न रंजो ग़म है
न मिटने का एहसास
हम तो जश्न में डूबे हैं
दूसरे दर पर बैठ जाएंगे
मर चुके हैं ज़ज्बात
और लड़ने का ज़ज्बा भी
चिरागां न रहेगा
मिट जाएगा निशाँ
घर पर आ बसेगा लुटेरा एक नया
जिसे कहोगे रहबर तुम
कोई हो जाएगा काबिज उस दर पर
कभी गूंजती थीं जहाँ आवाज़ें हमारी
गवाह हैं रवायतें
हमारी पसीने की महक की
क्या लोग थे चमन बनाने वाले
और हम खड़े हैं उजाड़ने वालों के दामन में
दफन हो जाएंगी सांसे हमारी
जब इंसान के नाम से न पहचाने जाएंगे हम

राकेश श्रीवास्तव
लखनऊ







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