लाल बहादुर शास्त्री – अनुकरणीय व्यक्तित्व


आज देश में उच्च स्तर पर जिस प्रकार सादगी व नैतिकता का अभाव है उसमें शास्त्री जी एक धवल सितारे की तरह चमकते रहते हैं। भारत में गांधी के बाद शायद वह पहले ऐसे राजनेता थे जिनके आचरण को देखकर जनता ने पूरी निष्ठा से उनके आह्वान का पालन किया हो।
59 वर्ष की अवस्था में जब उन्होंने 9 जून 1964 को भारत के प्रधानमंत्री का कार्यभार संभाला तो देश अनेक तरह के संकटों से जूझ रहा था।1962 में चीन से मिले धोखे और हार से देश का मनोबल टूटा हुआ था।हताहत राष्ट्रीय गौरव को पुनर्स्थापित करने का महती कार्य था।देश में अन्न का भीषण संकट था। भ्रष्टाचार एवं बेरोजगारी की समस्याएं मुह बाये खड़ी थीं।हिन्दी के प्रश्न को लेकर दक्षिण भारत मे असंतोष था। नेहरू जैसे चमत्कारी व्यक्तित्व के बाद पद संभालने की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती थी।
वह कद काठी मे जरूर छोटे थे परन्तु आजादी के लडाई मे तपे हुए थे।गांधी जी के आह्वान पर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पढ़ने वाले शास्त्री जी अंग्रेजी हुकूमत के समय सात साल से अधिक समय तक जेल में रहे।उनका बचपन अनेक कष्टों और आर्थिक संकट में बीता परंतु उन्होंने इन चीजों का न तो कभी बखान किया और ना ही उसका कोई लाभ लिया।
उन्होंने अपने कार्यकाल में कई अभिनव प्रयोग किए।पुलिस द्वारा भीड़ को नियंत्रित करने में लाठी की जगह पानी की बौछारों का इस्तेमाल सबसे पहले आप ने ही करवाया।
15 नवम्बर 1956 को हैदराबाद के पास महमूद नगर रेल दुर्घटना में 112 लोग मारे गए थे जिसके लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था।तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस्तीफा स्वीकार करने से इंकार कर दिया था परंतु शास्त्री जी अपने निश्चय पर दृढ़ थे।इस घटना पर संसद में बोलते हुए पंडित नेहरू ने शास्त्रीजी की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि वे इस घटना लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी।संसद मे लाल बहादुर शास्त्री ने कहा; “शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ नहीं हो पा रहा हूँ। यद्यपि शारीरिक रूप से में मैं मजबूत नहीं लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूँ।”
पर भारतीय राजनीति में कुछ लोग उनके संदेश को समझ नहीं सके।प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने भ्रष्टाचार पर कड़ी कार्रवाई के लिए कांग्रेसी नेता के संथनम के नेतृत्व मे एक कमेटी का गठन किया।प्रताप सिंह कैरों जैसे प्रभावशाली मुख्यमंत्री से इस्तीफा ले लिया।उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीरेन मिश्रा और बीजू पटनायक के विरुद्ध भी कार्यवाही की।वित्त मंत्री टी कृष्णामचारी को भी मंत्रिमंडल के बाहर का रास्ता दिखाया।अपने मंत्रिमंडल मे उन्होंने इंदिरा गांधी को अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय दिया।उनकी एक बहुत बड़ी देन केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) का गठन है।
इलाहाबाद के करछना विधानसभा के उरुवा बाजार में किसानों को संबोधित करते हुए शास्त्री जी द्वारा दिया गया ‘जय जवान जय किसान’ का नारा देश के लिए मंत्र समान था।शास्त्री जी ने देश पर मंडरा रहे अन्न संकट को देखते हुए जनसभा में कहा था कि ‘एक वक्त खाएंगे लेकिन अमेरिका के सामने झुकेंगे नहीं’।तमाम लोग एक वक्त भोजन करने लगे थे।उन्होंने अपने भोजन को एक सब्जी तक सीमित कर लिया था तथा अपनी प्रिय सब्जी आलू का त्याग कर दिया था।
चीन युद्ध के बाद पाकिस्तान के हौसले बुलंद थे।उनकी कद काठी को देखकर पाकिस्तान के जनरल मोहम्मद अयूब को लगता था कि भारत का नेतृत्व कमजोर हाथों में है।
बीबीसी के संवाददाता रेहान फजल,पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त रहे शंकर बाजपेई के हवाले से लिखते हैं “अयूब ने सोचना शुरू कर दिया था कि भारत कमज़ोर है. वो नेहरू के निधन के बाद दिल्ली जाना चाहते थे लेकिन उन्होंने ये कह कर अपनी दिल्ली यात्रा रद्द कर दी थी कि अब किससे बात करें. शास्त्री ने कहा आप मत आइए, हम आ जाएंगे.”
शायद इसी गुमान में पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण करने की भूल कर दी 1 सितंबर 1965 को अखनूर से पाकिस्तानी भारतीय सीमा में घुसी।कहते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में ही मनुष्य के चरित्र की परीक्षा होती है और व्यक्तित्व में निखार आता है। उन्होंने दूरदर्शितापूर्ण निर्णय लेते हुए सेना को करवाई की पूरी छूट दे दी और लाहौर कूच करने को कह दिया।अमृतसर,फिरोजपुर और गुरदासपुर तीन तरफ से हमला बोलकर पाकिस्तान को चौंका दिया।दो दिनों बाद सेना ने सियालकोट का मोर्चा भी खोल दिया।23.9.65 को युद्ध विराम की घोषणा हुई।श्री लाल बहादुर शास्त्री की दृढ़ता,संयम और बहादुरी का पूरे विश्व ने लोहा माना। 26 सितंबर 1965 को रामलीला मैदान मे शास्त्री जी ने हुंकार भरते हुए कहा था “सदर अयूब ने कहा था कि वो दिल्ली तक चहलक़दमी करते हुए पहुंच जाएंगे।वो इतने बड़े आदमी हैं लहीम शहीम हैं।मैंने सोचा कि उन्हें दिल्ली तक चलने की तकलीफ़ क्यों दी जाए। हम ही लाहौर की तरफ़ बढ़ कर उनका इस्तक़बाल करें।”
बाद में ताशकंद समझौता हुआ जो अंदर से उनको कहीं से आहत कर गया।10 जनवरी की रात उन्होंने अपनी बेटी और दामाद से बात की। बेटी से पूछा कैसा लगा।उसने कहा अच्छा नहीं लगा। फिर पूछा अम्मा को। बेटी ने बताया उनको भी नहीं है।कहते हैं कि उस रात्री उनकी पत्नी श्रीमती ललिता शास्त्री जी ने बात करने से मना कर दिया। शास्त्री जी को संभवतः समझौते को लेकर सदमा लगा और वह रात् भारत के इतिहास की काली रात में बदल गई।
लेकिन इस छोटे कार्यकाल में ही उन्होंने देश को उसका गौरव वापस किया और संकल्पों को लेकर आगे बढ़ने की शक्ति दे। उनकी सादगी, कर्मठता, लगन और दूरदर्शिता सदैव प्रेरणास्रोत रहेंगी।

राकेश श्रीवास्तव

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