डाली पर खिला गुलाब,
हवा के झोंकों से, झूम-झूम नाच रहा है,
आते-जाते सब निहार रहे हैं,
अहा! कितना सुंदर फूल है,
युवती ने सोचा, काश!
कोई इसे मेरे जूड़े में लगा देता,
युवक ने सोचा, हाय!
मैं इसे अपनी प्रिया को दे देता,
वृद्ध ने देखा, सोचा और मुस्काए,
अपने यौवन के दिन उन्हें फिर याद आए,
वृद्धा ने देखा, कुछ सोच मुस्काई, सकुचाई, शरमाई,
इधर-उधर देख, धीरे से छू सहला दिया,
उसकी छुअन से अंतर तक सिहर गई,
पर सबकी सोचों पर फिर गया पानी,
जब एक बालक ने आ करी मनमानी,
गुलाब तोड़ निहारा, फिर हर पंखुड़ी को,
एक-एक कर हवा में उड़ा दिया,
खिल-खिलाकर हँसा और अपनी राह चल दिया,
अनजाने में ही सबको सबक गया सिखा,
सौंदर्य, यौवन नहीं रहते सदा,
सौंदर्य एक पल आता है,
तो यौवन दूसरे पल चला जाता है,
एक रंग-रूप सूँघ मसल दिया जाता है,
तो दूसरा रस पी कुचल दिया जाता है,
युवक, युवती, वृद्ध, वृद्धा रह गये अवाक,
क्योंकि नन्हें बालक ने उठा दिया ज़िंदगी का हिज़ाब।







Comments are closed.