हमारी बा ?????


कस्तूर जिन्हे हम बा के नाम से जानते हैं आज उनकी 77 वीं पुण्यतिथि है।उम्र में बा बापू से कुछ महीने बढ़ी थी।उनके बारे मे ऊपर से तो लगता है की वो बहुत साधारण महिला थीं परन्तु वास्तव में वो अपनी सोच रखने वाली थी तथा देश की आज़ादी में सक्रिय रही।मोहन दास करमचंद गांधी को बापू बनाने में बा का अतुलनीय योगदान रहा।इसीलिए बा-बापू की 150 वीं जयंती साथ साथ साथ साथ मनाई गयी।आपका जन्म ग्यारह अप्रैल 1969 को पोरबंदर में हुआ था।आपके पिताजी का नाम गोकुलदास मकनजी और माता का नाम बृजकुंवर था। उस ज़माने में लड़कियों की शिक्षा पर ज़्यादा ज़ोर नहीं था।बा भी इसका अपवाद नहीं थी परंतु संस्कारी वैष्णवी परिवार का होने के कारण उन्हें उत्तम गुण विरासत में मिले थे।संकल्प और संयम उनके साथ जीवन भर रहे।इनके पिता जी साधारण व्यापारी थे।इनके गांधी परिवार से अच्छे संबंध थे।इनकी सगाई सात वर्ष की उम्र में ही कर दी गई तथा तेरह वर्ष की उम्र में विवाह हो गया।इस बारे में गांधीजी लिखते हैं “दो अबोध बालक बिना जाने,बिना समझे,संसार-सागर मे कूद पड़े।कुछ ऐसा ख्याल होता है कि हम दोनो एक दूसरे से डरते थे;एक दूसरे से शरमाते तो थे ही।बातें किस तरह करना,क्या करना,सो मै क्या जानू?धीरे धीरे एक दूसरेको पहचानने लगे,बोलने लगे।'”अब यह उम्र कुछ समझने की तो थी नहीं,दूसरे गांधीजी चाहते थे कि उनकी पत्नी एक आदर्श स्त्री बने।दूसरीओर कस्तूरबा सीधी,मेहनती,निरक्षर ,मितभाषी परन्तु स्वतंत्र और स्वाभिमानी थी।यह जानकर बहुत आश्चर्य होता है कि गांधी जी बहुत ईर्ष्यालु थे।वह उनके ऊपर कड़ी नज़र रखते थे तथा चाहते थे कि बिना उनसे पूछें कस्तूरबा कही न जाए परंतु वो बिना उनको बताए ज़रूर जाती थी।गांधी जी ने लिखा है कि इस कारण से उनके बीच टकराव होता था।
धीरे धीरे जैसे समय आगे बढ़ता गया दोनों एक दूसरे को समझने लगे।बापू यह ज़रूर चाहते थे कि बा पढ़ाई में तथा नई चीजें सीखने में अपना मन लगाएं।बाद में दक्षिण अफ़्रीका जाने पर धीरे धीरे बा को लगने लगा कि उनके पति किसी बहुत बड़े काम के लिए बने हैं।फिर भी वह कोई काम दबाव में नहीं करती थी और बापू भी चाहते थे कि की वो संतुष्ट होकर अपनी इच्छा से कार्य करें।कभी कभी ज्यादती भी करते थे।इसके लिए वह हर तरह से समझाने का प्रयास करते थे।कभी तो कई कई दिनों तक।बा-बापू में अद्भुत सामंजस्य था।अपना अपना अलग विराट व्यक्तित्व दोनों का,पर मिल कर यह अटूट बंधन भारतीय जनमानस की आवाज बन गया।
आंदोलनकारी बा


दक्षिण अफ्रीका में पहले तो उनको अजीब लगा पर बाद में उन्होंने गांधीजी का पूरा साथ दिया।भारतियों की दशा के विरोध में आन्दोलन में शामिल होने पर उन्हें गिरफ्तार कर तीन महीनों की कड़ी सजा के साथ जेल भेज दिया गया।जेल में मिला भोजन उनसे खाया न जाता था।अत: उन्होंने फलाहार करने का निश्चय किया।अधिकारियों द्वारा उनके अनुरोध पर ध्यान नहीं दिए जाने पर उन्हे उपवास करना पड़ा जिसके पश्चात अधिकारियों को झुकना पड़ा।

सन 1915 में कस्तूरबा ने महात्मा गाँधी के साथ भारत लौटने के बाद हर जगह उनका साथ दिया।कई बार जब गांधीजी जेल गए तब उन्होंने उनका स्थान लिया। गांधी जी के आंदोलन में महिलाओं को जोड़ने में बा की मुख्य भूमिका रही।चंपारण सत्याग्रह के दौरान वो भी गाँधी जी के साथ रहीं और लोगों को स्वच्छता,स्वदेशी,शिक्षा आदि के महत्व के बारे में बताया।इसी दौरान वो गाँव-गाँव घूम कर अलख जागती रहीं।खेड़ा सत्याग्रह के दौरान भी बा घूम-घूम कर स्त्रियों का उत्साहवर्धन करती रही।
सन 1922 में गाँधी के गिरफ्तारी के पश्चात उन्होंने आगे आ कर मोर्चा संभाला और इस गिरफ्तारी के विरोध में विदेशी कपड़ों के परित्याग का आह्वान किया।उन्होंने गांधीजी का संदेश प्रसारित करने के लिए गुजरात के गाँवों का दौरा भी किया।1930 में दांडी और धरासणा के बाद जब बापू जेल चले गए तब बा ने उनका स्थान लिया और लोगों का मनोबल बढाती रहीं।क्रन्तिकारी गतिविधियों के कारण 1932 और 1933 में उनका अधिकांश समय जेल में ही बीता।सन 1939 में उन्होंने राजकोट रियासत के राजा के विरोध में भी सत्याग्रह में भाग लिया।
भारत छोड़ो आंदोलन


‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के दौरान अंग्रेजी सरकार द्वारा बापू समेत कांग्रेस के सभी शीर्ष नेताओं को 9 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर लिया गया।बा भी साथ जा सकती थीं, परंतु बापू जी ने समझाया “तू न रह सके तो भले चल ;लेकिन मैं चाहता हूं कि तू मेरे साथ आने के बदले मेरा काम कर.” उस समय का मंत्र था “करेंगे या मरेंगे” पर सत्य और अहिंसा का मार्ग नहीं छोड़ेंगे।बा ने मुंबई के शिवाजी पार्क में जहाँ गांधी जी का भाषण होना था वहीं भाषण करने का निश्चय किया पर उसी शाम उन्हें डॉ सुशीला नैयर और प्यारेलाल जी के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।बा का स्वास्थ ठीक न था।अबकी बापू के स्वास्थ्य को लेकर भी वो काफी चिंचित थीं।आर्थर रोड जेल जाते समय उन्होंने कहा” इस बार ये जिन्दा नहीं निकलने देंगे। बहन,यह सरकार तो पापी है.”
जेल में रात में उनको दस्त लग गए और बुखार हो गया. कमजोरी के कारण उनकी अवस्था खराब हो रही थी।जेल में बीमारी के कारण खास खुराक मागने पर कहा गया कि खरीद सकती हैं।अब इन लोगों के पास पैसे तो रहते नही थे तो सुशीलाजी ने कहा कि हमारे मित्रों को फोन कर दीजिए ताकि वे रुपये भेज सकें।जेल के अधिकारियों ने कहा” फोन नहीं हो सकता है।क्योंकि सरकार का हुक्म है कि बाहर की दुनिया के साथ आप लोगों का कोई संपर्क नहीं रहना चाहिए।” दवा का भी कोई प्रबंध नही हुआ।बड़ी मुश्किल से शाम तक दो सेब आए पर रस निकालने का कोई साधन नहीं था।कमजोरी बढ़ती जा रही जा रही थी।जिस कमरे में बा थीं वहां की तीन चौथाई खिड़कियों को ईंटों से चुन दिया गया था,पाखाने की नाली टूटी हुई थी,अतः कमरे की हवा भी बहुत खराब थी।इतना सब होने के बाद भी बा व्यक्तिगत दुख व चिंता के बारे मे न सोचती थीं। इसी बीच एक और बहन उनके कमरे में लाई गईं।बा ने बहुत प्रेम से उनका हाल लिया।वह अपने तीन – चार छोटे छोटे बच्चों को छोडकर जेल आ गई थीं।बा चाहे आश्रम में रहीं हों या आंदोलन में या जेल में वो वात्सल्य की प्रतिमूर्ति रहीं।वो वास्तव में पूरे राष्ट्र की चिंता करती थीं।वे पूछती थीं “क्या बापूजी हिन्दुस्तान का दुख दूर करने मे सफल हो सकेंगे?” सुशीला बहन उनको आश्वस्त करती हैं “बा, ईश्वर बापूजी की मदद पर है न? सब ठीक ही होगा.”
अंतिम यात्रा की तैयारी


आगा खान महल में लाना मानो उनकी अंतिम यात्रा की तैयारी का एक पड़ाव था।साथ ही शायद महादेव भाई जिन्हें वह पुत्रवत मानती थीं उनको भी बिदाई देना मानो नियति ने तय कर रखा था।11अगस्त को बा आईं और 15 अगस्त 1942 को महादेव भाई का बलिदान पूरा हुआ।
वैसे तो बापू सदैव ही बा को कुछ न कुछ नया सिखाते थे पर अब महादेव देसाई के प्रस्थान के बाद ग़मगीन माहौल को समान्य बनाने की दृष्टि से बापू ने कहा कि सब लोग अपने एक एक मिनट का हिसाब रखें।बा को वो गुजराती सिखाने लगे, गीताजी सिखाते थे और भूगोल भी।बा 74 वर्ष की अवस्था में भी यह सब मन से सीखने की कोशिश करती थीं और अफसोस करती थीं कि पहले क्यों नहीं इतने ध्यान से सीखा।
अधिकतर नेताओं के जेल में जाने के बाद देश की दुर्दशा एवं सरकार के जुल्म बढ़ते जा रहे थे।बापू वाइसराय को पत्र लिख रहे थे।बा ने उनसे उपवास की बात न लिखने का आग्रह किया। बापू को बहुत आश्चर्य हुआ।वो बा की तरफ देखने लगे।बा ने कहा कि शायद “वाइसराय की सद्बुद्धि जाग्रत हो जाय।कम से कम उन्हें यह कहने का मौका तो हरगिज न मिलना चाहिए कि गांधी ने उपवास की धमकी दी थी,इसलिए मैंने उसकी बात नहीं सुनी” बापू ने बा की सलाह मानते हुए पत्र मे उपवास की बात नहीं लिखी।पत्राचार चलता रहा,परंतु सत्ता के मद में चूर कोई सरकार आने वाले समय की आहट सुन पाई है भला कभी?ज्यों ज्यों उपवास निकट आने लगा श्रीमती सरोजनी नायडू,मीरा बहन,प्यारेलाल जी,डॉ सुशीला नैयर सभी चिंतित हो उठे सिवाय बा को छोड़कर।बापू को बा की हिम्मत पर विश्वास था।शाम को उन्होंने बा से इस संबंध में बात की।बा ने अगले दिन कहा “जहाँ इतनी ज्यादा झूठाइ चल रही हो,वहां बापू चुप कैसे बैठ सकते हैं?सरकार के अत्याचारों के प्रति अपना विरोध जताने के लिए बापू के पास उपवास को छोड़कर दूसरा साधन क्या है?”सब लोगों को बा के इस रूप की उम्मीद नहीं थी।आश्चर्य की बात है कि बापू के उपवास के दिनों में बा की अपनी तबियत भी नहीं बिगड़ी।मानसिक शक्ति के साथ ही आश्चर्यजनक रूप से उनकी शारीरिक शक्ति भी बढ़ गई।बापू ने 10 फरवरी 1943 को उपवास प्रारंभ किया।बा भी बापू के उपवास के समय अन्न ग्रहण नहीं करती थीं और एक बार फलाहार करती थीं।दिन में दो तीन बार गरम पानी में शहद ले लेती थीं।बापू की हालत बिगड़ती जा रही थी पर वह कुछ लेने को तैयार नहीं हुए।बा ने उनसे केवल एक बार कहा,फिर न कहती थीं क्योंकि वो जानती थीं कि बापू करेंगे अपने मन की पुकार की ही तो व्यर्थ मे उनकी ऊर्जा क्यों खर्च की जाय।22 फरवरी1943 को बापू जीवन मरण के बीच झूल रहे थे और बा तुलसी माता के सामने करुणा और दीन भाव से अपने ध्यान में लीन थीं।उधर बापू की बिगड़ती हालत देख कर डॉ सुशीला नैयर के अनुरोध पर वह मुसम्बी का रस लेने को तैयार हो गए जिससे उनके शरीर में पुनः जीवन संचार होता दिखा।इतने में बा आ पहुंची।ईश्वर ने उनकी प्रार्थना सुन ली।लेकिन लगता है कि उन्होंने अपने जीवन के बदले बापू के लिए जीवन माँगा था इस शर्त पर कि एक साल बाद वह अपनी यात्रा पर चल देंगी। 22 फरवरी 1944 को बा ने अपने प्राण त्यागे. बापू ने 3 मार्च को अपना उपवास तोड़ा।न जाने कौन सी शक्ति थी कि बा इतने दिनों तक ठीक रहीं पर बापू के उपवास के बाद उनकी तबीयत खराब होने लगी।वे कहने लगी थीं कि वह यहां से जीवित न जा पायेंगी।उनकी इच्छा थी कि बापू अंतिम समय उनके पास रहें।उन्होंने बापू की गोद में ही अपने प्राण त्यागे।

स्वतंत्रता संग्राम की इस महान नेत्री को अंतिम श्रद्धांजलि देते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था
“श्रीमती कस्तूरबा गांधी नहीं रहीं । ७४ वर्ष की आयु में पूना में अंग्रेजों के कारागार में उनकी मृत्यु हुई।कस्तूरबा की की मृत्यु पर देश के अड़तीस करोड़ अस्सी लाख और विदेशों में रहने वाले मेरे देशवासियों के गहरे शोक में मैं उनके साथ शामिल हूं। उनकी मृत्यु दुखद परिस्थितियों में हुई लेकिन एक गुलाम देश के वासी के लिए कोई भी मौत इतनी सम्मानजनक और इतनी गौरवशाली नहीं हो सकती।हिन्दुस्तान को एक निजी क्षति हुई
है।डेढ़ साल पहले जब महात्मा गांधी पूना में बंदी बनाए गए तो उसके बाद से उनके साथ की वह दूसरी कैदी हैं,जिनकी मृत्यु उनकी आंखों के सामने हुई।पहले कैदी महादेव देसाई थे,जो उनके आजीवन सहकर्मी और निजी सचिव थे।यह दूसरी व्यक्तिगत क्षति है जो महात्मा गांधी ने अपने इस कारावास के दौरान झेला है।”
इस महान महिला को जो हिन्दुस्तानियों के लिए मां की तरह थी,मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और इस शोक की घड़ी में मैं गांधीजी के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं।मेरा यह सौभाग्य था कि मैं अनेक बार श्रीमती कस्तूरबा के संपर्क में आया और इन कुछ शब्दों से मैं उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहूंगा।वे भारतीय स्त्रीत्व का आदर्श थीं ,शक्तिशाली,धैर्यवान,शांत और आत्मनिर्भर। कस्तूरबा हिन्दुस्तान की उन लाखों बेटियों के लिए एक प्रेरणास्रोत थीं जिनके साथ वे रहती थीं और जिनसे वे अपनी मातृभूमि के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मिली थीं ।”
ऐसी महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी वात्सल्य मूर्ति पूजनीय बा को शत शत नमन
राकेश श्रीवास्तव

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