मूर्धन्य पत्रकार,लेखक राकेश अचल की कलम से- संविधान के प्रति उदासीनता क्यों ?


भारत में जैसे स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस धूमधाम से मनाया जाता है उस तरह संविधान दिवस नहीं मनाया जाता.हर साल 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाने की औपचारिकता जरूर की जाती है .संविधान के प्रति ये उदासीनता जानबूझकर है या इसके पीछे कोई मकसद है ,इसका पता लगाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है .
संविधान को कोई क्या कहता है ,इसमें जाने के बजाय ये देखिये कि आप संविधान को क्या मानते हैं ? कहने को संविधान लोकतंत्र की आत्मा है लेकिन ये सिर्फ कहने को है.असल में तो संविधान लोकतंत्र का दूसरा पहलू है. तानाशाही में संविधान होता है लेकिन वो जनता का नहीं फ़ौज का होता है .हमारा संविधान हमारा अपना है. हमारे भाग्यविधाताओं ने 2 साल 11 माह और 17 दिन की मेहनत के बाद देश को एक संविधान दिया है ,इसलिए इसके प्रति हमारा अनुराग होना ही चाहिए .अगर हम घर में कोई धर्मग्रंथ रखते हैं तो हमें अपने संविधान की एक प्रति भी अवश्य रखना चाहिए.इसका पाठ करना चाहिए और खुद समझने के साथ परिवार के हर सदस्य को समझाना चाहिए .
भारतीय नागरिकों के पास एक संविधान है ये हर कोई नहीं जानता ,क्योंकि हमने इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया .संविधान से अवगत हमारा मतदाता सवाल नहीं करने लगेगा ? इस भय ने संविधान को आम आदमी की रचना नहीं बनने दिया. संविधान आज भी वकीलों और अदालतों के काम आने वाली किताब है .आम आदमी इसका इस्तेमाल शायद ही कर पाता हो .विधि के एक छात्र के नाते मुझे भी भारतीय संविधान पढ़ने का अवसर मिला लेकिन मेरे बच्चों ने भी दूसरे बच्चों की तरह इसे नहीं पढ़ा.वे संविधान पढ़े बिना ही स्नातक,परा -स्नातक और डॉक्टरेट की उपाधियाँ हासिल कर लेते हैं .रोजगार पा लेते हैं .
ऐसी मान्यता है कि जब भारत के संविधान को अपनाया गया था तब भारत के नागरिकों ने शांति, शिष्टता और प्रगति के साथ एक नए संवैधानिक, वैज्ञानिक, स्वराज्य और आधुनिक भारत में प्रवेश किया था। भारत का संविधान पूरी दुनिया में बहुत अनोखा है क्योंकि यह लिखित और विस्तृत है।यह हमें लोकतांत्रिक सरकार देता है ,इसमें मौलिक अधिकार,न्यायपालिका की स्वतंत्रता, यात्रा, रहने, भाषण, धर्म, शिक्षा आदि की स्वतंत्रता,एकल राष्ट्रीयता,भारतीय संविधान लचीला और गैर लचीला दोनों है।
राष्ट्रीय स्तर पर जाति व्यवस्था का उन्मूलन।समान नागरिक संहिता और आधिकारिक भाषाएं,केंद्र एक बौद्ध ‘गणराज्य ‘ के समान है,
हमारे संविधान पर बुद्ध और बौद्ध अनुष्ठान का प्रभाव है और शायद इसीलिए इसे हमारे देश के दलितों ने इसे अपने लिए लिखी गयी किताब समझ लिया . हमारा दलित समाज समझता है कि संविधान केवल डॉ भीमराव आंबेडकर की रचना है , लेकिन ऐसा है नहीं,संविधान रचने में अनेक दिमाग शामिल थे .भारतीय संविधान अधिनियम में आने के बाद, भारत में महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला है।दुनिया भर में विभिन्न देशों ने भारतीय संविधान को अपनाया है।पड़ोसी देशों में से एक भूटान ने भी भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली को स्वीकार कर लिया है।
हमने अपने संविधान को लचीला बनाकर रखा लेकिन इसका लाभ आम जनता को नहीं मिला.बीते 70 साल में [26 जनवरी 1950 को लागू होने के बाद] भारतीय संविधान में अब तक कुल 101 संशोधन हो चुके हैं। 42वें संविधान संशोधन के ज़रिए संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘एकता व अखंडता’ शब्द जोड़े गए थे। हाल ही में पारित हुआ वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक 122वां संशोधन विधेयक और 101वां संविधान संशोधन था।ये संशोधन सरकार ने अपनी सुविधा से किये.जनता की सुविधा केलिए भी कुछ संशोधन किये गए किन्तु दुर्भाग्य ये कि इन तमाम संशोधनों का लाभ आम जनता तक नहीं पहुँच पाया .
मेरी निजी धारणा है कि भारत में संविधान अब या तो राजनीतिक सत्ता के लिए एक खिलौना बन चुका है या फिर इसका इस्तेमाल केवल और केवल दुहाई देने के लाइए किया जाता है .किसी भी दल की कोई भी सरकार हो अपने ढंग से ऐसे क़ानून बना लेती है जो संविधान के खिलाफ होते हैं .ऐसे कानूनों के रास्ते में जब संविधान आता है तो संशोधन का रास्ता अख्तियार कर लिया जाता है .और जब आज जैसी स्थिति बनती है ,जहां विपक्ष मौथरा हो चुका होता है वहां संविधान को बलाये ताक रख दिया जाता है .देश की अदलातें यदा-कड़ा ही नहीं अक्सर ही संविधान को बचाने का प्रयास करतीं है किन्तु जनता इससे निस्पृह रहती है ,क्योंकि उसे पता ही नहीं चलता कि संविधान से छेड़छाड़ के दुष्परिणाम क्या हैं ?
रोचक तथ्य ये है कि भारत का संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है.इसमें लगभग 145 हजार शब्द हैं, जो इसे दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सक्रिय संविधान बनाता है. बावजूद इसके हम इसके शेयर आम आदमी के हितों की रक्षा नहीं कर पाते .हमारा संविधान दरअसल क़ानून का ‘मिक्सवेज’ है. हमने अमेरिका,इंग्लैंड ,आयरलैंड,ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी,दक्षिण अफ्रीका,कनाडा, पुराने सोवियत संघ,जापान और फ्रांस के संविधानों से बहुत कुछ उधार लेकर अपने संविधान की रचना की ,इसलिए इसमें भारतीयता को छोड़ सबका स्वाद आता है .लेकिन आखिरकार ये है तो हमारा अपना.जैसा भी है,बेहतर है .
दुनिया में आज भी सऊदी अरब,इजराइल और न्यूजीलैंड जैसे देश हैं जो बिना किसी लिखित संविधान के काम चला रहे हैं और न सिर्फ चला रहे हैं बल्कि हर तरह से हमसे आगे हैं .इसलिए संविधान से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय चरित्र होता है .
आज देश का लोकतंत्र जिस स्वरूप में है वहां संविधान बेहद जरूरी उपकरण है,लेकिन ये भारतीय जनमानस की जिम्मेदारी है कि वो इस संविधान को कम से कम पढ़े तो,जाने तो .दुर्भाग्य ये है कि हमारे यहाँ लोग राजनीतिक दलों के झूठ से बहरे चुनाव घोषणा पात्र तो पढ़ लेते हैं लेकिन अपना संविधान नहीं पढ़ते .संविधान के प्रति हमारी इसी अरुचि और वितृष्णा का लाभ बीते सात दशकों से राजनीतिक दल उठाते आ रहे हैं .हम डॉ भीमराव आंबेडकर और संविधान की पूजा तो करने लगते हैं यहां तक कि अब उन्हें शादी-विवाह के जलसों में भी साथ लेकर चलने लगे हैं ,लेकिन मै इसे एक ढोंग से अधिक कुछ नहीं मानता.जब तक समाज संविधान को पढ़कर उसे आत्मसात नहीं करता,उसकी रक्षा के प्रति कटिबद्ध नहीं होता ,तब तक संविधान का कोई लाभ न व्यक्ति को मिलने वाला है और न समाज को .तो आइये संविधान को पूजा करने के बजाय आचरण में लाने का प्रयास करें ,ताकि लोकतंत्र और मजबूत हो,असमानता समाप्त हो .

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