
हम शायद फिर से सभ्यता के पहले वाले भावना हीन, अनुभूति शून्य और संवेदना विहीन जमाने में पहुँच गए हैं। दुनियाँ भर में कोरोना के कहर का दूसरा पहर, शुरू क्या हो गया, अपनी चरम पर है और हम अस्पतालों, ऑक्सिजन और दवाइयों पर ध्यान देने के बजाय, चुनावों पर, कुम्भ मेलों पर और अपनी छवियों को निखारने चर्चे और झूठ के पुलिंदों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं, बस उसी में जिये जा रहे हैं। धार्मिक होना अच्छी बात है लेकिन धर्म तभी निभेगा जब हम स्वस्थ रहेंगे, नीरोग रहेंगे और भी कहें तो जीवित रहेंगे। हम कट्टरता की सीमा तक अपनी बातें मनवाने और अपने अति धार्मिक होने की स्थिति में पहुँच गए हैं, जो कि सकारात्मक दृष्टिकोण तो किसी भी हालत में नहीं है।
कहा यह गया था कि पिछले वर्ष जब एक धर्म विशेष के लोगों ने तबलगी जमात का आयोजन किया था, तब से कोरोना का फैलाव अधिक हो गया और यही कारण है कि सारे देश में कोरोना फैल गया। बात सच भी हो। लेकिन जब पूरी तरह स्थितियाँ नियंत्रण में नहीं आयीं, बस कोरोना रोगियों की संख्या कम हुई तो हमारे कुंद दिमाग को लगा हम फतह हासिल कर गए और फिर पांच राज्यों की चुनावी रैलियाँ, तीज त्योहार, मेले शेले, कुम्भ मेला जिसमें करोड़ों लोग शामिल होते हैं, तुर्रा यह कि हम सामान्य से भी अति सामान्य हो गए। नेताओं को देखने, सुनने और समझने (समझदारी की कमी का यह द्योतक है) पूरे जोरोशोर से निकल आए अपने दडबों से बाहर। न मास्क, न सेनीटाइजर, न दो गज़ की सामाजिक दूरी, न हाथ धोना कुल मिलाकर कोरोना से बचने की सावधानियों और सतर्कताओं को दर किनार कर कोरोना के दूसरे कहर को निमंत्रण पे निमंत्रण भेजे जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि छोटे मोटे नेताओं की रैलियाँ हैं। प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री और बड़े बड़े नेता सभी ने अपनी रैलियों में भीड़ को बढ़ा चढ़ाकर बुलावा भेजा। और दडबों से निकली भीड़ आ जुटी, अब भी कहीं कहीं रैलियाँ हो ही रही हैं। कहीं ग़रीब की रोजी रोटी से जुड़ा सवाल तो कहीं ग़रीब के अस्तित्व का प्रश्न अब भी अपनी पूरी विकरालता के साथ मुंह बाए खड़ा है।
जिम्मेदार पदों पर जो लोग हैं, उनकी मंशा, कि हर कुर्सी हथियाने की इससे बिलकुल साफ तरीके से, हमारे सामने आई। उन्हें जनता के स्वास्थ्य या समस्याओं से कुछ लेना देना नहीं है। आम जन केवल वोट है, मतों की गिनती है उनके लिए। इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। बस अपना स्वार्थ सिद्ध करना और उसके लिए किसी भी हद तक नीचे जा सकने की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रही है। हमेशा भक्तों के बीच, समाचारों में छाए रहने की ललक ने भी कम नुकसान नहीं किया। कोरोना निरोधक दवाइयों की, वैक्सीन का ईजाद हो गया, हम खुद अपनी पीठ थपथपाने लगे, पर इस वैक्सीन की हर जगह आपूर्ति की समस्या सुरसा मुख की तरह बनी हुई है। अन्य कोरोना निरोधक दवाइयों की कमी भी कोरोना से होने वाली मृत्युओं की संख्या बढ़ा रही है। पर्याप्त अस्पताल नहीं हैं और जो उपलब्ध अस्पताल हैं उनमें बेड नहीं हैं। मरीज को अस्पताल पहुंचाने पर्याप्त एंबुलेंस नहीं है। एंबुलेंस किसी तरह मिल गया तो दिनों तक प्रतीक्षा अस्पताल में भर्ती होने के लिए। भर्ती हो गए तो ऑक्सीज़न की कमी, दवाइयाँ नदारद। आम भारतीय नागरिक की स्थिति कमोबेश न लौट सकने की स्थिति में चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु सी हो गई है। त्रिशंकु के स्वर्ग में लटका आम आदमी न ही जी पा रहा है और न मर पा रहा है।
दूसरे दौर में कोरोना समय नहीं दे रहा है। समय पर इलाज़ न हुआ तो बस राम नाम सत्य है। इस स्थिति की गंभीरता से नागरिकों को वाकिफ होना ही चाहिए साथ ही सरकार का यह परम कर्त्तव्य बनता है कि कम से कम आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराएं, जिस भरोसे पर, जिस विश्वास को लेकर जनता ने सत्ता सौंपी है, उसका कुछ तो लिहाज रखें और जनता के उम्मीदों पर खरे उतरें।
इसके साथ ही दैनंदिन उपयोग की चीजों के दाम भी कोरोना रोगियों की दिन ब दिन बढ़ती संख्या की तरह लगातार बढ़ रहे हैं। गैस, डीजल, पेट्रोल के दाम तो बस बढ़ रहे हैं जैसे केवल वे ही सबके साथ अपना विकास कर रहे हैं। चारों तरफ का भयावह माहौल, डराती परिस्थितियाँ, बढ़ता भयानक कोरोना, महंगाई, अस्पतालों में बेड के कमी, दवाइयों और प्राणवायु की कमी, वेक्सीन की कमी, समुचित इलाज का अभाव जैसी समस्याओं का अति क्रूर ऑक्टोपस अपने आठों हाथ पैर फैला कर आम जनता को चूस रहा है, जिससे न जीते बन रहा है न मरते ही।
जरूरत है पाँच साल के लिए सो रहे कुंभकर्णों को नींद से जागने की, आम जनता के प्रति अपने कर्त्तव्य निर्वाह करने की और सबसे बड़ी बात खुद को मानव और संवेदनशील सिद्ध करने की







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