दिल को
रास नहीं थीं
ज़हन की
कारगुजारियां
सो रास्ते
मुख्तलिफ हुए
दिल को फिर भी
ये यकीं था
के दरकते
लफ्जों को
कायनात अनसुना
नहीं रहने देगी
यकीं है के अब भी
गूंजती होगी
हादसे की
हर इक आवाज़
हादसे के शिकार
टूटे लफ्ज
यकीनन
सुने जाते होंगे
पत्थर ही सही, दिल का
कहीं कोई कोना
वहां भी पिघलता होगा
लावा बन बहता होगा
लावा अब नहीं
पथराएगा फिर से
क्योंकि
उसकी नियति है
यूं ही बहते रहना
टूट टूट कर।

- ज्योतिर्मय






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