ना किसी के सपनों में मिलेंगें,
ना किसी के अरमान में मिलेंगें.
जहाँ भी देगी सरकार पोस्टिंग हमें,
वहाँ के सरकारी मकान में मिलेंगें.

सालों की पढ़ाई, मेहनत और
जब तकदीर रंग लाते हैं.
बुजुर्गों का आशीर्वाद मुस्कुराता है,
तब सरकारी नौकरी पाते हैं.
जड़ें गांव में रह जाती हैं,
जाने कब,पत्ते दूर निकल जाते हैं.
खेत- खलिहान में रमने वाले,
सरकारी मकान में बस जाते हैं.
गर्मी और सर्दी यूँ ही गुजर जाते हैं ,
बिना परिवार, त्यौहार मन जाते हैं.
होली और दिवाली , हम काम में मिलते हैं,
घर नहीं,अब सरकारी मकान में मिलते हैं.






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