
-मुरली संत को मिला राष्ट्रीय तिलका मांझी पुरस्कार
-गांधीवादी तरीके से आदिवासियों को किया जागरूक
-विशेष जनजातियों को सिखाया जीवन जीने का अधिकार

कोरबा। जिले के पोड़ी उपरोड़ा ब्लॉक के रहने वाले मुरली दास संत को तिलका मांझी राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया है। यह सम्मान उन्हें समाज सेवा के तहत वनांचल में रहने वाले आदिवासियों को जागरूक करते हुए उनके अधिकार दिलाने और उन्हें मुख्य धारा से जोड़ने के प्रयासों के चलते मिला।
पोड़ी उपरोड़ा के ग्राम बिंझरा में रहने वाले मुरली दास संत बीते 21 वर्षों से समाज सेवा के क्षेत्र में काम करते हुए एकता परिषद जन संगठन के साथ जुड़े और प्रख्यात गांधीवादी पी ह्वी. राजगोपाल की प्रेरणा से राष्ट्रीय स्तर पर जितने भी अहिंसात्मक जन आंदोलन हुए, उनमें अपनी जवाबदारी सुनिश्चित की तथा राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय टीम के साथ काम करने का अनुभव भी हासिल किया।
मुरली दास संत ने विशेष रूचि के तहत वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन में छत्तीसगढ़ के विशेष जनजातियों के साथ जिसमें पंडो़, बिरहोर, कोरवा ,बैगा समुदाय आते हैं, को जीवन जीने के अधिकार के तहत जागरूक किया और उन्हें वन अधिकार के तहत पट्टा दिलाते हुए संबंधित जमीन पर जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित किया। ग्रामीणों को सामूहिक श्रमदान से पानी की समस्या से निजात दिलाने के लिए कुआं का निर्माण कराना और लोगों को जोड़कर पौधा रोपण कराने का कार्य लगातार जारी है।
गांधी कुटी बनाने में विशेष भूमिका
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के गांव की परिकल्पना के अनुसार ग्राम स्वराज की अवधारणा को ग्रामीण वनांचल स्तर तक ले जाने में मुरली दास संत की विशेष भूमिका रही। जिसके तहत उन्होंने विकासखंड पोड़ी उपरोड़ा के 13 गावों में गांधी कुटी का निर्माण करवाया। ग्रामीणों द्वारा सामुदायिक भवन की तरह गांधी कुटी में बैठक कर सामूहिक फैसले लिए जाते हैं, और उसका सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल किया जाता है।
बापू की 150वीं जन्म शताब्दी पर एकता परिषद की विश्व शांति पदयात्रा में भी मुरली दास संत शामिल हुए और लगभग एक वर्ष तक घरबार छोड़कर गांधीवादी पी वी राजगोपाल के साथ वंचितों को न्याय दिलाने की मुहिम में जुटे रहे। मुरली दास संत के उल्लेखनीय कार्यों को देखते हुए उन्हें भागलपुर के अंग मदद फाउंडेशन द्वारा तिलका मांझी राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया। ये पुरस्कार हर वर्ष प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शुभकरण चूड़ीवाला की स्मृति में दिया जाता है।







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