स्मृति शेष- कठिन होता है नरेंद्र कोहली जैसा होना



और पद्मश्री नरेंद्र कोहली जी चुपचाप चले गए.लगभग छह दशक की उनकी साहित्यिक यात्रा के साथ एक युग का भी अंत हो गया.उन्होंने जिस युग की नींव रखी वो राष्ट्रवादी सांस्कृतिक साहित्य की थी.सचमुच नरेंद्र कोहली होना या उनके जैसा होना बहुत कठिन काम है .वे चले तो गए लेकिन अपने पीछे इतना कुछ छोड़ गए हैं की आने वाले ६० साल तक उन्हें पढ़ा जाये तो भी शायद वो व्माप्त न हो .
हम गांव वालों के लिए दिल्ली और दिल्ली वाले हमेशा से दूर रहे हैं.इसीलिए मेरी नरेंद्र कोहली जी से सीधी मुलाक़ात कोई चार साल पहले यानि बहुत देर से हुई .हालांकि साहित्य के माध्यम से हमारा उनका परिचय कोई पांच दशक पुराना था. दिल्ली वाले कोहली जी मुझे मिले भी तो असम की राजधानी गुवाहाटी में. वहां नेशनल बुक ट्रष्ट के सहयोग से असम सरकार ने एक विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया था.हम दोनों इस सम्मेलन के अलग-अलग स्तरों में अतिथि वक्ता के रूप में शामिल हुए थे .कोहली जी को उसी दिन भारत सरकार की ओर से पद्मश्री अलंकरण देने की घोषणा की गयी थी .
कोहली जी से बात करने में मुझे शुरू से संकोच था.एक तो वे बड़े साहित्यकार ठहरे और ऊपर से कुछ-कुछ अज्ञेय जी की तरह आत्मकेंद्रित से थे वे. लेकिन दो दिवसीय सत्संग में उनसे खूब बातें हुईं तो लगा की मै गलत सोच रहा था उनके बारे में .वे एक महान साहित्यकार थे लेकिन उनके भीतर हिन्दुस्तान का एक आम आदमी भी पूरी करुणा के साथ उपस्थित था .मैंने उन्हें बधाई दी और कहा-‘आपको नहीं लगता की पद्मश्री देने में सरकार ने कुछ देर नहीं कर दी .?’
कोहली जी मुस्कराये ,फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोले -‘ दे दी ये क्या कम बड़ी बात है ,इससे पहले की सरकारों ने तो शायद मेरे नाम पर विचार ही नहीं किया !’ कोहली जी जाहिर है की पहले की सरकारों से नाराज थे.पहले की सरकारें यानि कांग्रेस की सरकारें .वे मौजूदा सरकार के प्रति कृतज्ञ नजर आये ,प्रधानमंत्री के प्रति उनके मन में एक स्थान था लेकिन वे भक्तों की श्रेणी में शामिल नहीं हुए थे. ये बात कोई चार साल पहले की है .मेरा भी मानना है की कोहली जी को पद्मश्री देर से मिली क्योंकि उनसे पहले अनेक कनिष्ठ और कम महत्व के लोग ये सम्मान पा चुके थे .
कोहली जी ने सियालकोट,लाहौर वाया जमशेदपुर दिल्ली का सफर तय किया था. ८१ साल की अपनी जीवन यात्रा में उन्होंने साहित्य की लगभग हर विधा पर काम किया.उपन्यास,नाटक,व्यंग्य,आलोचना ,यात्रा वृत्तांत ,कहानी,निबंध,संस्मरण सब लिखा लेकिन पौराणिक पत्रों को लेकर किया गया उनका काम अप्रतिम रहा .उर्दू से हिंदी में आये कोहली जी ने कहने को पीएचडी की उपाधि भी हासिल की लेकिन यदि वे ये उपाधि हासिल न भी करते तो उनके लेखन पर कोई अंतर् पड़ने वाला नहीं था .वे डॉ नगेन्द्र के शिष्य रहे.आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी उनके साथ जीवन की अंतिम सांस तक रहे .
कोहली जी बताते थे की उन्होंने सरकारी नौकरी भी कम नहीं की,पूरे तीन दशक वे अध्यापन के क्षेत्र में रहे और जब उन्हें लगा की नौकरी लेखन में बाधा बन रही है तो 1995 में उन्होंने सरकारी नौकरी से मुक्ति हासिल कर ली .मजे की बात ये की उनका अध्यापक कभी मरा नहीं. गुवाहाटी के विश्व हिंदी सम्मेलन में उनके सत्र में आयोजक छात्रों की भीड़ लेकर आ गए. लड़कियां खुसर-पुसुर कर रही थीं,वे क्या जाने नरेंद्र कोहली को ,लेकिन कोहली जी ने कानाफूसी करने वाली लड़कियों को ऐसी डाट पिलाई की सभागार में सुई पटक सन्नाटा पसर गया .
कोहली जी के बारे में अधिकारपूर्वक लिखने में मेरा सामर्थ्य शून्य है किन्तु मैंने विद्वानों के मुंह से सुना है कि
आधुनिक युग में नरेन्द्र कोहली ने साहित्य में आस्थावादी मूल्यों को स्वर दिया था। सन् 1975 में उनके रामकथा पर आधारित उपन्यास ‘दीक्षा’ के प्रकाशन से हिंदी साहित्य में ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण का युग’ प्रारंभ हुआ जिसे हिन्दी साहित्य में ‘नरेन्द्र कोहली युग’ का नाम देने का प्रस्ताव भी जोर पकड़ता गया । तात्कालिक अन्धकार, निराशा, भ्रष्टाचार एवं मूल्यहीनता के युग में नरेन्द्र कोहली ने ऐसा कालजयी पात्र चुना जो भारतीय मनीषा के रोम-रोम में स्पंदित था। महाकाव्य का ज़माना बीत चुका था, साहित्य के ‘कथा’ तत्त्व का संवाहक अब पद्य नहीं, गद्य बन चुका था। अत्याधिक रूढ़ हो चुकी रामकथा को युवा कोहली ने अपनी कालजयी प्रतिभा के बल पर जिस प्रकार उपन्यास के रूप में अवतरित किया, वह तो अब हिन्दी साहित्य के इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ बन चुका है। युगों युगों के अन्धकार को चीरकर उन्होंने भगवान राम की कथा को भक्तिकाल की भावुकता से निकाल कर आधुनिक यथार्थ की जमीन पर खड़ा कर दिया. साहित्यिक एवम पाठक वर्ग चमत्कृत ही नहीं, अभिभूत हो गया। किस प्रकार एक उपेक्षित और निर्वासित राजकुमार अपने आत्मबल से शोषित, पीड़ित एवं त्रस्त जनता में नए प्राण फूँक देता है, ‘अभ्युदय’ में यह देखना किसी चमत्कार से कम नहीं था।
मुझे लगता है कि कोहली जी का काम असंख्य पन्नों में है ,उनके काम का पर्याप्त मूल्यांकन भी हुआ और आगे भी होगा .वे एक महँ साहित्यकार थे और मै पूरे विश्वास के साथ काह सकता हूँ कि अगले पचास साल तक तो उन जैसा कोई दूसरा होने वाला नहीं है .उनके काम के आधार पर ही मैंने कहा है कि कोहली जैसा होना आसान काम नहीं है. वे पिछले दिनों कोरोना के प्रहार से ग्रस्त होकर अस्पताल गए और वहीं से अनंत यात्रा पर निकल गए .कोहली जी हमेहा स्मृतियों में रहेंगे. मेरी विनम्र श्रृद्धांजलि ,मै आने वाली पीढ़ी से गर्व के साथ कह सकूंगा कि -मैंने नरेंद्र कोहली को देखा था,सुना था ,पढ़ा था .
@ राकेश अचल

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