व्यंग्य- नाम में क्या रखा है ?

डॉ टी महादेव राव

शेक्सपियर ने कहा था नाम में क्या रखा है, अगर गुलाब को हम किसी और नाम से बुलाएँ तब भी वह वही सुगंध देगा। लेकिन शेक्सपियर को गुजरे कितनी सदियां बीत गईं और इस संसार की नश्वरता में कितना कुछ हो गया और लगातार हो भी रहा है।

जहां अपने बाद कोई नाम लेवा न हो, तो स्वाभाविक है नाम को अमर करने की मंशा ज़ोर मारेगी। सहज है कि कितना भी स्वयं को निस्वार्थी बताएं पर नाम कमाने से लेकर नाम के बिकने की बात व्यक्ति को स्वार्थी ही बना ही देती है। लोगों का क्या, कहते रहें।

मैंने एक सज्जन से पूछा, “भाई साहब! नाम में क्या रखा है? आजकल लोग अपने नाम को लेकर उद्वेलित तो हैं ही, पुराने नामों को मिटाकर अपने नाम बेचने पर तुले हैं। आपकी क्या राय है?”

पहले वे सज्जन बोले “ मेरे उत्तर के साथ मेरा नाम भी छपेगा न आपके लेख में?” अपना नाम उन्होने बताया “सादगी लाल” । मैं खुश हो गया उनका नाम सुनकर।

वे व्याख्यान देने लगे – “ आदमी बेनाम पैदा होता है। नामकरण के बाद ही उसका नाम आता है अस्तित्व में। बचपन में चिंकू, पिंटू और गुड्डू होता है जो बाद में जाकर चिरौंजी लाल, परमेश्वर प्रसाद, गोवर्धन कुमार बन जाता है। और अब जहां तक राजनीति की बात है तो कम अक्षरों वाले नाम ज्यादा फेमस हो गए हैं जैसे गांधी, नेहरू, पटेल, सोनिया, राहुल, प्रियांका, मोदी, शाह, ममता, जनता, भाजपा, काँग्रेस आदि।

“अब पहले के प्रधानमंत्री का प्रभाव ऐसा रहा, जैसा कि वर्तमान प्रधानमंत्री कहते हैं, आज सत्ता हथियाने के सात साल बाद भी उन्हीं का नाम लिया जाता है, उन्हीं के नाम का रोना रोया जाता है । आज अगर ऐसी दुर्गति हो रही है तो उसके कारण हैं वे पुराने चावल। अगर अच्छा हो रहा है तो यह हमारा कमाल है। यह है नाम धरने का नया शगूफा।”

सादगी भरे वक्ता से प्रभावित होता हुआ मैं बोला “वो तो ठीक है! पर पुराने नामों का इस्तेमाल आप कर रहे हो कि उन पूर्व महानों की वजह से, उनकी अकुशलता के कारण आज परिस्थितियाँ बुरी बनी हुई हैं, तो उन नामों को मिटाने युद्धस्तरीय कार्य करने के पीछे आपकी मंशा क्या है?”

चिंतक भाई सादगी लाल ने कहा “ आप शायद सामान्य ज्ञान नहीं रखते। लेकिन हमारी वजीरे आला तो कहते हैं नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा ( बदल ही रहा है), मेरी आवाज़ ही पहचान है, गर याद रहे। लेकिन इन सबके बावजूद पुराने नाम पुराने चेहरे, अपने भक्तों की भक्ति सागर में तैरते रहने के बाद भी, उनके सपनों में आते हैं और वे अनिद्रा के कारण परेशान हो जाते हैं।”

कुछ रुककर सोचते हुये बोलो सादगीलाल जी “ मैं तो कहता हूँ राजनीति का पर्याय ही है नाम का चक्कर। देखो प्रेसमीट तो कभी करते नहीं, लेकिन मन में यह इच्छा ज़ोर मारती रहती ही है कि सदा समाचारों में बने रहें, फोटो छपे, नामचीन हो जाएँ। और तो और रेडियो के माध्यम से भी अपने दिल की बातें महीने में एक बार सुनाकर श्रोताओं के कान खींचते हैं ( महंगाई के चलते जनता की खाल खींचते हैं, यह अलग बात है)। इसके पीछे क्या है? सिर्फ खुद को, स्वयं के नाम को बढ़ाने की और बेचने की कोशिश। और क्या? अब बचपन में बाप ने गाया ही होगा – मेरा नाम करेगा रोशन, जग में मेरा राजदुलारा”

मैं इस ज्ञानी से अभिभूत था, फिर भी पूछ बैठा – “ लेकिन आम जनता को नामों से क्या लेना देना? उनके लिए तो महंगाई कम करो, सही सुविधाएं मुहैया करो, तेल, नून, लकड़ी( ईंधन गैस – एल पी जी) सही दामों में मिलती रहे। अब पुराने आठ दस साल के पहले की तुलना में देखा जाये तो महंगाई कितनी बढ़ गई है? प्रचार-प्रसार, यात्रा, भाषण और उद्घाटनों पर कितने खरबों खर्च हो रहे हैं। अगर इस धन को जनकल्याण पर लगाया जाये तो नाम तो होगा ही, चुने जाने की वज़ह जो है, काम भी होगा न?”

“ आप भी किस जमाने में जी रहे हो? जनता खुश रहेगी तो कौन होगा नामलेवा? हें कौन पूछेगा? नाम का ही महत्व है, वरना लोगों में भूलने की आदत बड़ी तेज़ी से बढ़ रही है। तभी न पुराने नामों को बदनाम करके अपने नाम की तख्ती लगाकर विदेशों में भी अपने नाम को चमकाने की कोशिशें की जा रही हैं। “

“ तो राम नाम जपना, पराया माल अपना और नामों की फहरिश्त में जीते जी अपना नाम किसी मैदान के लिए रख लेना, पुराने प्रभावी महान नामों को मिटा कर – क्या सही है सादगी लाल जी?”

“ राजनीति में, सत्ता में कभी कोई मापदंड नहीं माना जाता। सही और गलत की परिभाषाएँ ही नहीं, वे शब्द ही इनके लिए बेमानी है। अब आपके बाद आपका नामलेवा कोई न हो तो आप क्या करोगे? कुछ न कुछ “नाम” के लिए जुगाड़ करना ही होगा न? “

“ बहुत अच्छे सादगी लाल जी! अच्छा लगा आपसे बातें करके।“

“ हाँ! इन संवादों के साथ मेरा नाम जरूर छापिएगा। चलता हूँ।“ अपने हाथ लहराता हुआ एक ज्ञानी के प्रस्थान को मैं एकटक देखता रहा.

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