चीता/ डाल पर उल्टा लटक फल कुतरता तोता/ या इन सब की जगह आदमी होता/ तब भी भूख से लड़ने/ कोई खड़ा होता है सुंदर दिखने लगता है।

क्रांति की बात कविता लाल साइकिल में जिस प्रभावोत्पादक ढंग से सर्वेश्वर कह गए, क्या इतने सधे हुए और मर्मांतक ढंग से कही जा सकती है यह बात। कविता पढ़कर बरबस मन मस्तिष्क पर यह प्रश्न टंग जाता है

रात भर एक लाल साइकिल/ कटीले बाड़े से टिकी / अकेली खड़ी रही/ पुलिस सीटियां बजाती रही/ बूटों की आवाजें आती रही/ सुबह एक बच्चा कहीं से आया/ और ओस में भीगी ठंडी घंटी बजाने लगा/ घरघराती हुई एक काली भारी गाड़ी/ सायरन बजाती आकर रुकी/ बच्चा घंटी बजाना भूल/ गाड़ी की छत पर टिमटिमाती नीली रोशनी देखने लगा/ फिर गाड़ी उसे लेकर चली गई/ पहली बार मैं अपने कमरे के फर्श पर/ खिड़कियों के छड़ों की परछाइयां पड़ती देख सहम गया।

गांव की संप्रेषणीयता के साथ-साथ अभिव्यक्ति की असीम संभावनाएं हमें टीन पर ओले कविता में दिखती है

अंक भर लो/ आग वर लो/ शेष रूप / अशेष कर लो/ विलय की लय / सज संवर लो/ व्यथा हर लो/ गिरो टूटो/ बिछो तोड़ो / फिर उबर लो।

व्यंग्य में भी सर्वेश्वर दयाल सक्सेना अपने जौहर दिखाने से नहीं चूकते

व्यंग्य मत बोलो/ काटता है जूता तो क्या हुआ/ पैरों में ना सही सिर पर रख डोलो/ व्यंग्य मत बोलो।

कवि मुक्तिबोध तथा लोहिया के निधन पर उनकी कविताएं क्रमशः इसी बात को रेखांकित करती हैं

पथरीली पुतलियों में/ लड़खड़ाता अंधेरा/ एक नए लोक का द्वार खोलता है/ और उठने की शक्ति खोने से पहले/ हर हाथ भविष्य को आगे धकेल जाता है/ तुम्हारे हाथों से जुड़े असंख्य हाथ/ वे निष्प्राण कैसे हो सकते हैं/

बर्फ में पड़ी गीली लकड़ियां/ अपना दिल दिल जलाकर वह गरमाता रहा/ और अब आग पकड़ने ही वाली थी/ खत्म हो गया उसका दौर/ ओ मेरे देशवासियों एक चिंगारी और।

कविता क्या होती है? संक्षिप्त शब्दों में विशाल संप्रेषणीयता का दूसरा नाम, जिसमें सिद्धहस्त थे सर्वेश्वर। उनकी एक कविता पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में उपर्युक्त को प्रमाणित करते पाते हैं

गोली खाकर / एक के मुंह से निकला राम/ दूसरे के मुंह से निकला माओ/ लेकिन तीसरे के मुंह से निकला आलू/ पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है कि पहले दो के पेट भरे हुए थे।

मंटू बाबू कविता में भी कविता के क्रांति के तेवर और आत्मविश्वास की दुनिया पूरे वेग से अभिव्यक्त किया उन्होंने

एक हथेली कसी है मेरी हथेली में/ मंटू बाबू जेल से छूट कर आया है/ उसकी तर्जनी झूल रही है आटे की लोई सी/ मंटू बाबू हंसता है/ उन्होंने इसे तोड़ दिया/ ताकि घोड़ा न दबा सकूं पिस्तौल का/ बीस साल का मंटू बाबू / फिर जोर से हंसता है / अचूक निशाना मगर/ आज भी है मेरा/ इस बीच की अंगुली से/ मंटू बाबू मेरी हथेली जोर से दबाता है।

15 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के बस्ती में जन्मे सर्वेश्वर जी की शिक्षा एंग्लो संस्कृत हाई स्कूल बस्ती से प्रारंभ कर प्रयाग विश्वविद्यालय तक चली। कभी अध्यापन तो कभी क्लर्की तो कभी आकाशवाणी में सहायक प्रोड्यूसरी करते रहे। दिनमान के उप संपादक थे जो बाद में पराग के संपादक बने। उनकी कविताएं तीसरा सप्तक में संकलित हैं। रूस के विशेष निमंत्रण पर 1972 में पुश्किन काव्य समारोह में भाग लेने वे रूस गए। काफी लिखा उन्होंने। कविता संग्रह काठ की घंटियां, बांस का फूल, एक और नाव, गर्म हवाएं, कुआनो नदी, कविताएं एक, कविताएं दो, जंगल का दर्द, घुटनों पर टंगे लोग । शमशेर की कविताएं तथा नेपाली कविताएं संपादित की। बकरी उनका प्रसिद्ध नाटक है। अंधेरे पर अंधेरा कहानी संग्रह है तो उड़ हुए रंग उपन्यास। सोया हुआ जल, पागलों का मसीहा उनके उपन्यास हैं। उन्होंने बालोपयोगी सामग्री भी बहुत लिखी। हर विधा में कलम चलाने वाले सर्वेश्वर जी हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट रचनाकार थे। 24 सितंबर 1983 को उनका निधन हुआ।

(यह कैरीकेचर 1984 में कोरबा निवासी श्री लीलाधर बारसकर ने बनाया मेरे विशेष अनुरोध पर। श्री बारसकर बालको में मेरे सहकर्मी रहे।)

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