मैडम कामा जिन्होंने विदेश में पहली बार फहराया भारत का झंडा

“ऐ संसार के कॉमरेड्स, देखो ये भारत का झंडा है, यही भारत के लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, इसे सलाम करो ! वह अगस्त 1907 का तीसरा सप्ताह था। मैडम कामा को पता चला कि जर्मनी स्थित स्टुटगर्ट में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन का आयोजन है। गुलाम भारत की दु:स्थिति का विश्वजनमत के सम्मुख पर्दाफाश करने का मैडम कामा के लिये यह सुनहरा मौका था। विश्व के अनेक देशों के एक हजार प्रतिनिधि सम्मलेन में भाग ले रहे थे। भारत की बारी आने पर मैडम कामा मंच पर चढ़ी। उसने रंगीन साड़ी पहनी हुई थी। श्रेष्ठता की आभा से उसका मुखमंडल दमक रहा था। प्रतिनिधियों को लगा यह तो भारत की राज-कन्या है। ‘मानवजाति का पाँचवा हिस्सा भारत में बसता है। स्वतंत्रताप्रेमी सभी को इन्हें गुलामी से छुड़ाने में योगदान देना चाहिए।’ साहस के साथ सम्मलेन में रखे उस प्रस्ताव का यह आशय था। अंग्रेज सरकार का धिक्कार करते हुए उसने कहा कि वे प्रतिवर्ष भारत से साढ़े तीन करोड़ रुपया लूट रहे हैं। उसने स्पष्ट किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था अंग्रेज साम्राज्यवादियों द्वारा हो रहे शोषण के कारण दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। भाषण के अंत में उसने भारतीय झंडा फहराते हुए कहा- ‘भारतीय स्वतंत्रता का यह झंडा है। देखो, यह आ गया है। जीवन का बलिदान करने-वाले तरुणों के खून से यह पावन हुआ है। मैं आपको आवाहन करती हूँ। सज्जनों, उठो और भारतीय स्वतंत्रता के इस झंडे को प्रणाम करो। इस झंडे के नाम पर मैं समस्त विश्व के स्वतंत्रताप्रेमियों से प्रार्थना करती हूँ कि इस झंडे को स्वतंत्र कराने में वे सहयोग करें। ‘

विवेक सिन्हा

मैडम कामा, वीर सावरकर और कुछ अन्य देशभक्तों ने मिलकर सन 1905 में तिरंगे झंडे का प्रारूप तैयार किया। तिरंगे झंडे में तीन रंग के पट्टों-हरा, केसरी व लाल का – समावेश था। सब से उपर हरे रंग के पट्टे में आठ खिलते हुए कमल अंकित थे। भारत के तत्कालीन आठ प्रदेशों के ये आठ कमल प्रतीक थे। बीच के केशरी पट्टे पर देवनागरी लिपि में ‘वन्दे-मातरम’ ये शब्द भारतमाता के अभिवादन स्वरुप अंकित थे। सबसे नीचे लाल पट्टे में दाहिनी तरफ अर्धचन्द्र एवं बायीं तरफ उगता सूरज चित्रित था। लाल रंग बल, केशरी रंग विजय और हरा रंग साहस तथा उत्साह दर्शाता है। मैडम कामा ने बताया: ‘इस झंडे का प्रारूप एक सुविख्यात, नि:स्वार्थ, युवा भारतीय देशभक्त ने बनाया था।’ उसका संकेत वीर सावरकर की ओर था।

28 अक्टूबर 1907 को मिनर्वा क्लब द्वरा वालडोर्फ होटल में एक सभा आयोजित थी । वक्ता थी मैडम कामा। अपने भाषण में कामा ने पुरजोर माँग की कि भारतीय लोगों को मतदान का राजकीय अधिकार मिलना चाहिए। अपने जोरदार भाषण में मैडम कामा ने कहा: “यहाँ के लोग रूस के बारे में जानते होंगे, परंतु भारत की दु:स्थिति के संबंध में वे ठीक से नहीं जानते होंगे। भारत में अंग्रेजी हुकूमत, पढ़े-लिखे और विचार कर सकने वाले लोगों का सफाया करने में तुली हुई है। यातनाएँ दे कर उन्हें जेलों व अस्पतालों में ठूँसा जा रहा है। हम रक्त – लांछित क्रांति नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण स्थिति चाहते हैं। जहाँ तक संभव हो अहिंसा के मार्ग से हम इस जुल्मी तानाशाही की जड़ें उखाड़ फैंकना चाहते है।“

ऐसे महान महिला स्वतंत्रता सेनानी मैडम कामा का जन्म आज ही के दिन 24 सितम्बर 1861 को बम्बई में हुआ था। कामा के पिता सोराबजी फ्रामजी पटेल बम्बई की जानी मानी हस्ती थे। उनका बड़ा व्यापार था और वे अमीर थे। नौ बच्चों से भरापूरा उनका बड़ा परिवार था। आगे चल कर अंग्रेज सरकार को आतंकित करनेवाले रुस्तम भिकाजी कामा इसी परिवार के थे। पिता सोराबजी ने बड़े लाड प्यार से कामा का लालन – पालन किया। कामा को प्यार से वह मुन्नी कह कर पुकारते। योग्य उम्र में कामा को अलेक्झांड्रा पारसी कन्या विद्यालय में दाखिल किया गया।
मुन्नी बहुत मेघावी थी। पूरी कक्षा में सब विषयों में वह पहले नंबर पर रहती। जब तक दिन भर की पढाई पूरी नहीं कर लेती, तब तक वह रात का खाना नहीं खाती थी। सोती भी वह तब तक नहीं थी जब तक घर पर करने के पाठ पूरे नहीं कर लेती। इस कारण वह सब विषयों में ऊँचे अंक प्राप्त करती। स्वाभाविक ही थी कि मुन्नी सब अध्यापकों की लाडली हो गई थी।

यह वह समय था जब उस कच्ची उम्र में भी मुन्नी की आकांक्षा रहती थी कि वह कई भाषाओं में निपुणता प्राप्त कर ले। बचपन में ही स्वतंत्रता की लड़ाई में उसे काफी रूचि थी। देश के लिये बलिदान करनेवाले देशभक्तों की वह पूजक थी। देश के हित में जूझनेवालों के लिये उसके दिल में सम्मान था। उसके कारनामों से पिता सोराबजी परेशान थे। आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने से वे अपनी लड़की को रोकना चाहते थे।

परंतु यह कैसे संभव हो सकता था ? विवाह ? हाँ, शादी हो जाने पर वह आज जैसी स्वच्छंद नहीं रह सकेगी। आखिर पिता ने अपनी कन्या के लिये योग्य वर ढूँढ ही लिया मुन्नी को राजनीति से दूर रखने के लिये ! होनेवाले दामाद का नाम था रुस्तम के. आर. कामा। सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ उसका राजनीति में भी अच्छा नाम था। पेशे से वकील इस युवक की अंग्रेजी राज में आस्था थी। ऐसे युवक ने यह जानते हुए भी कि मैडम कामा अजादी की प्यासी सिंहनी है, उससे शादी के लिये सम्मति दे देना बड़ी अजीब बात थी। ‘ सचमुच वह रुस्तम था – एक साहसी पुरुष।’ 3 अगस्त 1885 को बड़ी धूमधाम से विवाह सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद सिर्फ दो दिन मैडम कामा की राजनितिक गतिविधियाँ थम गई थीं ; तीसरे दिन राजनैतिक कारनामे फिर शुरू हो गए। अपनी लड़की के वजह से उत्पन्न सिरदर्द पिता ने अब दामाद पर मढ़ दिया था !

मैडम कामा का पति बहुत खूबसूरत था। लगता था संपत्ति और बुद्धि के मामले में दोनों एक – दूसरे के लिये ही बने थे। लेकिन अंग्रेजी राज के बारे में दोनों के विचारों में जमीन – आसमान का विरोध था। पति के विचार में इंग्लैण्ड नंदनवन था और अंग्रेज साक्षात् ईश्वर। उसके मत में अन्य कोई सत्ताशक्ति ऐसी नहीं थी, जो अंग्रेजी हुकूमत से बेहतर तो क्या बराबरी भी कर सकती हो। उधर मैडम कामा की दृष्टि में अंग्रेज भारत का रक्त पीनेवाले जुल्मी लोग थे। वे ऊपर से सभी दिखनेवाले पक्के धोखेबाज लोग थे। वे ऐसे सिद्धान्तहीन हमलावर थे जो भारत का इतना रक्त चूसना चाहते थे कि अंत में केवल हड्डियों का जर्जर ढाँचा मात्र रह जाए।
थोथे अंग्रेजी आदर्शों का अंधभक्त पति मैडम कामा के लिये तकलीफ का कारण बन गया। उसने अपने पत्नी को चेतावनी दे रखी थी कि वह स्वतंत्रता के आन्दोलन में हिस्सा न ले। परन्तु पति की सख्ती और बंधनों का मैडम कामा पर कोई असर नहीं हुआ। उनका घर दो निष्ठाओं में विभाजित हो गया – पत्नी भारतीयों के साथ और पति अंग्रेजों के साथ। गुलामी की जंजीरों से भारत को मुक्त करने के मैडम कामा के पावन संकल्प के कारण कामा के घर ने युद्ध के छोटे मैदान का रूप धारण कर लिया। विवाहित जीवन कोई खुशियाँ नहीं लाया। साध्वी मीरा ने अपने गिरिधर गोपाल के लिये संपन्न परिवार और पति को तज दिया था। उसी भाँति माँ-भारती को विदेशी दासता से मुक्त करने सामाजिक प्रतिष्टा – प्राप्त, अमीर पति को मैडम कामा भूल-सी गई।

जीवन के अंतिम कुछ दिन अपनी जन्मभूमि में बिताने की कामा की तीव्र इच्छा हुई। भारत में प्रवेश हेतु अंग्रेज सरकार की अनुमति आवश्यक थी। सर कावसजी जहाँगीर ने इस पर गृह – विभाग से पूछताछ की। काफी लम्बी बहस के बाद, अंत में सरकार मान गई। परंतु सरकार ने एक शर्त लाद दी; लिखित रूप से मैडम कामा यह कहे की आजादी के संघर्ष में वह भाग नहीं लेगी। क्रांतिकारियों से वह कोई सरोकार नहीं रखेगी।
बंधन या शर्तें मानना उसके स्वभाव में नहीं था। अत: कामा ने यह शर्त मानने से इंकार कर दिया। आखिर मित्रों व संबंधियों के आग्रह और दबाव में उसे राजी होना पड़ा। 34 वर्ष पूर्व युवा मैडम कामा ने भारत छोड़ा था। जवानी और प्रौढ़ उम्र मातृभूमि को आजाद करने के संघर्ष में बीत गई। यद्यपि उसका शरीर अब 70 वर्ष का हो गया था, फिर भी मन में आजादी व संघर्ष की अदम्य आकांक्षा का वही स्पंदन था। इस अवस्था में मातृभूमि की ओर सफ़र शुरू हुआ। भारत के करीब पहुँचते-पहुँचते वह बीमार हो गई। बिस्तर से उठने की ताकत भी उसमें नहीं रही।
अपने जन्मस्थान बम्बई पहुँचते ही उसे अपार हर्ष हुआ। बम्बई बंदरगाह से उसे सीधे पेटिट अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में आठ महीनों तक जीवन और मृत्यु के बीच झूजती रही। 13 अगस्त 1936 को इस महान वीरांगना का देहांत हो गया। जिस स्वतंत्रता के लिये उसने अपना जीवन होम कर दिया था वह स्वतंत्रता उसकी मृत्यु के 11 वर्ष बाद प्राप्त हो सकी। भले भारत को आजादी 15 अगस्त 1947 को मिली परंतु मैडम भीकाजी कामा ने यह एहसास उसी समय करवा दिया था जब उन्होंने विदेश में तिरंगा लहराया था। आज भी सभी देशवासी उस क्षण को याद कर पुलकित हो जाते हैं।
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