लड़कियाँ खाना पकाती है
और पकती हैं धुएं से
मसालों की छौंक से
काली पड़ जाती है उनकी त्वचा
बड़ी तन्मयता से रगड़ती है .
पत्थर पर घिसती हैं एड़ियाँ
सुघड़ता से सुल्झाती हैं
छोटे-बड़े बालों को एक-एक कर अलगा लेती हैं
लड़कियाँ भाइयों को खाना परोसती हैं
बाबूजी और उनके दोस्तों को पानी पहुँचाती हैं
दो ही कदमों में पूरा कर लेती है फ़ासला
रसोईघर से बैठक तक
लड़कियाँ बर्तन माँजती हैं
फर्श पर से काई रगड़कर साफ कर लेती हैं
लड़कियाँ सिर से जुंआ यूँ ही बिन लेती हैं खेल-खेल में
चकरघिन्नी की तरह घूम जाती हैं
और देख लेती हैं पृथ्वी का ओर-छोर
लड़कियाँ जब थककर चूर हो जाती हैं
किताबों में खो जाती हैं
लड़कियाँ अक्षर-अक्षर लड़कियाँ हो जाती हैं
झूलती है झूला और माँ की डांट खाती हैं
लड़कियाँ समाय से तेज भागती हैं
सबके पीछे सोती हैं
सबसे पहले जाग जाती हैं
मौके बेमौके हँस देती हैं
भाईयों की नज़र बचाकर
चुपके से होठों पे लाली
और कभी-कभी पर रूज़ लगा लेती हैं
लड़कियाँ सुबकती रहती हैं
तकिए में मुंह गड़ाकर
अंधेरे में चुपचाप
लड़कियाँ¡ जलदी-जलदी बड़ी होती हैं
औरत बनती हैं
दर्द सहती हैं
और जनती हैं
अपनी तरह लड़कियाँ -
लड़कियाँ जो कभी बूढ़ी नहीं होती….

• भास्कर चौधुरी








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