पिछले कई महीनों से सोचता रहा कि हम सिन्धी गैरसिन्धी पुरुषों को ‘भया’ और इस्त्रियों को ‘भयाणी’ क्यों कहते हैं ? साधारण अर्थ में इसका अर्थ ‘भैया’ और ‘बहन’ होता है । भाषाओं में कुछ शब्द ऐसे होते हैं, जिनके पीछे एक इतिहास होता है । बहुत सोचने – विचारने के बाद द्वापर युग के इतिहास में इन शब्दों का मूल अर्थ समझ में आया ।
1786 में कलकत्ते में हुए एक सेमीनार में सर विलियल जोन्स ने कहा था – “आगरे में हमने एक जीवन्त भाषा सुनी थी, जिसकी भाषाशैली बहुत ही विचित्र (wonderful) थी । उस भाषा के शब्द ब्रजभाषा की कविता – रूप में और संस्कृत में भी मिलते हैं । संस्कृत का संस्कार उत्तर भारत की किसी साधारण बोली से हुआ था ।”
उत्तरप्रदेश की ब्रजभाषा और अवधी में ‘हुआ’ के अर्थ में ‘भयो’ और अवधी में ‘भया’ है, जिसका संस्कृत में ‘भव’ रूप है, जो कि भविष्य वाचक क्रिया के रूप में प्रयुक्त होता है । सिन्धी मेें इस अर्थ में ‘थियो’ और गुजराती में ‘थयो’ कहा जाता है ।

इतिहास से पता चलता है कि द्वापर युग में कौरवों की बहन दुशल्ला का विवाह सिन्धू नरेश जयद्रथ के साथ हुआ था । विवाह के बाद सिन्ध का भोजन पसन्द न आने के कारण रानी दुशल्ला ने अपने भाईयों को सन्देश भिजवाकर, हस्तिनापुर (दिल्ली) से सिन्ध में 500 ब्राह्मणों को बुलावाया था ।
सिन्ध में वे ब्राह्मण घरों में भोजन आदि बनाने का कार्य किया करते थे । सिन्धी महिलाएं जब उनसे पूछती थीं “कमु थियो !” तो वे अपनी भाषा के अनुसार उत्तर देते थे “भयो – भयो !” इस कारण सिन्धी में उन ब्राह्मणों का उपनाम ‘भयो’ और उनकी इस्त्रियों का उपनाम ‘भयाणी’ पड़ गया ।
इसलिए 1947 में हुए बंटवारे के कारण बाद भारत में आने के बाद भी हम सिन्धी गैर-सिन्धी भाईयों को ‘भयो’ और बहनों को ‘भयाणी’ कहते हैं ।
यहां यह भी ध्यान रहे कि तथाकथित (so called) देवभाषा और सब भाषाओं की जननी संस्कृत में ‘थ’ से एक भी शुरू नहीं शुरू होता । इसलिए जैसे गुजराती के ‘थयो’ का मूल रूप सिन्धी का ‘थियो’ है, वैसे ही ब्रजभाषा के ‘भयो’ और अवधी के ‘भया’ के साथ ही संस्कृत के ‘भव’ का मूल रूप भी सिन्धी का ‘थियो’ है । इसका एक उदाहरण और देखें सिन्धी में “धनवन्ती थीउ !” का संस्कृत रूप है “धनवन्ती भव !” इससे यह प्रमाणित हो जाता है कि सर विलियम जोन्स ने जिस जीवन्त और विचित्र रचना-शैली वाली भाषा का उल्लेख किया है वह ‘सिन्धी’ है ।
प्रेम तनवाणी –






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