“सृजन” ने आयोजित की सफलता पूर्वक -“ई काव्यगोष्ठी”

    विशाखापटनम। सक्रिय हिन्दी साहित्य संस्था “सृजन” की तीसरी मासिक  ईकाव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में स्वागत भाषण करते हुए सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव  ने उपस्थित सभी   का स्वागत किया और कहा - सृजन पुनः अपनी सक्रियता बनाए रखने के प्रयास में तीसरी ई काव्य गोष्ठी का आयोजन कर रहा है। सृजन का उद्देश्य है रचनाकारों को मंच मिले, प्रोत्साहन मिले, प्रेरणा मिले ताकि वे हिन्दी साहित्य सृजन की ओर अग्रसर हो सकें।  ईकाव्यगोष्ठी का संचालन सृजन के अध्यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने किया ।

      सबसे पहले मधुबाला कुशवाहा ने वर्तमान परिस्थितियों में आत्मकेंद्रित हो रहे मानव की भावनाओं को “अपनी कविता” में प्रस्तुत किया और कविता “एक बार फिर जीने की आशा बढ़ी है” सुनाई।  इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए भारती शर्मा ने “बाबू जी” कविता में पिता की स्मृति को हृदयस्पर्शी रूप में सुनाया। ग़ज़ल में रूमानी स्थितियाँ दर्शाईं गई - जो कहके गए थे लौट के आऊँगा, रहा है उनका हमें इंतज़ार मुद्दत से। राम प्रसाद यादव ने  बिंबों और प्रतीकों से भरी अपनी रचना सुनाई शीर्षक था “इस तरह घर कुछ घर बनता है ” जिसमें भारत की विभिन्न दिशाओं में बने प्रान्तों की देन को भावगर्भित रूप में पिरोया गया था ।

      लक्ष्मी नारायण दोदका ने दो कवितायें “दोस्तों का प्यार” और “क्या खूब लिखा है” पढ़ा जिनमें मानवीय संवेदनाओं का खुलासा था। सीमा वर्मा ने व्यंग्य कविता “भ्रष्टाचार मुक्त भारत” सुनाया। अंत में उनका कहना कि “करना है हमें ही अपने से शुरुआत भ्रष्टाचार के समापन के लिए” सुंदर बन पड़ा।  “चिंता किस बात की” हास्य कविता के साथ प्रस्तुत हुए एस वी आर नायडू। हालातों पर तीखी नजर और कटाक्ष था बी एस मूर्ति की कविता “है ज़रूरत” और “चाहता है हर कोई” में। सामयिक और मानव की परिस्थितियों पर उन्होने अच्छा तंज़ कसा।



      कार्यक्रम के संयोजक निशिकांत अग्रवाल ने अपनी “किस्सा गोई” स्तम्भ की एक रचना सुनाई “वालचंद का योगदान” जिसमें एक रेलवे के ठेकेदार से संघर्ष करता व्यक्ति किस तरह अंतर्राष्ट्रीय स्तर का उद्योगी बना, इसका प्रभावी वर्णन था ।  डॉ  टी महादेवराव ने “रात तालाब किनारे” और “गुलेल” शीर्षक दो प्रतीकात्मक कविताएं सुनाई, जिसमें बिंबों के माध्यम से मानवीय प्रवृत्ति और प्रकृति से प्रेम को रेखांकित किया गया। नीरव कुमार वर्मा ने वर्तमान से परेशान होकर अतीत में खो जाने के बात बड़े ही मार्मिक ढंग से अपनी कविता “ आज फिर समय के पहिये को घुमाने को जी चाहता है”। भटकाती स्थितियाँ, असमंजस देते परिवेश पर अच्छी कविता थी।  कार्यक्रम में  अरुणा वेदुला, भालाम्पूदी श्रीनिवास राव, सी एच निर्मला भी शामिल रहे।

      अंत में श्रीमती सीमा वर्मा ने  उपस्थित सभी का आभार माना और सभी को नवरात्रि की शुभकामनायें देते हुये कहा जिस तरह नव रात्रि में नौ रंग होते हैं उसी तरह आज ईकाव्यचर्चा में विभिन्न रंगों, स्थितियों पर कवितायें सुनने को मिलीं।  उन्होंने कहा इस तरह मिलजुल कर भले ही आभासी मंच हो हम साहित्य सृजन की ओर अग्रसर हो सभी हमारी प्रतिभा का और सर्जना का सही अर्थ सामने आएगा। इस कार्यक्रम का संयोजन निशिकांत अग्रवाल और तकनीकी सहयोग सदानंद तिवारी का था।
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