युवा सरपंच के भरपूर प्रयासों से वर्षों से बंद मड़ई मेला का नुनेरा में हुआ शुभारंभ, पंचायत प्रतिनिधियों व नवयुवक समिति के तत्वावधान में एक दिवसीय ग्रामीण परंपरा का होगा आयोजन

0 पूर्वजों की देन ग्रामीण अंचल का मड़ई मेला, रिश्ते- नातेदारों से भेंट मुलाकात का भी सबसे अच्छा माध्यम- मुकेश स्रोते, सरपंच 0

कोरबा/पाली/ ग्राम विकास के साथ सामाजिक कार्यों में भी अपनी अहम भूमिका निभाने वाले नुनेरा के युवा सरपंच मुकेश स्रोते के प्रयासों से इस ग्राम में वर्षों से बंद छत्तीसगढ़ का पारंपरिक मड़ई मेला का पुनः शुभारंभ हुआ है। पंचायत प्रतिनिधियों व नवयुवक समिति के तत्वाधान में यहां आयोजित होने वाले एक दिवसीय मड़ई मेले का आयोजन वर्तमान माह के आगामी दिनों में ग्राम में लगने वाले साप्ताहिक बाजार के दिन सुनिश्चित करने रूपरेखा तैयार की जा रही है। जिसमे राउत नाचा सहित अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मेले का ग्रामीण लुप्त उठाएंगे। वहीं मड़ई मनाने कई गांव से स्वजन भी पहुचेंगे। मड़ई मेला के आयोजन को लेकर सरपंच मुकेश ने बताया कि छत्तीसगढ़ की पारंपरिक धरोहर के रूप में पहचान वाले मड़ई मेला को लेकर खेतों में फसल कटने के बाद ग्रामीणों में खासा उत्साह रहता है तथा यह मनोरंजन का एक अच्छा माध्यम भी होता है। उसके ग्राम नुनेरा में भी यह आयोजन पूर्वजों के काल से होता चला आता रहा है, किन्तु विगत 10- 12 साल से मड़ई मेला बंद था। सरपंच निर्वाचित होने बाद ग्रामीण परंपरा को बनाए रखने उनके द्वारा ग्राम में मड़ई मेला का पुनः शुभारंभ ग्रामवासियों के सहयोग से कराया गया, जो एक दिवसीय होने के साथ पिछले चार साल से परस्पर संचालित होते आ रहा है तथा इस बार का मड़ई मेला उनके एक सरपंची पंचवर्षीय कार्यकाल के साथ पांचवा वर्ष होगा। सरपंच ने कहा कि मड़ई मेला छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्र का प्रमुख त्योहार है। जिसमे लंबे समय बाद उन्हें पारंपरिक नाचा व छत्तीसगढ़ी कार्यक्रमों के आनंद लेने का मौका मिलता है। वहीं इस मेले में रिश्तेदार, सगा- संबंधी, मित्र निमंत्रण मिलने पर आते है और अपने चित- परिचितों से भेंट मुलाकात कर हाल- चाल जानते हुए खुशियां बांटते है। इस प्रकार के मेला मड़ाई को प्रोत्साहन दिया जाना अति आवश्यक है। पुराने लोग प्रतिवर्ष चार माह की खेती किसानी की मेहनत के बाद सामूहिक उत्सव के रूप में गांव में मड़ई का आयोजन करते थे। इन दिनों आधुनिकता की दौड़ में ऐसे त्योहारों का महत्व हालांकि कम हुआ है। लेकिन इस तरह के कार्यक्रमों से छत्तीसगढ़ की पहचान व संस्कृति की झलक दिखाई देती है, छोटे- छोटे गांव में मेला जैसा दृश्य दिखाई देता है, अंचल में भीड़ भरा कार्यक्रम ग्रामीणों में उत्साह व भाईचारे का प्रतीक है और हमारे पूर्वजों की देन है, जिसे हमे सदैव बनाए रखना है।

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