राजनीति में बढ़ते वंशवाद

हम यहां परिवार की दूसरी पीढ़ी का राजनीति में आने को गलत नहीं मान रहे हैं लेकिन राजनीतिक नेतृत्व पर यह दावा उनके गुण कौशल और कार्य निष्पादन के आधार पर होना चाहिए ना कि जन्मजात अधिकार के रूप में।
यहां हम अपने भारतीय जनता से अपील कर रहे हैं कि आप सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से जागरूक बने जिससे कि आप राजनीतिक दलों के नीतियों को समझते हुए गलत नीतियों का आप पुरजोर विरोध करें। अब वैसे भी दोस्तों मुझे लगता है कि राजनेताओं को भी यह समझ लेना ही चाहिए कि वंशवाद का लोकतंत्र में तब तक कोई स्थान नहीं हो सकता है जब तक की इसे चलाने वाली आम जनता की निगाहों में उस वंश की साख शंका से परे ना हो। लेकिन यहां अजीब विडंबना है कि लोग लोकतंत्र में अपने अधिकारों की बात भी करते हैं तो अल्प समय के लिए दीर्घकालीन मुद्दों को लेकर बहुत कम ही लोग सोचते हैं, जिसका नतीजा हमें आज के राजनीति में देखने को मिलता है भाई भतीजावाद, धनबल, बाहुबल और चापलूसी जैसी दृश्य !
पिछले वर्ष ही जो लोकसभा चुनाव हुआ उसका परिणाम देखें तो इस चुनाव में भारतीय राजनीति में परिवारवाद पहले से या तानाशाही से इस रूप में भिन्न होती दिखाई देती है कि जहां राजतंत्र में एक ही परिवार या कहें वंश के लोगों का राज पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है , जबकि वहीं दूसरी तरफ दोस्तों जबकि लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को खुद चुनती है। हमारे भारत में साल 1952 के बाद से लेकर आज तक किसी ना किसी रूप में जारी है। ध्यान से देखिए जिस परिवार से एक बड़ा नेता हो जाता है तो उस परिवार के बाकी सदस्यों को विरासत में राजनीति मिल जाती है। आंकड़ों के मुताबिक देखें तो 1999 से 2014 तो कांग्रेश के पास लोकसभा के लिए चुने गए वंशवाद ‌ सांसदों की संख्या 36 थी वही अन्य राजनीतिक पार्टियों के सवाल है तो वह भी पीछे नहीं रही थी। भाजपा भी 31सांसदों के साथ कांग्रेस को बराबर की टक्कर दे रही थी।
इसी प्रकार से भारत के राज्यों में भी वंशवाद राजनीति का ही बोलबाला है। इन सब का सबसे बड़ा कारण मुझे लगता है कि राजनीति में महत्वपूर्ण व्यक्ति की पूजा है, जिसके तहत किसी व्यक्ति विशेष को ही महान मानकर उसकी पूजा की जाने लगती है। इस बात पर भी अध्ययन हुआ कि कुछ राज्य दूसरों की तुलना में राजनीतिक वंशो से ही अधिक लोगों का चुनाव क्यों करते हैं,, तो इसका एक अन्य वजह निकल कर आया कि जातिगत राजनीति की संरचना भी है।हमें अपने अधिकारों के साथ ही कर्तव्यो को भी समझाते हुए ही वंशवाद जैसी परम्परा से बचते हुए साथियों उसको हमें अपना प्रतिनिधि चुनना है जो जनता के आवाज को सुन कर निवारण करे , जनता के लोकतांत्रिक मूल्यों और आधिकरो का रक्षा कर सके ।।

विक्रम चौरसिया

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