हास्यम- आत्महत्या रावण की- डॉ टी महादेव राव

आजकल लोगों की मानसिकता इस तरह बदल रही है कि हम अपने धार्मिक उपदेशों के भी विपरीतार्थ लेने पर तुल गए हैं। वर्तमान में भारतीय मान्यता यह चल पड़ी है की पापी से घृणा करो पाप से नहीं, क्योंकि जो पकड़ा गया है वह पापी है और जो पाप करते रहने के बाद भी पकड़ा न जाये वह पुण्यात्मा, नेता या फिर राजनीतिज्ञ कहलाते हैं, दूरदर्शन, समाचार पत्रों में छाए रहते हैं। तो हम आज भौतिकता को मानसिकता से अधिक महत्व देते हुये केवल पापी से घृणा करने की ठान ली है। शायद यही कारण है कि हम रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले जलाते हैं और उनकी प्रवृत्तियाँ, जो हम में किसी न किसी रूप में मौजूद हैं, को पुष्पित पल्लवित करने से नहीं चूकते।

इस बार जबकि बरसात जल्दी आई, चुनाव में खड़े नेताओं की तरह त्वरित गति से और जाने में आनाकानी कर रही है, कुर्सी प्रेमी नेता द्वारा पद छोड़े जाने के लिए की जाने वाली देरी की तरह। त्यौहार भी जल्दी जल्दी आने लगे। आखिर महंगाई जो आसमान को छूकर लौटने से इंकार कर रही है। बरसात पूरी तरह खत्म नहीं हुई कि दशहरे का त्यौहार आ गया। रामलीला मैदान में पचहत्तर फुटा रावण का पुतला ऊंचाई में भले ही “महान” लगे लेकिन बड़ा दयनीय और निरीह प्रतीत हो रहा था। हमें आखिर पापी से घृणा करने की परंपरा जो निभानी थी।

हमारे इस शहर में रामलीला के पहले प्रतिदिन किसी न किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का भाषण होता। वकील, ठेकेदार, शिक्षाविद, राजनीतिज्ञ, यूनियन के नेता और चंदाग्राही जैसे महान लोग। सभी एक ही बात का रट लगाते – हमें रावण को देखकर सीखना चाहिए कि हमेशा बुराई पर अच्छाई की जीत होती है। इसलिए हमें सब कुछ अच्छा करना चाहिए और बुराई से बचना चाहिए। यह अलग बात कि कहने का ढंग उनका अपना अपना होता। कोई अपनी दाढ़ी के तिनके का सहारा लेता। मसलन जो बुराई उसमें मौजूद है, उसे न करने की सलाह देता। शायद इसलिए कि उसके इस बुराई वाले धंधे में कोई उसका प्रतिद्वंद्वी पैदा न हो जाये। वरना उसे क्या पड़ी थी कि वह राम का पक्ष लेता जबकि बेसिकली वह रावण के पार्टी का मेम्बर जो है।

शिक्षाविद कहते – अच्छी शिक्षा ग्रहण करना चाहिए। अनुचित ढंग से कमाया गया रुपया पाप है और वह केवल रावण का चरित्र निभाने की क्षमता रखता है। वह शिक्षाविद कक्षा में कॉलेज में कुछ नहीं पढ़ाते, केवल ट्यूशन्स पढ़ाकर, कुंजियाँ लिख कर, आई एम पी प्रश्न बेचकर शानदार ढंग से रहते हैं। बंगला, गाड़ी नौकर चाकर के साथ आलीशान जीवनशैली है उनकी। कौन कहता है सरस्वती और लक्ष्मी में आपसी दुश्मनी है?

ठेकेदार, जिसके बनाए गये दो बड़े बड़े पुल, चार पाठशाला भवन और एक मंदिर उदघाटन से पहले ही ढह गए थे, कहता – कर्म ही पूजा है। रामचन्द्र जी को देखिये । उनका व्यक्तित्व, उनका सारा कुछ सामान्य मानव सा साधारण लेकिन कितना दृढ़। रावण की तरह खोखला दंभ, पाप कर्म और अनीति व्यक्तित्व का नाश करती है, ह्रास करती है, विकास नहीं।

राजनीतिज्ञ जो आज अपनी राजनीतिक जीवन के दसवें वर्ष में और पच्चीसवीं पार्टी की सदस्यता लिए होते है, कहते हैं – हमेशा बुराई के खिलाफ अच्छाई, पाप के खिलाफ पुण्य और राम के खिलाफ रावण की जीत होती आई है। यह अटल सत्य है। हम राम की तरह अपने चरित्र में, वचन पालन करने में विश्वास रखते हैं और आपको बता दें कि विपक्षी रावण का सत्यानाश करने की क्षमता रखते हैं। कुछ दायें बाएँ के लोग तालिया ठोंकते। छोटी छोटी लालचों में पार्टियां बदलने वाले इस राजनीतिज्ञ के बारे में विख्यात है कि वह अपने पड़ोसी की बीवी को भगाकर दूसरे प्रांत से इधर आ गया है और अपनी उम्र के पचासवें में भी तांक झांक की आदत रखे हुये है। कोई भी सज्जन और सच्चरित्र व्यक्ति इनके साथ इनके घर जाना, अपने यहाँ इन्हें बुलाना चरित्रहीनता का प्रतीक मानते हैं। काम कराने की दक्षिणा तो लेते ही हैं, साथ ही काम करवाने का झूठा वादा करने मे भी सच्ची दक्षिणा ऐंठकर आज शहर के गणमान्यों में शामिल हैं।

वकील साहब जो हमेशा झूठ के सहारे सच को पानी पीने पर विवश करते हैं, सत्य का शत्रु और असत्य का अनन्य भक्त। कई महान क्लबों का माननीय सदस्य। वे कहते – रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाये पर वचन न जाई। वचन ही क्यों – सत्य न जाई। वचन को सत्य बताकर मैं यह साबित करना चाहता हूँ कि सत्य, पुण्य, राम और सच्चरित्रता की सदैव विजय होती है, होती रहेगी। असत्य, पाप, रावण, दुश्चरित्रता सदा अपना मुंह काला किए रहता है। असामाजिकता से दूर रहें। सदा मर्यादा पुरुषोत्तम की मर्यादाओं को जीवन में उतारें।

चंद चंदाग्राही, जो कभी मंदिर के नाम से, शिलान्यास के नाम पर, मस्जिद के नाम पर, गुरुद्वारे के नाम पर तो कभी गिरिजाघर के नाम पर तो कभी किसी बड़े नेता के आगमन का झांसा देकर चन्दा वसूलते हैं, सुर, सुरा, सुंदरी के समागम के सुरुचि-संपन्न प्रवृत्ति को पालते हैं, अपने भाषण में कहते – पाप विवेक का नाश करती है, बुरी नीयत अच्छाई को ढँकती है और वासना एवं बुरी प्रवृत्तियाँ मानवता का सत्यानाश करती हैं, सो हमें केवल प्रभु भजन में अपना चित्त एकाग्र करना चाहिए। व्यसनों, व्यभिचार से दूर रहकर चरित्र को निष्कलंक बनाना चाहिए।

इस तरह के तथाकथित गणमान्य व्यक्तियों के शहर में भी रावण का लंबा चौड़ा ऊंचा पुतला जलाया जाता है। पांच लाख रुपयों का बिल पेश करते हैं रावण के पुतले के निर्माण का और रावण बना होता है पचासेक हज़ार का। वकील साहब का ठेका रहता है हर साल रामलीला करवाने का। उसमें भी यही गणित अपनाया जाता है। राजनीतिज्ञ और शिक्षाविद भी किसी न किसी तरह इस बहती गंगा में हाथ धोने से बाज नहीं आते। आज वकील, शिक्षाविद, राजनीतिज्ञ, ठेकेदार, चंदाग्राही के कद और काठी खाते पीते परिवार के लोगों से भी काफी बेहतर और रावण की तरह हो चला है। हो भी क्यों न? रावण अहम और पराई स्त्री पर बुरी नज़र डालकर ही तगड़ा हो गया। यहाँ तो उन रावणी गुणों को भी पीछे छोडकर काफी आगे बढ़ चुके लोग हैं।

घड़ा जब हद से ज्यादा भर जाता है तो फूट जाता है। शायद यही कारण था रावण सारे कृत्यों से बहुत अधिक अभिभूत हो उठा और अधिक न सह पाने की स्थिति में मूसलाधार बारिश और तूफान को आमंत्रित किया। उस बारिश में अपने पचहत्तर फुटा पुतले रूपी शरीर को पूरे मैदान में फैलागर ज़मींदोज़ हो गए। जमीन पर पसर गए।

पानी में आत्महत्या करने का रावण का यह स्टाइल अनोखा था। निरीह और दयनीय लगनेवाला रावण पूरे मैदान में गिरकर लोगों को बता दिया कि इन सारे कृत्यों का वह भी विरोध करता है।

पानी थमा। पूरी तरह अंजर पंजर में बिखरे रावण के पुतले के पास लोग जमा होने लगे। रावणीय पुतले का चेहरा विकटाट्टहास करता लेकिन दूसरों की बेवकूफी का मज़ाक उड़ाता सा लगा। चटाइयाँ, रंगीन कागज और चंद पटाखों के अलावा उस पचहत्तर फूट लंबे रावणीय पुतले में कुछ न था और रावण अपना पुतला बनवाने वालों की पोल खोले मैदान में पड़ा था, लोगों को इस विषय में सोचने के लिए विवश करता हुआ।


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